बॉलीवुड की सबसे बड़ी विवादित फिल्में: जिनकी कहानी पर्दे पर कम, अदालतों और सड़कों पर ज़्यादा लिखी गई
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| इन फिल्मों ने पूरे देश में मचा दिया था बवाल! |
एक फिल्म... और पूरा देश दो हिस्सों में बंट गया
क्या एक फिल्म सचमुच लोगों की भावनाएं बदल सकती है?
क्या सिर्फ तीन घंटे की कहानी पूरे देश में प्रदर्शन, विरोध, अदालत और राजनीति का कारण बन सकती है?
क्या कभी किसी फिल्म के कारण करोड़ों रुपये दांव पर लग गए?
और क्या ऐसा भी हुआ कि रिलीज से पहले ही फिल्म देखने वालों से ज्यादा उसके विरोध करने वालों की भीड़ जुट गई?
अगर जवाब "हां" है, तो वह जगह है—बॉलीवुड।
यहां कई फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं रहीं। वे बहस बन गईं। आंदोलन बन गईं। अदालतों तक पहुंचीं। कुछ फिल्मों को सेंसर बोर्ड ने रोक दिया, कुछ पर राज्यों ने प्रतिबंध लगाया, तो कुछ ने रिकॉर्ड कमाई करते हुए यह साबित किया कि विवाद कभी-कभी फिल्म की सबसे बड़ी मार्केटिंग भी बन जाता है।
लेकिन हर विवाद एक जैसा नहीं था।
कहीं धार्मिक भावनाओं की बात हुई, कहीं इतिहास को लेकर सवाल उठे। कुछ फिल्मों पर अश्लीलता के आरोप लगे, तो कुछ पर राजनीतिक एजेंडा फैलाने के आरोप लगाए गए।
आखिर बॉलीवुड बार-बार ऐसे मोड़ पर क्यों पहुंचता है?
इस सवाल का जवाब इन फिल्मों की कहानियों में छिपा है।
आखिर मामला क्या है?
भारत जैसे विविधताओं वाले देश में फिल्में सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं। यहां सिनेमा समाज, संस्कृति, इतिहास, राजनीति और धर्म से भी जुड़ जाता है।
जब किसी फिल्म में इन विषयों को दिखाया जाता है, तब अलग-अलग समूह उसे अलग नजरिए से देखते हैं।
यहीं से शुरू होता है विवाद।
हालांकि हर विरोध सही हो, यह जरूरी नहीं। उसी तरह हर फिल्म पूरी तरह तथ्यात्मक हो, यह भी जरूरी नहीं।
कई मामलों में अदालतों ने फिल्म निर्माताओं के पक्ष में फैसला दिया, तो कई बार फिल्म निर्माताओं को बदलाव भी करने पड़े।
यही वजह है कि बॉलीवुड की कुछ फिल्में आज भी विवादों के उदाहरण के तौर पर याद की जाती हैं।
लेकिन इस सूची की पहली फिल्म ने तो रिलीज से पहले ही ऐसा माहौल बना दिया था, जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी।
1. पद्मावत (2018): जब एक फिल्म के लिए देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए
2017 के आखिर में संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत चर्चा में आई।
विरोध करने वाले संगठनों का दावा था कि फिल्म में रानी पद्मिनी के इतिहास को गलत तरीके से दिखाया गया है।
फिल्म की शूटिंग के दौरान जयपुर में सेट पर हमला हुआ।
बाद में कोल्हापुर में भी फिल्म का सेट जलाने की घटना सामने आई।
कई राज्यों में रिलीज रोकने की कोशिश हुई।
सेंसर बोर्ड ने भी फिल्म में बदलाव सुझाए और इसका नाम पद्मावती से बदलकर पद्मावत किया गया।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म की रिलीज का रास्ता साफ किया।
दिलचस्प बात यह रही कि भारी विरोध के बावजूद फिल्म ने दुनिया भर में शानदार कमाई की और उस साल की सबसे सफल फिल्मों में शामिल हुई।
लेकिन अगर आपको लगता है कि यही सबसे बड़ा सेंसर विवाद था, तो अगली फिल्म उससे भी आगे निकल गई।
2. उड़ता पंजाब (2016): जब सेंसर बोर्ड और फिल्म निर्माता आमने-सामने आ गए
अभिषेक चौबे की फिल्म उड़ता पंजाब पंजाब में ड्रग्स की समस्या पर आधारित थी।
फिल्म रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड ने इसमें लगभग 89 कट लगाने का सुझाव दिया।
निर्माताओं ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अधिकांश कट हटाते हुए सिर्फ एक कट के साथ फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी।
यह मामला भारतीय फिल्म इतिहास में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप पर सबसे बड़ी बहसों में से एक बन गया।
आज भी जब सेंसरशिप की बात होती है, तो उड़ता पंजाब का उदाहरण जरूर दिया जाता है।
लेकिन एक फिल्म ऐसी भी थी, जिसे लेकर धार्मिक बहस पूरे देश में फैल गई।
3. पीके (2014): सवाल भगवान पर नहीं, आस्था के नाम पर था या कुछ और?
आमिर खान स्टारर पीके ने रिलीज के बाद जबरदस्त बहस छेड़ दी।
फिल्म में अंधविश्वास, ढोंग और तथाकथित धर्म के कारोबार पर सवाल उठाए गए थे।
कुछ धार्मिक संगठनों ने आरोप लगाया कि फिल्म हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाती है।
कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए।
कुछ सिनेमाघरों के बाहर प्रदर्शन भी हुए।
दूसरी ओर बड़ी संख्या में दर्शकों और समीक्षकों ने फिल्म के संदेश का समर्थन किया।
विवाद के बावजूद पीके उस समय भारतीय सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो गई।
लेकिन अगर पीके पर बहस थी, तो अगली फिल्म सीधे अदालतों तक पहुंच गई।
4. बैंडिट क्वीन (1994): सच दिखाना कितना मुश्किल हो सकता है?
शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन फूलन देवी के जीवन से प्रेरित फिल्म थी।
फिल्म में हिंसा और यौन उत्पीड़न के कई दृश्य थे।
फूलन देवी ने आरोप लगाया कि उनकी अनुमति के बिना उनकी जिंदगी को दिखाया गया।
उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
फिल्म कुछ समय तक कानूनी विवाद में फंसी रही।
बाद में इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली और यह भारतीय समानांतर सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाने लगी।
लेकिन 2018 में एक और फिल्म आई, जिसने महिलाओं की आजादी पर नई बहस छेड़ दी।
5. लिपस्टिक अंडर माय बुर्का (2017): जब सेंसर ने कहा—यह फिल्म महिलाओं की कल्पनाओं पर आधारित है
अलंकृता श्रीवास्तव की इस फिल्म को पहले सेंसर बोर्ड ने प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया।
कारण बताया गया कि फिल्म में महिलाओं की इच्छाओं और यौन स्वतंत्रता को खुलकर दिखाया गया है।
इस फैसले की देशभर में आलोचना हुई।
बाद में संशोधन के बाद फिल्म रिलीज हुई।
रिलीज के बाद इसे समीक्षकों ने खूब सराहा।
यह फिल्म इस बात का उदाहरण बन गई कि सामाजिक विषयों पर बनी फिल्मों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
लेकिन अगले विवाद में राजनीति, इतिहास और सिनेमा तीनों आमने-सामने थे...
6. द कश्मीर फाइल्स (2022): फिल्म से ज्यादा चर्चा उसके प्रभाव की हुई
विवेक अग्निहोत्री निर्देशित द कश्मीर फाइल्स कश्मीरी पंडितों के पलायन पर आधारित है।
फिल्म को लेकर देशभर में तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस हुई।
कुछ लोगों ने इसे लंबे समय तक अनदेखी गई त्रासदी को सामने लाने वाली फिल्म बताया।
वहीं कुछ आलोचकों ने फिल्म की प्रस्तुति और दृष्टिकोण पर सवाल उठाए।
फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अप्रत्याशित सफलता हासिल की।
इसके बाद कई राज्यों ने इसे टैक्स फ्री किया, जबकि कुछ जगहों पर इसे लेकर विरोध भी देखने को मिला।
लेकिन विवादों की सूची यहीं खत्म नहीं होती।
ऐसी कई फिल्में हैं, जिन पर धर्म, इतिहास, नैतिकता और राजनीति के अलग-अलग कारणों से सवाल उठे—और उनकी कहानियां भी कम दिलचस्प नहीं हैं।
7. ओएमजी 2 (2023): जब सेक्स एजुकेशन पर बनी फिल्म विवादों के घेरे में आ गई
अक्षय कुमार स्टारर ओएमजी 2 की कहानी सेक्स एजुकेशन जैसे संवेदनशील विषय के आसपास घूमती थी।
फिल्म का उद्देश्य किशोरों के बीच जागरूकता बढ़ाना बताया गया, लेकिन रिलीज से पहले ही इसे लेकर बहस शुरू हो गई।
सेंसर बोर्ड ने फिल्म में कई बदलाव सुझाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ दृश्यों और संवादों को संशोधित किया गया।
दिलचस्प बात यह रही कि जिस विषय पर लोग खुलकर बात करने से बचते हैं, उसी विषय ने फिल्म को राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बना दिया।
कई दर्शकों ने इसे जरूरी फिल्म बताया, जबकि कुछ समूहों ने इसकी प्रस्तुति पर सवाल उठाए।
लेकिन अगर आपको लगता है कि धार्मिक विवादों की सबसे बड़ी कहानी यही थी, तो अगली फिल्म का मामला और भी ज्यादा चर्चा में रहा।
8. दा विंची कोड (हिंदी रिलीज विवाद): जब विदेशी फिल्म ने भारत में भी विवाद पैदा कर दिया
हालांकि यह बॉलीवुड फिल्म नहीं थी, लेकिन भारत में इसकी रिलीज को लेकर जबरदस्त बहस हुई।
फिल्म में ईसाई धर्म से जुड़े कुछ कथित विवादित पहलू दिखाए गए थे।
कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए।
कुछ जगहों पर रिलीज को लेकर शर्तें लगाई गईं।
इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या फिल्मों को धार्मिक मान्यताओं की सीमाओं में रहकर ही कहानी कहनी चाहिए, या फिर कला को पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए?
यह बहस आज भी खत्म नहीं हुई है।
और इसी बहस के बीच एक ऐसी फिल्म आई जिसने इतिहास और राजनीति को आमने-सामने खड़ा कर दिया।
9. जोधा अकबर (2008): इतिहास की व्याख्या और विरोध का बड़ा मामला
आशुतोष गोवारिकर की जोधा अकबर रिलीज होते ही विवादों में घिर गई।
कुछ राजपूत संगठनों ने दावा किया कि फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए।
फिल्म के खिलाफ याचिकाएं भी दायर की गईं।
हालांकि इतिहासकारों के बीच भी इस विषय पर अलग-अलग मत रहे।
फिल्म अंततः रिलीज हुई और दर्शकों ने इसे पसंद भी किया।
लेकिन यह मामला दिखाता है कि भारत में इतिहास पर आधारित फिल्म बनाना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
और फिर आया एक ऐसा दौर, जब विवाद केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहे।
10. फायर (1996): जब समाज बदल रहा था, लेकिन बहस उससे भी तेज थी
दीपा मेहता की फिल्म फायर भारतीय सिनेमा में एक अलग तरह की कहानी लेकर आई थी।
फिल्म में दो महिलाओं के रिश्ते को दिखाया गया था।
उस समय भारतीय समाज में इस तरह के विषयों पर खुलकर चर्चा बहुत कम होती थी।
रिलीज के बाद कुछ संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए।
कई सिनेमाघरों में प्रदर्शन हुए।
दूसरी तरफ फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।
आज पीछे मुड़कर देखने पर यह फिल्म भारतीय सिनेमा में सामाजिक बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।
लेकिन विवादों की सूची अभी पूरी नहीं हुई थी।
11. ब्लैक फ्राइडे (2004): एक फिल्म जो बनी, लेकिन रिलीज का इंतजार करती रही
अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे 1993 मुंबई बम धमाकों की घटनाओं पर आधारित थी।
फिल्म तैयार हो चुकी थी, लेकिन कानूनी कारणों से इसकी रिलीज लंबे समय तक अटक गई।
मामला अदालत तक पहुंचा।
कई वर्षों बाद फिल्म को रिलीज की अनुमति मिली।
रिलीज के बाद इसे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिना गया।
यह उदाहरण बताता है कि कभी-कभी विवाद फिल्म की सामग्री से ज्यादा उसके समय से जुड़ा होता है।
लेकिन अगली फिल्म ने यह साबित कर दिया कि विवाद और बॉक्स ऑफिस साथ-साथ भी चल सकते हैं।
12. द केरला स्टोरी (2023): फिल्म से ज्यादा चर्चा उसके दावों पर हुई
सुदीप्तो सेन निर्देशित द केरला स्टोरी रिलीज से पहले ही राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई।
फिल्म के कथानक और उसमें किए गए कुछ दावों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
कुछ लोगों ने फिल्म का समर्थन किया।
वहीं कई आलोचकों और संगठनों ने इसकी प्रस्तुति पर सवाल उठाए।
कई कानूनी चुनौतियां भी सामने आईं।
विवादों के बीच फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर मजबूत प्रदर्शन किया।
यह उन फिल्मों में शामिल हो गई जिनके बारे में लोगों ने थिएटर से ज्यादा टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर बात की।
13. राम तेरी गंगा मैली (1985): जब एक फिल्म के कुछ दृश्यों ने पूरे देश में बहस छेड़ दी
राज कपूर निर्देशित राम तेरी गंगा मैली अपने दौर की सबसे सफल फिल्मों में गिनी जाती है। लेकिन जितनी चर्चा इसकी कहानी और संगीत की हुई, उतनी ही बहस इसके कुछ दृश्यों को लेकर भी हुई।
फिल्म में अभिनेत्री मंदाकिनी पर फिल्माए गए कुछ दृश्यों को उस समय के हिसाब से बेहद बोल्ड माना गया। कई सामाजिक संगठनों ने आपत्ति जताई और इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया। हालांकि फिल्म पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं लगा और यह सिनेमाघरों में सफलतापूर्वक प्रदर्शित हुई।
दिलचस्प बात यह रही कि विवाद के बावजूद दर्शकों ने फिल्म को हाथों-हाथ लिया। इसने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई की और आज भी भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शामिल की जाती है। यह उन शुरुआती फिल्मों में से एक थी, जिसने यह दिखाया कि सामाजिक बहस और व्यावसायिक सफलता साथ-साथ चल सकती हैं।
14. किस्सा कुर्सी का (1977): जब एक फिल्म सिर्फ विवाद में नहीं, इतिहास का हिस्सा बन गई
अगर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों की बात होगी, तो किस्सा कुर्सी का का नाम जरूर लिया जाएगा।
निर्देशक अमृत नाहटा की यह फिल्म तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य मानी जाती थी। आपातकाल (Emergency) के दौरान फिल्म गंभीर विवादों में घिर गई। उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, फिल्म के प्रिंट जब्त कर लिए गए और बाद में उनके नष्ट किए जाने का मामला भी सामने आया।
आपातकाल समाप्त होने के बाद यह मुद्दा अदालत तक पहुंचा और लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा। आज भी किस्सा कुर्सी का भारतीय सिनेमा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक हस्तक्षेप के सबसे चर्चित उदाहरणों में गिनी जाती है।
15. माय नेम इज़ खान (2010): जब फिल्म से ज्यादा उसके अभिनेता पर छिड़ गई बहस
शाहरुख खान और काजोल अभिनीत माय नेम इज़ खान रिलीज से पहले ही राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई थी।
विवाद फिल्म की कहानी को लेकर नहीं था। दरअसल, आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को लेकर शाहरुख खान के एक सार्वजनिक बयान के बाद कुछ राजनीतिक संगठनों ने फिल्म का विरोध शुरू कर दिया। कई शहरों में प्रदर्शन हुए और मुंबई के कई सिनेमाघरों में अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ी।
हालांकि तमाम विरोध के बावजूद फिल्म तय समय पर रिलीज हुई और भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल की। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि कभी-कभी किसी फिल्म का विवाद उसकी कहानी से नहीं, बल्कि उससे जुड़े कलाकारों के सार्वजनिक बयानों से भी पैदा हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या विवाद फिल्मों को सफल बना देता है?
यह सवाल दशकों से पूछा जा रहा है।
हर विवादित फिल्म हिट नहीं होती।
और हर हिट फिल्म विवादित नहीं होती।
लेकिन इतना जरूर है कि विवाद किसी फिल्म को चर्चा के केंद्र में ला सकता है।
पद्मावत, पीके, द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि जब कोई फिल्म सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक मुद्दों को छूती है, तो उसकी चर्चा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती।
हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है।
विवाद के कारण कई बार कलाकारों, निर्माताओं और दर्शकों के बीच तनाव पैदा होता है।
यही कारण है कि फिल्म निर्माण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।
निष्कर्ष
बॉलीवुड की सबसे विवादित फिल्मों की यह सूची केवल फिल्मों की सूची नहीं है, बल्कि भारतीय समाज, राजनीति, इतिहास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बदलते दौर का दस्तावेज भी है।
इन फिल्मों ने कभी धार्मिक आस्थाओं पर बहस छेड़ी, कभी ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर सवाल खड़े किए, तो कभी सामाजिक बदलाव और राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दी। कई फिल्मों को अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ा, कई को सेंसर बोर्ड के साथ लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और कुछ को विरोध प्रदर्शनों के बीच रिलीज होना पड़ा।
फिर भी एक बात लगभग हर विवादित फिल्म में समान रही—इन फिल्मों ने लोगों को सोचने, बहस करने और अपनी राय बनाने पर मजबूर किया।
शायद यही सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत है। पर्दे पर कहानी भले ही तीन घंटे में खत्म हो जाए, लेकिन उससे जुड़ी बहस कई बार वर्षों तक समाज में गूंजती रहती है। और यही वजह है कि पद्मावत, उड़ता पंजाब, पीके, द कश्मीर फाइल्स, ओएमजी 2, बैंडिट क्वीन, जोधा अकबर, फायर, ब्लैक फ्राइडे, द केरला स्टोरी, राम तेरी गंगा मैली, किस्सा कुर्सी का और माय नेम इज़ खान जैसी फिल्में आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे चर्चित और विवादित फिल्मों के रूप में याद की जाती हैं।
