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| एक्शन का असली बादशाह |
एक 13 साल का लड़का घर से भागकर बिना टिकट मुंबई पहुंचता है।
जेब में पैसे नहीं, सिर पर छत नहीं और पेट में कई दिनों की भूख।
कभी जेल की हवा खानी पड़ती है, कभी टैक्सी धोने के बदले सोने की जगह मिलती है।
लेकिन यही लड़का आगे चलकर हिंदी सिनेमा का ऐसा नाम बनता है, जिसके बिना 70, 80 और 90 के दशक की एक्शन फिल्मों का इतिहास अधूरा माना जाता है।
यह कहानी है वीरू देवगन की—उस शख्स की, जिसने सिर्फ स्टंट नहीं बनाए, बल्कि बॉलीवुड के एक्शन का पूरा व्याकरण बदल दिया। कम लोग जानते हैं कि अजय देवगन की सफलता के पीछे सिर्फ पिता का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान का संघर्ष छिपा था जिसने जिंदगी को सड़क से उठाकर सिल्वर स्क्रीन तक पहुंचाया।
वीरू देवगन का असली नाम वीरेंद्र हरजीदास देवगन था।
उनका जन्म 25 जून 1934 को अमृतसर में हुआ था। लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था। किशोरावस्था में ही उन्होंने घर छोड़ दिया और अकेले मुंबई पहुंच गए।
मुंबई में उनका स्वागत सपनों ने नहीं, संघर्षों ने किया।
बिना टिकट यात्रा करने की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। बाद में एक टैक्सी चालक ने उन्हें यह कहकर रहने की जगह दी कि वे रोज उसकी टैक्सी साफ करेंगे।
यहीं से शुरू हुई उस लड़के की असली लड़ाई।
यह वीरू देवगन की जिंदगी का वह हिस्सा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
अजय देवगन ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि उनके पिता कभी मुंबई के सायन-कोलीवाड़ा इलाके के गैंग कल्चर का हिस्सा भी रहे थे। वह दौर बेहद कठिन था और जीवित रहने के लिए उन्हें हर तरह के संघर्ष से गुजरना पड़ा।
उन्होंने बढ़ई का काम किया।
छोटे-मोटे रोजगार किए।
लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ अभी आना बाकी था।
किस्मत अक्सर अनोखे तरीके से दस्तक देती है।
एक दिन सड़क पर हुई लड़ाई में मशहूर एक्शन डायरेक्टर रवि खन्ना की नजर वीरू देवगन पर पड़ी। उनके फाइटिंग स्टाइल और फुर्ती ने रवि खन्ना को प्रभावित कर दिया।
उन्होंने वीरू को अगले दिन मिलने के लिए बुलाया।
यहीं से फिल्मों की दुनिया का दरवाजा खुल गया।
किसी फिल्मी परिवार का सहारा नहीं था।
कोई गॉडफादर नहीं था।
सिर्फ हुनर, मेहनत और जिंदगी से लड़ने का जज्बा था।
शुरुआत स्टंटमैन के तौर पर हुई।
धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक्शन कोरियोग्राफर के रूप में स्थापित किया।
1974 में आई फिल्म रोटी कपड़ा और मकान उनके करियर की बड़ी शुरुआत साबित हुई। इसके बाद पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी।
आने वाले दशकों में उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया।
यह संख्या अपने आप में एक रिकॉर्ड जैसी लगती है।
लेकिन इससे भी बड़ी बात थी उनका प्रभाव।
बॉलीवुड में एक समय ऐसा था जब बड़े सितारे यह जानना चाहते थे कि फिल्म का एक्शन कौन डिजाइन कर रहा है।
अगर जवाब होता—वीरू देवगन।
तो भरोसा अपने आप बढ़ जाता था।
कई रिपोर्टों और फिल्मी हस्तियों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे महान एक्शन निर्देशक कहा। धर्मेंद्र, जीतेंद्र और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कलाकारों ने सार्वजनिक रूप से उनके काम की तारीफ की थी।
कहा जाता था कि वीरू देवगन हर हीरो को स्क्रीन पर ज्यादा दमदार और नायकत्व से भरपूर बना देते थे।
वीरू देवगन ने जिन फिल्मों में एक्शन डिजाइन किया, उनमें कई आज भी क्लासिक मानी जाती हैं।
इनमें मिस्टर नटवरलाल, क्रांति, प्रेम रोग, राम तेरी गंगा मैली, आज का अर्जुन, फूल और कांटे, जिगर और अनेक सुपरहिट फिल्में शामिल हैं।
इन फिल्मों का एक्शन आज के वीएफएक्स युग से अलग था।
उस दौर में असली जोखिम होते थे।
स्टंटमैन सचमुच आग में कूदते थे।
गाड़ियों के असली एक्सीडेंट शूट होते थे।
और इन सबके पीछे खड़े होते थे वीरू देवगन।
आज सोशल मीडिया पर अक्सर पुराने वीडियो वायरल होते हैं, जिनमें वीरू देवगन सेट पर कलाकारों को समझाते दिखाई देते हैं।
उनकी खासियत सिर्फ स्टंट डिजाइन करना नहीं थी।
वह कलाकारों के डर को भी समझते थे।
किस कलाकार की सीमा क्या है, कौन सा शॉट कितना जोखिम भरा है और उसे कैसे सुरक्षित बनाना है—इसका अनुभव उनके पास था।
यही वजह थी कि इंडस्ट्री में उन्हें बेहद सम्मान मिलता था।
अगर बॉलीवुड के सबसे आइकॉनिक एंट्री सीन की बात होगी, तो फूल और कांटे का नाम जरूर आएगा।
दो मोटरसाइकिलों पर पैर रखकर खड़े अजय देवगन का वह दृश्य आज भी याद किया जाता है।
लेकिन कम लोग जानते हैं कि उस एक्शन सोच के पीछे वीरू देवगन की वर्षों की समझ और अनुभव था।
उन्होंने अपने बेटे को बचपन से ही स्टंट, अनुशासन और मेहनत का महत्व सिखाया।
अजय देवगन ने कई बार स्वीकार किया है कि फिल्मों को समझने की उनकी पहली पाठशाला उनके पिता ही थे।
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है।
लेकिन वीरू देवगन की कहानी सुनने के बाद इसका जवाब थोड़ा बदल जाता है।
उन्होंने अपने बेटे को अवसर जरूर दिया।
लेकिन उससे पहले उन्होंने खुद दशकों तक संघर्ष किया था।
सड़क से स्टूडियो तक पहुंचने में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी।
अजय देवगन की सफलता के पीछे एक ऐसे पिता का त्याग था, जिसने खुद भूख, गरीबी और असुरक्षा देखी थी।
आज की फिल्मों में ग्रीन स्क्रीन और कंप्यूटर ग्राफिक्स का जमाना है।
लेकिन वीरू देवगन के दौर में सब कुछ वास्तविक होता था।
कारें सचमुच टकराती थीं।
कलाकार असली लोकेशन पर शूट करते थे।
स्टंट टीम जान जोखिम में डालती थी।
यही कारण है कि उनके बनाए एक्शन दृश्यों में एक अलग ही विश्वसनीयता दिखाई देती है।
उनका काम सिर्फ तकनीक नहीं, जुनून का परिणाम था।
एक्शन मास्टर बनने के बाद वीरू देवगन ने निर्देशन की ओर भी कदम बढ़ाया।
1999 में उन्होंने हिंदुस्तान की कसम का निर्देशन और निर्माण किया। फिल्म में अजय देवगन, अमिताभ बच्चन, मनीषा कोइराला और सुष्मिता सेन जैसे बड़े सितारे थे।
हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई, लेकिन यह उनके सपनों का प्रोजेक्ट थी।
उसी वर्ष उन्होंने दिल क्या करे का निर्माण भी किया।
यह दिखाता है कि वह सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं रहना चाहते थे।
जो लोग उनके साथ काम कर चुके हैं, वे अक्सर कहते थे कि वीरू देवगन बाहर से सख्त लेकिन अंदर से बेहद संवेदनशील इंसान थे।
उनकी प्राथमिकता हमेशा टीम की सुरक्षा रहती थी।
वह नए कलाकारों और तकनीशियनों को मौका देते थे।
कई युवा एक्शन डायरेक्टर्स ने उनके मार्गदर्शन में काम सीखा।
उनके प्रभाव की झलक आज भी बॉलीवुड के एक्शन विभाग में दिखाई देती है।
वीरू देवगन सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे।
वह एक संस्था थे।
उन्होंने उस दौर में काम किया जब बॉलीवुड का एक्शन अपनी पहचान खोज रहा था।
उन्होंने एक ऐसी शैली विकसित की, जिसने आने वाले वर्षों के लिए मानक तय कर दिए।
आज जब हम बड़े-बड़े एक्शन ब्लॉकबस्टर्स देखते हैं, तो कहीं न कहीं उनकी विरासत की छाप जरूर दिखाई देती है।
वीरू देवगन के निधन के बाद अजय देवगन ने कई बार अपने पिता को याद किया।
जून 2026 में उनकी जयंती पर अजय ने एक पुराना वीडियो साझा करते हुए लिखा कि वे उन्हें प्यार और गर्व के साथ याद करते हैं।
यह सिर्फ एक बेटे का अपने पिता के लिए प्रेम नहीं था।
यह उस गुरु के लिए सम्मान था, जिसने उसे जिंदगी का हर पाठ सिखाया।
27 मई 2019 को वीरू देवगन का मुंबई में निधन हो गया।
वह कुछ समय से अस्वस्थ थे और कार्डियक अरेस्ट के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली।
उनके निधन की खबर सुनकर पूरा बॉलीवुड शोक में डूब गया।
बड़े-बड़े सितारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
लेकिन सबसे बड़ी श्रद्धांजलि शायद उनके काम ने ही दी।
क्योंकि उनका बनाया हर दृश्य आज भी जिंदा है।
अक्सर उनकी पहचान अजय देवगन के पिता के रूप में कर दी जाती है।
लेकिन असल सच इससे कहीं बड़ा है।
वह उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने अपने दम पर बॉलीवुड को खड़ा किया।
जिन्होंने संघर्ष को सफलता में बदला।
जिन्होंने जोखिम को कला बनाया।
और जिन्होंने यह साबित किया कि सपने देखने के लिए किसी बड़े परिवार का हिस्सा होना जरूरी नहीं है।
जरूरी है तो सिर्फ हिम्मत।
कैमरे के सामने खड़े लोग अक्सर इतिहास में दर्ज हो जाते हैं।
लेकिन कैमरे के पीछे काम करने वाले कई महान कलाकार गुमनाम रह जाते हैं।
वीरू देवगन उन चुनिंदा नामों में हैं, जिन्हें याद किया जाना चाहिए।
क्योंकि उन्होंने सिर्फ फिल्मों के दृश्य नहीं बनाए।
उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को प्रेरणा दी।
उनकी कहानी बताती है कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
और कभी-कभी सबसे बड़े सितारे वही होते हैं, जो रोशनी से दूर रहकर दूसरों को चमकना सिखाते हैं।
अगर वीरू देवगन उस दिन घर छोड़कर मुंबई न आते...
अगर रवि खन्ना की नजर उन पर न पड़ती...
अगर उन्होंने हार मान ली होती...
तो क्या बॉलीवुड का एक्शन इतिहास वैसा ही होता जैसा आज हम जानते हैं?
आपकी नजर में वीरू देवगन की सबसे यादगार फिल्म या स्टंट कौन सा है? अपनी राय जरूर बताइए।
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