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| राम बनने की कीमत |
क्या आप यकीन करेंगे कि एक ऐसा अभिनेता भी हुआ, जिसे एक किरदार ने अमर तो बना दिया, लेकिन उसी किरदार ने उसके करियर की राह भी मुश्किल कर दी?
टीवी की दुनिया में बहुत से कलाकार आए और गए, लेकिन एक चेहरा ऐसा है जिसे आज भी करोड़ों लोग भगवान राम के रूप में याद करते हैं। यह चेहरा है अरुण गोविल का।
दिलचस्प बात यह है कि "रामायण" में भगवान राम बनने से पहले अरुण गोविल सिर्फ एक संघर्षरत अभिनेता थे। लेकिन जब उन्होंने राम का किरदार निभाया, तो उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। लोग उन्हें अभिनेता नहीं, सचमुच भगवान मानने लगे।
यह कहानी सिर्फ एक कलाकार की सफलता की नहीं है, बल्कि उस कीमत की भी है जो उन्हें इस लोकप्रियता के बदले चुकानी पड़ी।
12 जनवरी 1952 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे अरुण गोविल का बचपन एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में बीता।
उनके पिता चाहते थे कि वह सरकारी नौकरी करें। लेकिन अरुण के सपने कुछ और थे। वह ऐसा काम करना चाहते थे जिससे लोग उन्हें हमेशा याद रखें।
कम लोग जानते हैं कि अभिनय उनका पहला करियर विकल्प नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अपने भाई के व्यवसाय से जुड़ने के लिए मुंबई आए थे। लेकिन मुंबई ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।
यहीं से शुरू हुआ फिल्मों और अभिनय की दुनिया में उनका सफर।
मुंबई आने के बाद अरुण गोविल ने फिल्मों में किस्मत आजमानी शुरू की।
1977 में फिल्म "पहेली" से उन्हें पहला बड़ा मौका मिला। इसके बाद उन्होंने "सावन को आने दो", "सांच को आंच नहीं", "जियो तो ऐसे जियो" जैसी फिल्मों में काम किया।
उनकी अभिनय क्षमता की तारीफ तो हुई, लेकिन वह स्टारडम नहीं मिला जिसकी हर अभिनेता को तलाश होती है।
उस दौर में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, जितेंद्र और विनोद खन्ना जैसे सितारों का बोलबाला था। ऐसे में अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था।
अरुण गोविल लगातार काम कर रहे थे, लेकिन उन्हें अभी वह किरदार नहीं मिला था जो उनकी जिंदगी बदल दे।
1980 के दशक के मध्य में निर्देशक Ramanand Sagar अपने महत्वाकांक्षी टीवी शो "रामायण" की तैयारी कर रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में अरुण गोविल को राम के किरदार के लिए नहीं चुना गया था।
कहा जाता है कि सागर साहब ने पहले उन्हें दूसरे रोल के लिए देखा था। लेकिन बाद में उनकी शांत छवि, सौम्य व्यक्तित्व और चेहरे की गंभीरता देखकर उन्हें भगवान राम के किरदार के लिए चुना गया।
तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह फैसला भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे बड़ा फैसला साबित होगा।
1987 में जब "रामायण" का प्रसारण शुरू हुआ तो कुछ ही एपिसोड में यह एक सांस्कृतिक आंदोलन बन गया।
रविवार की सुबह सड़कें खाली हो जाती थीं।
बसें रुक जाती थीं।
बाजार सुनसान हो जाते थे।
लोग टीवी के सामने अगरबत्ती जलाकर बैठते थे।
और जब स्क्रीन पर अरुण गोविल भगवान राम के रूप में दिखाई देते थे, तो दर्शक हाथ जोड़ लेते थे।
आज के OTT और सोशल मीडिया युग में शायद यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि किसी टीवी शो का प्रभाव इतना बड़ा हो सकता है।
रामायण की लोकप्रियता के बाद अरुण गोविल की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
जहां भी जाते, लोग उनके पैर छूने लगते।
महिलाएं आरती उतारती थीं।
बुजुर्ग उन्हें भगवान राम का स्वरूप मानकर आशीर्वाद लेते थे।
यह लोकप्रियता किसी भी अभिनेता का सपना हो सकती है।
लेकिन यहीं से शुरू हुई उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती।
यह कहानी का सबसे दिलचस्प और कम चर्चित हिस्सा है।
जिस किरदार ने उन्हें अमर बना दिया, उसी किरदार ने उनके करियर को सीमित भी कर दिया।
निर्माता और निर्देशक उन्हें किसी दूसरे रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
दर्शकों के मन में उनकी छवि भगवान राम के रूप में इतनी गहराई से बैठ चुकी थी कि लोग उन्हें खलनायक, रोमांटिक हीरो या किसी अन्य किरदार में देखने को तैयार नहीं थे।
एक पुराने इंटरव्यू में अरुण गोविल ने स्वीकार किया था कि रामायण के बाद उनका करियर लगभग ठहर सा गया था क्योंकि निर्माता उन्हें दूसरे किरदारों में लेने से हिचकिचाते थे।
यानी जिस सफलता के लिए कलाकार पूरी जिंदगी संघर्ष करते हैं, वही सफलता उनके लिए चुनौती बन गई।
रामायण के दौरान और उसके बाद अरुण गोविल की सार्वजनिक छवि इतनी मजबूत हो गई थी कि लोगों को उनके निजी जीवन की सामान्य बातें भी स्वीकार नहीं होती थीं।
अगर कहीं उन्हें सामान्य इंसान की तरह देखा जाता, तो लोग हैरान हो जाते।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी सार्वजनिक छवि और जीवनशैली में भी बदलाव किए।
उनके लिए यह सिर्फ अभिनय नहीं रह गया था, बल्कि एक जिम्मेदारी बन चुकी थी।
बिल्कुल नहीं।
यह शायद उनके करियर के साथ हुई सबसे बड़ी विडंबना है।
उन्होंने फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और कई अन्य प्रोजेक्ट्स में काम किया।
"विक्रम और बेताल", "लव कुश", धार्मिक और सामाजिक विषयों पर आधारित कई कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति रही।
लेकिन जनता की स्मृति में उनका नाम हमेशा राम के साथ जुड़ा रहा।
यह किसी कलाकार के लिए सम्मान भी है और चुनौती भी।
2020 में जब कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान दूरदर्शन पर "रामायण" का पुनः प्रसारण हुआ, तब एक नई पीढ़ी ने पहली बार अरुण गोविल को भगवान राम के रूप में देखा।
हैरानी की बात यह रही कि तीन दशक बाद भी लोगों का प्यार कम नहीं हुआ।
सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो वायरल होने लगे।
युवा दर्शकों ने भी उनकी सादगी और अभिनय की खूब तारीफ की।
एक बार फिर साबित हो गया कि कुछ किरदार समय से बड़े होते हैं।
अभिनय के बाद अरुण गोविल ने सार्वजनिक जीवन में एक नई भूमिका निभाई।
उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की और 2024 के लोकसभा चुनाव में मेरठ से चुनाव लड़ा।
मेरठ, जहां उनका जन्म हुआ था, वहीं से उन्होंने संसद तक का सफर तय किया और लोकसभा सदस्य बने।
यह उनके जीवन का एक नया अध्याय था।
जब भी कोई नई रामायण बनती है या कोई नया अभिनेता भगवान राम का किरदार निभाता है, तुलना सबसे पहले अरुण गोविल से होती है।
यह उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
हाल के वर्षों में भी रामायण आधारित फिल्मों और धारावाहिकों की चर्चा के दौरान उनका नाम लगातार सामने आता रहा है।
कई दर्शकों के लिए भगवान राम का चेहरा आज भी अरुण गोविल ही हैं।
अरुण गोविल की जिंदगी हमें बताती है कि सफलता हमेशा वैसी नहीं होती जैसी दूर से दिखाई देती है।
कभी-कभी एक उपलब्धि इंसान को अमर बना देती है, लेकिन उसी के साथ कुछ दरवाजे भी बंद कर देती है।
उन्होंने स्टारडम देखा।
अत्यधिक लोकप्रियता देखी।
लोगों का प्रेम देखा।
और उस लोकप्रियता की कीमत भी चुकाई।
शायद यही वजह है कि उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
अरुण गोविल सिर्फ एक अभिनेता नहीं हैं। वह भारतीय टेलीविजन इतिहास का एक ऐसा अध्याय हैं जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
रामायण में निभाया गया उनका किरदार आज भी करोड़ों लोगों की यादों में जीवित है।
बहुत कम कलाकारों को ऐसा सम्मान मिलता है कि लोग उनके नाम से ज्यादा उनके किरदार को याद रखें।
और शायद यही अरुण गोविल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आपकी नजर में भगवान राम का सबसे यादगार स्क्रीन अवतार कौन रहा है? क्या आज भी अरुण गोविल की जगह कोई दूसरा अभिनेता ले पाया है? अपनी राय जरूर बताइए।
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