संजय मिश्रा की जिंदगी: जब बॉलीवुड छोड़ ढाबे पर ऑमलेट बनाने लगे थे, फिर एक फोन कॉल ने बदल दी किस्मत
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| संजय मिश्रा की अनसुनी कहानी: जब 150 रुपये के लिए ढाबे पर बर्तन धोते थे अभिनेता |
क्या आप यकीन करेंगे कि बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में गिने जाने वाले संजय मिश्रा कभी गंगा किनारे एक छोटे से ढाबे पर ऑमलेट बनाते थे?
वह दौर ऐसा था जब न उन्हें स्टारडम की परवाह थी, न फिल्मों की। पिता का निधन हो चुका था, गंभीर बीमारी से उबर रहे थे और जिंदगी का अर्थ ही खो गया था।
कम लोग जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब संजय मिश्रा ने लगभग तय कर लिया था कि अब वह फिल्मों में कभी वापस नहीं लौटेंगे। लेकिन फिर एक फोन कॉल आया और उनकी जिंदगी की कहानी पूरी तरह बदल गई।
यह सिर्फ एक अभिनेता की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि टूटने, बिखरने और फिर खुद को दोबारा खड़ा करने की कहानी है।
बिहार से शुरू हुआ सफर, लेकिन सपने थे बड़े
संजय मिश्रा का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के नारायणपुर में हुआ था। बाद में उनका परिवार वाराणसी और फिर दिल्ली से जुड़ा। बचपन से ही कला और अभिनय का माहौल उन्हें आकर्षित करता था।
उनके पिता शंभूनाथ मिश्रा पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े थे। घर में रचनात्मक माहौल था, जिसने संजय के अंदर कलाकार को जन्म दिया।
लेकिन बॉलीवुड तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था।
NSD में टॉपर, लेकिन मुंबई में कोई पहचान नहीं
संजय मिश्रा ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) से अभिनय की पढ़ाई की।
थिएटर की दुनिया में उनकी प्रतिभा की चर्चा होने लगी थी। उन्हें लगता था कि मुंबई पहुंचते ही काम मिल जाएगा।
लेकिन असल सच कुछ और था।
मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें छोटे-मोटे रोल मिले। कई बार ऑडिशन दिए, कई बार रिजेक्ट हुए। फिल्मों में उनकी मौजूदगी होती थी, लेकिन लोग उनका नाम नहीं जानते थे।
आज के सोशल मीडिया दौर में शायद यह संघर्ष वायरल हो जाता, लेकिन उस समय उनकी मेहनत चुपचाप चल रही थी।
पहले दिन ही 28 टेक, फिर भी हार नहीं मानी
कम लोग जानते हैं कि टीवी सीरियल चाणक्य की शूटिंग के दौरान अपने पहले दिन संजय मिश्रा ने एक सीन के लिए 28 टेक दिए थे। निर्देशक परेशान हो गए थे।
कई लोग शायद उस दिन हिम्मत हार जाते।
लेकिन संजय मिश्रा उन कलाकारों में से थे जो असफलता को भी सीख मानते हैं।
यही वजह है कि बाद में वही अभिनेता भारतीय सिनेमा के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में गिना जाने लगा।
'ऑफिस ऑफिस' ने बदली पहचान
2000 के दशक में टीवी शो 'ऑफिस ऑफिस' आया।
इस शो में उनका किरदार "शुक्ला" दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। उनकी कॉमिक टाइमिंग और साधारण आदमी जैसी स्क्रीन प्रेजेंस ने उन्हें घर-घर पहचान दिला दी।
इसके बाद बंटी और बबली, धमाल, वेलकम, गोलमाल जैसी फिल्मों में उनके किरदार दर्शकों को खूब पसंद आए।
लेकिन पर्दे पर लोगों को हंसाने वाला यह अभिनेता निजी जिंदगी में एक बड़े तूफान से गुजर रहा था।
बीमारी जिसने जिंदगी बदल दी
एक समय ऐसा आया जब संजय मिश्रा गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।
उनके अनुसार, डॉक्टरों ने उनके पेट से लगभग 15 लीटर पस (pus) निकाला था। वह मौत और जिंदगी के बीच की लड़ाई लड़ रहे थे।
मुश्किल से स्वास्थ्य सुधरा ही था कि जिंदगी ने उन्हें एक और बड़ा झटका दे दिया।
उनके पिता का निधन हो गया।
यहीं से उनकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय शुरू होता है।
पिता की डायरी और वो पछतावा जो आज भी याद है
हाल ही में दिए गए एक इंटरव्यू में संजय मिश्रा ने एक बेहद भावुक घटना साझा की।
उन्होंने बताया कि एक बार वह अपने पिता के साथ फिल्म देखने गए थे। वहां फैंस फोटो खिंचवाने लगे और उन्होंने गुस्से में लोगों पर चिल्ला दिया। पिता ने उन्हें समझाया, लेकिन उन्होंने पिता से भी ऊंची आवाज में बात कर दी।
पिता के निधन के बाद जब उन्होंने उनकी डायरी पढ़ी, तो उसमें लिखा था कि बेटे के व्यवहार से उन्हें अपमानित महसूस हुआ था।
यह पढ़कर संजय मिश्रा पूरी तरह टूट गए।
उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि वह चाहते थे कि एक बार उनके पिता आंखें खोल दें ताकि वह माफी मांग सकें।
यही घटना उन्हें अंदर से झकझोर गई।
जब बॉलीवुड छोड़कर ऋषिकेश चले गए
पिता की मौत और बीमारी के बाद संजय मिश्रा को लगा कि जिंदगी का कोई अर्थ नहीं बचा।
उन्होंने मुंबई छोड़ दी और ऋषिकेश चले गए।
गंगा किनारे एक छोटे से ढाबे पर उन्होंने काम शुरू कर दिया। वहां वह ऑमलेट बनाते थे, चाय देते थे और बर्तन भी साफ करते थे।
ढाबे के मालिक ने उन्हें कहा था कि रोज 50 कप धोने होंगे और बदले में 150 रुपये मिलेंगे।
संजय मिश्रा ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
क्योंकि उस समय उनके लिए स्टारडम नहीं, सिर्फ जीना जरूरी था।
ढाबे पर भी पहचान छुप नहीं सकी
यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लगती है।
संजय मिश्रा ढाबे पर काम कर रहे थे, लेकिन वहां आने वाले लोग उन्हें पहचानने लगे।
लोग कहते, "अरे आप तो गोलमाल में थे ना?"
फिर उनके साथ फोटो खिंचवाने लगते।
जिस व्यक्ति ने बॉलीवुड से दूर जाने का फैसला किया था, उसे बॉलीवुड बार-बार ढूंढ रहा था।
फिर आया वह फोन कॉल जिसने सब बदल दिया
जब संजय मिश्रा ऋषिकेश में थे, तभी निर्देशक रोहित शेट्टी का फोन आया।
उन्हें फिल्म All The Best का ऑफर मिला।
शुरुआत में शायद उन्होंने इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा।
लेकिन मां के लगातार फोन, लोगों का प्यार और रोहित शेट्टी के ऑफर ने उन्हें वापस मुंबई लौटने के लिए प्रेरित किया।
यहीं से उनकी दूसरी पारी शुरू हुई।
दूसरी पारी में बने अभिनय के बादशाह
वापसी के बाद संजय मिश्रा ने सिर्फ कॉमेडी नहीं की।
उन्होंने ऐसे किरदार चुने जिन्होंने साबित कर दिया कि वह सिर्फ कॉमिक अभिनेता नहीं, बल्कि एक शानदार परफॉर्मर हैं।
फंस गए रे ओबामा, आंखों देखी, मसान, कामयाब, वध, भक्षक जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसा अभिनय किया कि आलोचकों से लेकर दर्शकों तक सभी ने उनकी तारीफ की।
विशेष रूप से आंखों देखी और वध के लिए उन्हें आलोचकों द्वारा खूब सराहा गया और पुरस्कार भी मिले।
क्यों अलग हैं संजय मिश्रा?
बॉलीवुड में कई स्टार हैं।
लेकिन संजय मिश्रा की खासियत यह है कि वह किरदार को जीते हैं।
उनके अभिनय में बनावट नहीं दिखती।
शायद इसकी वजह यह है कि उन्होंने जिंदगी को बहुत करीब से देखा है—संघर्ष, बीमारी, अकेलापन, सफलता और नुकसान सब कुछ।
इसीलिए जब वह स्क्रीन पर एक आम आदमी का किरदार निभाते हैं, तो दर्शकों को वह अपना सा लगता है।
वायरल इंटरव्यू में कही थी बड़ी बात
एक पुराने इंटरव्यू में संजय मिश्रा ने कहा था कि उन्हें "रेस" में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं है।
उनके लिए दर्शकों का सम्मान ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।
शायद यही सोच उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती है।
वह स्टार बनने की नहीं, अच्छा अभिनेता बनने की कोशिश करते रहे।
और यही वजह है कि आज उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित कलाकारों में गिना जाता है।
संजय मिश्रा की untold story हमें क्या सिखाती है?
संजय मिश्रा की कहानी सिर्फ बॉलीवुड की कहानी नहीं है।
यह उस इंसान की कहानी है जिसने सब कुछ खो देने के बाद भी खुद को दोबारा बनाया।
ढाबे पर 150 रुपये कमाने वाला वही व्यक्ति बाद में राष्ट्रीय पुरस्कार स्तर की चर्चाओं का हिस्सा बना।
कभी-कभी जिंदगी आपको वहां ले जाती है जहां आप जाना नहीं चाहते।
लेकिन वही रास्ता आपको आपकी असली मंजिल तक पहुंचा देता है।
आखिर में एक सवाल...
अगर उस समय रोहित शेट्टी का फोन नहीं आया होता, तो क्या आज हम संजय मिश्रा को भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार अभिनेताओं में गिन रहे होते?
आपकी राय क्या है? क्या संजय मिश्रा बॉलीवुड के सबसे अंडररेटेड अभिनेताओं में से एक हैं? कमेंट में जरूर बताइए।

Bahut sundar
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