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बॉलीवुड और ओटीटी की दुनिया में कई ऐसे कलाकार हैं, जिनके काम की हर कोई तारीफ करता है, लेकिन उन्हें लगातार बड़े मौके नहीं मिलते। 'हीरामंडी' में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीतने वाली अभिनेत्री जयति भाटिया भी खुद को ऐसी ही स्थिति में पाती हैं।
हाल ही में पत्रकार सिद्धार्थ कन्नन को दिए एक लंबे इंटरव्यू में जयति भाटिया ने सिर्फ अपने अभिनय सफर की ही नहीं, बल्कि संजय लीला भंसाली, दीपिका पादुकोण, सोनम कपूर, शरमीन सहगल और फिल्म इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 'हीरामंडी' में शानदार प्रतिक्रिया मिलने के बावजूद उनके पास उम्मीद के मुताबिक नए प्रोजेक्ट्स नहीं आए।
जयति भाटिया ने बताया कि उन्हें मुंबई आए लगभग 30 साल हो चुके हैं। शुरुआती दिनों में वह अपने पोर्टफोलियो के साथ प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स के दफ्तरों के चक्कर लगाया करती थीं। उस दौर में कास्टिंग का तरीका आज से बिल्कुल अलग था और अक्सर कलाकारों की मुलाकात सीधे फिल्म निर्माताओं से हो जाती थी।
उन्होंने कहा कि उस समय इंडस्ट्री में एक तय छवि के कलाकारों को ही प्रमुख भूमिकाएं मिलती थीं। उन्हें भी ऐसे किरदार ऑफर होते थे जो कहानी में बहुत छोटे या सीमित महत्व के होते थे। इसलिए उन्होंने केवल स्क्रीन पर दिखने के लिए कोई भी रोल स्वीकार करने के बजाय अभिनय की गुणवत्ता को प्राथमिकता दी।
इंटरव्यू में जयति भाटिया ने एक ऐसी बात कही जिसने कई लोगों का ध्यान खींचा। उन्होंने बताया कि 'हीरामंडी' में उनके अभिनय की लगभग हर तरफ सराहना हुई, लेकिन इसके बाद भी उन्हें नए प्रोजेक्ट्स के लिए उम्मीद के मुताबिक कॉल नहीं आए।
उन्होंने कहा,
"आज भी लोग मिलते हैं और कहते हैं कि आपने बहुत शानदार काम किया। सब कहते हैं कि आपके साथ काम करना चाहते हैं, लेकिन काम का ऑफर नहीं आता। शायद मेरे लिए सही किरदार अभी लिखा जा रहा हो। मैं उसी का इंतजार कर रही हूं।"
जयति का यह बयान बताता है कि मनोरंजन उद्योग में केवल तारीफ मिलना ही लगातार काम मिलने की गारंटी नहीं होता।
जयति भाटिया ने यह भी खुलासा किया कि 'हीरामंडी' के लिए उन्हें शुरुआत से नहीं चुना गया था। उनके मुताबिक इस सीरीज़ की कास्टिंग करीब दो साल तक चली और उनका नाम शुरुआती सूची में नहीं था।
उन्होंने बताया कि एक रात उन्हें अचानक ऑडिशन देने का फोन आया। अगले ही दिन ऑडिशन भेजना था क्योंकि शूटिंग शुरू होने वाली थी। जयति मानती हैं कि इस प्रोजेक्ट में उनका चयन मेहनत के साथ-साथ किस्मत का भी हिस्सा था।
'हीरामंडी' रिलीज होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी कलाकार की हुई, तो वह थीं शरमीन सहगल। सोशल मीडिया पर उनकी एक्टिंग को लेकर काफी आलोचना हुई। कई लोगों ने सवाल उठाए कि जब इंडस्ट्री में इतने अनुभवी कलाकार मौजूद हैं, तब उन्हें इतना बड़ा मौका क्यों मिला।
सिद्धार्थ कन्नन ने भी जयति भाटिया से यही सवाल किया। लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर भीड़ के साथ खड़े होने के बजाय अपना अलग नजरिया रखा।
जयति भाटिया ने स्पष्ट किया कि उन्होंने शरमीन सहगल का बचाव इसलिए नहीं किया क्योंकि उन्हें उनकी एक्टिंग बेहतरीन लगी थी। बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने शरमीन के साथ व्यक्तिगत रूप से काम किया था।
उन्होंने बताया कि 'मलाल' के समय संजय लीला भंसाली ने उन्हें शरमीन के किरदार पर काम करने के लिए बुलाया था। इससे पहले वह सोनम कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ भी कैरेक्टर बिल्डिंग पर काम कर चुकी थीं।
जयति के मुताबिक, शरमीन अभिनय सीखने को तैयार थीं और मेहनत भी करती थीं। हालांकि, उनके अभिनय का तरीका भारतीय फिल्मों की शैली से पूरी तरह मेल नहीं खाता था।
"उनके अंदर मेहनत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन समझने और स्क्रीन पर उसे निभाने के बीच कहीं न कहीं गैप रह गया।"
जयति भाटिया का मानना है कि 'हीरामंडी' जैसा जटिल किरदार निभाने के लिए लगातार मार्गदर्शन की जरूरत थी।
उन्होंने कहा कि अगर शूटिंग के दौरान कोई ऐसा व्यक्ति होता जो हर सीन को विस्तार से समझाता और अभिनय पर लगातार काम कराता, तो शरमीन का प्रदर्शन और बेहतर हो सकता था। उनके अनुसार यह मेहनत या समर्पण की कमी नहीं, बल्कि अभिनय की प्रक्रिया का अंतर था।
इंटरव्यू में सिद्धार्थ कन्नन ने यह भी पूछा कि जब दूसरे प्रतिभाशाली कलाकार देखते हैं कि उन्हें मौका नहीं मिला और किसी दूसरे कलाकार को बड़ी भूमिका मिल गई, तो क्या उन्हें तकलीफ नहीं होती?
इस सवाल पर जयति ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि "दर्द तो होता है।"
उन्होंने स्वीकार किया कि अगर उन्हें खुद 'हीरामंडी' में मौका नहीं मिला होता, तो शायद उन्हें भी वही तकलीफ महसूस होती जो दूसरे कलाकारों को होती है।
जयति भाटिया ने बताया कि 'हीरामंडी' की कास्टिंग लगभग दो साल तक चली। इस दौरान उनका नाम शुरुआती सूची में नहीं था। जब लगभग पूरी कास्ट तय हो चुकी थी, तभी एक रात उन्हें ऑडिशन का फोन आया।
उन्होंने अगले दिन ऑडिशन भेजा और आखिरकार उन्हें शो का हिस्सा बनने का मौका मिला। इसलिए वह मानती हैं कि इस प्रोजेक्ट में मेहनत के साथ-साथ किस्मत की भी बड़ी भूमिका रही।
"अगर शरमीन को किस्मत से मौका मिला, तो मुझे भी यह रोल किस्मत से ही मिला। मैं किसी का बचाव नहीं कर रही, सिर्फ अपनी सच्चाई बता रही हूं।"
जयति भाटिया ने बातचीत में यह भी बताया कि उन्होंने कभी किसी निर्देशक के दफ्तर के चक्कर लगाकर काम मांगने की कोशिश नहीं की।
उनके मुताबिक, जब भी उनकी संजय लीला भंसाली से मुलाकात हुई, उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि उन्हें उनके साथ काम करना अच्छा लगेगा। लेकिन वह बार-बार फोन करके या किसी तरह दबाव बनाकर काम मांगने में विश्वास नहीं रखतीं। उनका मानना है कि कलाकार का सबसे बड़ा परिचय उसका काम होता है।
इंटरव्यू का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब आया, जब सिद्धार्थ कन्नन ने जयति भाटिया से दीपिका पादुकोण के बारे में सवाल किया। जयति ने बताया कि उन्हें 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' के दौरान दीपिका के किरदार 'लीला' की कैरेक्टर बिल्डिंग में मदद करने का मौका मिला था। उनका काम था अभिनेत्री को किरदार के भाव और व्यक्तित्व को बेहतर ढंग से समझने में सहयोग देना।
जयति के मुताबिक, दीपिका से उनकी पहली मुलाकात कई साल पहले अनुपम खेर के अभिनय संस्थान में हुई थी। उस समय दीपिका को सलाह दी गई थी कि वह अपनी हिंदी पर काम करें। जयति ने याद किया कि उनसे अंग्रेज़ी में सवाल पूछे गए, लेकिन दीपिका ने जानबूझकर हिंदी में जवाब दिए। यही बात उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित कर गई।
"मुझे तभी लगा था कि इस लड़की में सीखने की जबरदस्त इच्छा है। जो कहा गया, उसे पूरी ईमानदारी से अपनाने की कोशिश कर रही थी।"
जयति भाटिया ने बताया कि दीपिका के साथ लगभग एक सप्ताह तक वर्कशॉप की योजना थी। रोज़ कई घंटे दोनों साथ काम करते थे। लेकिन चार दिन बाद ही उन्हें महसूस हो गया कि अब दीपिका को अतिरिक्त मार्गदर्शन की जरूरत नहीं है।
उन्होंने खुद संजय लीला भंसाली से कहा कि दीपिका अब पूरी तरह किरदार में उतर चुकी हैं और आगे वह निर्देशक के विज़न को आसानी से निभा लेंगी।
जयति ने कहा,
"वह निडर अभिनेत्री बन चुकी थीं। जो भी चुनौती मिले, उसे स्वीकार करने के लिए तैयार थीं। उनमें सीखने की भूख साफ दिखाई देती थी।"
बातचीत के दौरान जयति ने दीपिका के प्रोफेशनल रवैये की भी खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि जब भी वह वर्कशॉप में आती थीं, पूरी तरह उसी काम पर फोकस करती थीं।
जयति के अनुसार, उन चार घंटों में उन्हें कभी महसूस नहीं हुआ कि दीपिका किसी व्यक्तिगत संघर्ष या मानसिक दबाव से गुजर रही हैं। वह हर सुझाव को ध्यान से सुनती थीं और कई बार उम्मीद से भी बेहतर करके दिखाती थीं।
सिद्धार्थ कन्नन ने जब सोनम कपूर के अभिनय पर राय पूछी, तो जयति भाटिया ने बेहद संतुलित जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सोनम एक बेहद अच्छी इंसान, पढ़ी-लिखी और संस्कारी हैं। एक कलाकार के रूप में उन्होंने कई फिल्मों में अच्छा काम किया, खासकर 'नीरजा' में उनका अभिनय उन्हें काफी प्रभावशाली लगा।
हालांकि, जयति का मानना है कि अगर सोनम अपनी आवाज़ और डायलॉग डिलीवरी पर थोड़ा और काम करतीं, तो उनके अभिनय का असर और गहरा हो सकता था।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी अभिनेता की कमियों की जिम्मेदारी केवल कलाकार की नहीं होती, बल्कि निर्देशक और पूरी टीम की भी होती है। फिल्म के सेट पर हर प्रदर्शन को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी सामूहिक होती है।
जयति ने बताया कि संजय लीला भंसाली के साथ उनकी मुलाकातों में सिर्फ किरदारों की चर्चा नहीं होती थी। संगीत, नृत्य, अभिनय की प्रक्रिया और फिल्मों की बारीकियों पर भी लंबी बातचीत होती थी।
फिर भी उन्होंने कभी भंसाली से सीधे काम नहीं मांगा। उनका मानना है कि कलाकार को अपने काम से पहचाना जाना चाहिए, न कि बार-बार अवसर मांगकर। यही वजह है कि उन्होंने हमेशा अपने अभिनय को ही अपनी सबसे बड़ी सिफारिश माना।
जयति भाटिया का यह इंटरव्यू सिर्फ 'हीरामंडी' या संजय लीला भंसाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे कलाकार की कहानी भी है जिसने तीन दशक तक लगातार काम किया, अपने अभिनय से पहचान बनाई, लेकिन आज भी नए और चुनौतीपूर्ण किरदारों का इंतजार कर रही हैं।
बातचीत के दौरान उन्होंने किसी पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने दीपिका पादुकोण की मेहनत और सीखने की इच्छा की तारीफ की, सोनम कपूर के अभिनय पर संतुलित राय रखी और शरमीन सहगल को लेकर भी भीड़ की राय से अलग एक मानवीय नजरिया पेश किया। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि फिल्म इंडस्ट्री में मेहनत के साथ किस्मत का भी बड़ा योगदान होता है।
यही वजह है कि यह इंटरव्यू सिर्फ बॉलीवुड की अंदरूनी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक अनुभवी अभिनेत्री की सोच, संघर्ष और प्रोफेशनल ईमानदारी को भी सामने लाता है।
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