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| राजीव कपूर: अधूरी रह गई वापसी! |
कुछ कलाकारों की पहचान उनकी फिल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उस एक किरदार से बनती है जो सालों बाद भी दर्शकों की यादों में जिंदा रहता है। राजीव कपूर भी ऐसे ही अभिनेता थे।
25 अगस्त 1962 को जन्मे राजीव कपूर हिंदी सिनेमा के उस प्रतिष्ठित कपूर परिवार से आते थे, जिसने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को कई बड़े सितारे दिए। उनके पिता थे शोमैन राज कपूर, जबकि बड़े भाई रणधीर कपूर और ऋषि कपूर भी हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता रहे। लेकिन राजीव कपूर की कहानी सिर्फ एक स्टार परिवार के बेटे की कहानी नहीं थी।
उन्होंने अभिनय में कदम रखा, पिता की फिल्म में बतौर हीरो नजर आए, सफलता का स्वाद चखा, फिर अभिनय से दूरी बनाकर निर्देशन और फिल्म निर्माण की ओर बढ़े। उनकी जिंदगी में उतार-चढ़ाव भी आए और निजी रिश्तों में भी मुश्किलें रहीं।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जब दर्शकों को लगा कि राजीव कपूर का फिल्मी सफर पीछे छूट चुका है, तब करीब तीन दशक बाद वह ‘Toolsidas Junior’ के जरिए पर्दे पर वापसी की तैयारी कर रहे थे। लेकिन फिल्म रिलीज होने से पहले ही 9 फरवरी 2021 को उनका निधन हो गया।
उनकी आखिरी फिल्म मरणोपरांत 2022 में रिलीज हुई और इस तरह राजीव कपूर की सिनेमाई कहानी एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जहां एक नई शुरुआत होने वाली थी।
राजीव कपूर का जन्म मुंबई में राज कपूर और कृष्णा राज कपूर के घर हुआ था। वह परिवार के सबसे छोटे बेटे थे। उनके बड़े भाई रणधीर कपूर और ऋषि कपूर ने अभिनय में अपनी मजबूत पहचान बनाई, जबकि उनकी बहनें रितु नंदा और रीमा जैन भी कपूर परिवार की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं।
उनका बचपन ऐसे परिवार में बीता जहां सिनेमा सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
राज कपूर हिंदी सिनेमा के बड़े अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थे। आर.के. स्टूडियो और आर.के. फिल्म्स का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में खास स्थान रखता है।
ऐसे परिवार में पैदा होने का फायदा यह जरूर था कि राजीव कपूर को फिल्म इंडस्ट्री को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला। लेकिन इसके साथ एक बड़ी चुनौती भी थी—अपने पिता और भाइयों की स्थापित पहचान के बीच खुद के लिए जगह बनाना।
राजीव कपूर को परिवार में प्यार से ‘चिम्पू’ भी कहा जाता था।
राजीव कपूर ने साल 1983 में फिल्म ‘एक जान हैं हम’ से बतौर अभिनेता बॉलीवुड में कदम रखा। इस फिल्म में उनके साथ दिव्या राणा नजर आई थीं।
यह वह दौर था जब हिंदी सिनेमा में कई स्टार परिवारों के नए चेहरे लॉन्च हो रहे थे।
राजीव कपूर के सामने भी एक बड़ा नाम था—राज कपूर का बेटा होने का नाम।
लेकिन किसी मशहूर परिवार से आने के बावजूद दर्शकों के बीच लंबे समय तक टिकना आसान नहीं था। अभिनेता के तौर पर राजीव कपूर ने ‘आसमान’, ‘लवर बॉय’, ‘मेरा साथी’, ‘लावा’, ‘जबरदस्त’, ‘प्रीति’, ‘जिम्मेदार’ और ‘हम तो चले परदेस’ जैसी फिल्मों में काम किया।
उनकी फिल्मों में रोमांस, एक्शन और पारिवारिक ड्रामा जैसे अलग-अलग रंग देखने को मिले।
लेकिन जिस फिल्म ने राजीव कपूर को वह पहचान दी, जिसके लिए उन्हें आज भी सबसे ज्यादा याद किया जाता है, वह थी ‘राम तेरी गंगा मैली’।
साल 1985 में राज कपूर ने अपनी आखिरी निर्देशित फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ बनाई।
इस फिल्म में राजीव कपूर ने नरेंद्र यानी ‘नरेन’ का किरदार निभाया था और उनके साथ अभिनेत्री मंदाकिनी मुख्य भूमिका में थीं।
यह फिल्म सिर्फ राज कपूर के करियर की आखिरी निर्देशित फिल्म नहीं थी, बल्कि राजीव कपूर के अभिनय करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म भी बन गई।
फिल्म की कहानी गंगा नाम की युवती की जिंदगी और उसके संघर्ष के माध्यम से सामाजिक और मानवीय मुद्दों को सामने रखती थी।
फिल्म के गीत, कहानी, सिनेमैटोग्राफी और राज कपूर की निर्देशन शैली ने इसे उस दौर की बड़ी फिल्मों में शामिल कर दिया।
‘राम तेरी गंगा मैली’ बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल रही। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी इसे उस समय की बड़ी सफल फिल्मों में गिना और बताया कि मुंबई में इसे डायमंड जुबली सफलता मिली थी।
राजीव कपूर के लिए यह फिल्म इसलिए भी खास थी क्योंकि इसमें वह अपने पिता के निर्देशन में मुख्य अभिनेता के रूप में नजर आए।
एक तरफ पिता राज कपूर का विशाल सिनेमाई कद था, दूसरी तरफ राजीव के कंधों पर मुख्य भूमिका की जिम्मेदारी।
फिल्म की सफलता ने उन्हें रातोंरात चर्चित बना दिया।
लेकिन यही सफलता उनके लिए आगे के करियर को स्थायी ऊंचाई देने में बदल नहीं सकी।
‘राम तेरी गंगा मैली’ की सफलता के बाद स्वाभाविक उम्मीद थी कि राजीव कपूर लगातार बड़े प्रोजेक्ट्स में दिखाई देंगे।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन कोई भी फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकी।
उनकी फिल्मोग्राफी में ‘लवर बॉय’, ‘जबरदस्त’, ‘मेरा साथी’, ‘हम तो चले परदेस’, ‘शुक्रिया’, ‘नाग नागिन’ और ‘जिम्मेदार’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
यहां राजीव कपूर की कहानी हिंदी सिनेमा के उन कई कलाकारों जैसी दिखाई देती है, जिन्होंने एक बड़ी हिट के बाद खुद को लगातार उसी स्तर पर स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
राजीव ने धीरे-धीरे महसूस किया कि शायद उनका रास्ता सिर्फ कैमरे के सामने नहीं है।
और यहीं से उनके करियर का दूसरा अध्याय शुरू हुआ।
1990 के दशक में राजीव कपूर ने अभिनय से दूरी बनाकर फिल्म निर्माण और निर्देशन की तरफ कदम बढ़ाया।
वह सिर्फ अभिनेता बने रहने के बजाय फिल्म बनाने की प्रक्रिया के दूसरे हिस्सों को समझने लगे।
उन्होंने अपने परिवार के प्रतिष्ठित आर.के. बैनर से जुड़ी कई फिल्मों में निर्माण संबंधी जिम्मेदारियां संभालीं।
1991 में आई ‘हिना’ उनके करियर के इस बदलाव की महत्वपूर्ण फिल्म थी। इस फिल्म का निर्देशन उनके बड़े भाई रणधीर कपूर ने किया था और राजीव कपूर इससे निर्माण पक्ष से जुड़े थे।
‘हिना’ में पाकिस्तानी अभिनेत्री जेबा बख्तियार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म को भारत में अच्छी प्रतिक्रिया मिली और यह आर.के. फिल्म्स की चर्चित फिल्मों में शामिल हुई।
फिल्म भारत की ओर से 1991 में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी में ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि भी बनी, हालांकि इसे नामांकन नहीं मिला।
राजीव कपूर के लिए यह सिर्फ एक फिल्म का अनुभव नहीं था।
यह उस बदलाव का संकेत था जिसमें वह अभिनेता से निर्माता और फिल्ममेकर की भूमिका में आगे बढ़ रहे थे।
राजीव कपूर ने 1996 में निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा।
उन्होंने फिल्म ‘प्रेम ग्रंथ’ का निर्देशन किया। फिल्म में उनके भाई ऋषि कपूर और माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिकाओं में थे।
‘प्रेम ग्रंथ’ एक गंभीर विषय पर आधारित फिल्म थी। कहानी में यौन हिंसा और उसके बाद महिला के जीवन पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव जैसे संवेदनशील मुद्दे उठाए गए थे।
फिल्म को थॉमस हार्डी के उपन्यास Tess of the d'Urbervilles से प्रेरित माना जाता है।
यह फिल्म व्यावसायिक रूप से बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई, लेकिन राजीव कपूर के लिए इसका महत्व इसलिए था क्योंकि इससे उन्होंने यह दिखाया कि वह कैमरे के सामने ही नहीं, कैमरे के पीछे भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे।
वह इसके निर्देशन के साथ संपादन से भी जुड़े थे।
राजीव कपूर के फिल्म निर्माण करियर में 1999 की ‘आ अब लौट चलें’ भी महत्वपूर्ण रही।
इस फिल्म का निर्देशन उनके भाई ऋषि कपूर ने किया था। फिल्म में ऐश्वर्या राय, अक्षय खन्ना और राजेश खन्ना जैसे कलाकार नजर आए।
राजीव कपूर फिल्म के निर्माण पक्ष से जुड़े थे और आर.के. बैनर के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट था।
यह फिल्म उनके निर्माता के रूप में सक्रिय दौर की प्रमुख कड़ियों में से एक थी।
इसके बाद राजीव कपूर लंबे समय तक अभिनय और मुख्यधारा के फिल्म निर्माण से दूर रहे।
उनकी सार्वजनिक मौजूदगी भी पहले की तुलना में काफी कम हो गई।
राजीव कपूर ने अपने अभिनय करियर में हिंदी सिनेमा के कई चर्चित कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा की।
‘राम तेरी गंगा मैली’ में उनके साथ मंदाकिनी और दिव्या राणा थीं।
‘लवर बॉय’ और दूसरी फिल्मों में उन्होंने उस दौर की कई लोकप्रिय अभिनेत्रियों के साथ काम किया।
उनकी फिल्मोग्राफी में अमृता सिंह, पद्मिनी कोल्हापुरे, मीनाक्षी शेषाद्रि, डिंपल कपाड़िया, रति अग्निहोत्री, टीना मुनीम और किमी काटकर जैसे नाम भी जुड़े हैं।
फिल्म निर्माण और निर्देशन की दुनिया में उनके सहयोग का दायरा और बड़ा हो गया।
‘प्रेम ग्रंथ’ में उन्होंने ऋषि कपूर और माधुरी दीक्षित के साथ काम किया, जबकि ‘हिना’ में आर.के. परिवार के साथ उनका महत्वपूर्ण जुड़ाव रहा।
बाद के दौर में ‘Toolsidas Junior’ में उन्होंने संजय दत्त के साथ स्क्रीन साझा की।
राजीव कपूर की निजी जिंदगी हमेशा उनके फिल्मी करियर जितनी सार्वजनिक नहीं रही।
उन्होंने 2001 में आर्किटेक्ट आरती सभरवाल से शादी की थी। हालांकि यह रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चल सका और 2003 में दोनों का तलाक हो गया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, इस शादी से उनके कोई बच्चे नहीं थे।
तलाक के बाद राजीव कपूर ने दोबारा शादी नहीं की।
उनके निजी जीवन को लेकर समय-समय पर कई तरह की मीडिया रिपोर्ट्स और अफवाहें भी सामने आईं। हालांकि उन सभी दावों को तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
राजीव कपूर खुद भी कई कथित रिश्तों से जुड़ी अफवाहों को खारिज कर चुके थे। इसलिए उनके निजी जीवन की चर्चा करते समय उन्हीं बातों तक सीमित रहना बेहतर है जिन्हें विश्वसनीय स्रोतों से पुष्ट किया जा सकता है।
यह सवाल उनके करियर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
एक तरफ उनके पास ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी बड़ी सफलता थी, दूसरी तरफ वह उस सफलता को लंबे समय तक दोहरा नहीं सके।
लेकिन इसे केवल ‘असफल अभिनेता’ की कहानी कहना उनके पूरे करियर के साथ न्याय नहीं होगा।
राजीव कपूर ने अभिनय के बाद निर्देशन और निर्माण में हाथ आजमाया।
उन्होंने अपने परिवार के फिल्मी बैनर से जुड़े प्रोजेक्ट्स में काम किया और अपनी रचनात्मक पहचान बनाने की कोशिश की।
उनका करियर यह बताता है कि फिल्म इंडस्ट्री में पहचान सिर्फ एक रास्ते से नहीं बनती।
कभी अभिनेता के रूप में सफलता मिलती है, कभी निर्माता या निर्देशक के रूप में खुद को साबित करने की कोशिश करनी पड़ती है।
राजीव कपूर को 1998 में फिल्मफेयर की ओर से आर.के. बैनर के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सम्मान मिला था।
फिल्मफेयर की आधिकारिक विजेताओं की सूची में यह सम्मान दर्ज है।
यह व्यक्तिगत अभिनय पुरस्कार नहीं था, बल्कि आर.के. बैनर की विरासत से जुड़ा सम्मान था।
फिर भी राजीव कपूर के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि वह उस फिल्मी विरासत के सक्रिय सदस्य थे, जिसे उनके पिता राज कपूर ने स्थापित किया था।
राजीव कपूर की कुल संपत्ति या नेट वर्थ को लेकर इंटरनेट पर कई आंकड़े मिलते हैं, लेकिन उनके निधन के समय उनकी संपत्ति की कोई ऐसी आधिकारिक और विश्वसनीय सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर निश्चित रकम बताई जा सके।
इसलिए उनकी नेट वर्थ के बारे में किसी अनुमानित करोड़ों की रकम को तथ्य के तौर पर लिखना सही नहीं होगा।
इतना जरूर कहा जा सकता है कि वह कपूर परिवार और आर.के. फिल्म्स की विरासत से जुड़े हुए थे और फिल्म निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रहे थे।
लेकिन व्यक्तिगत संपत्ति, बैंक बैलेंस, निवेश या विरासत की सटीक राशि सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
इसलिए राजीव कपूर की नेट वर्थ को लेकर कोई निश्चित आंकड़ा देना उचित नहीं है।
राजीव कपूर की सार्वजनिक छवि उनके भाइयों या भतीजे रणबीर कपूर जितनी लगातार मीडिया में नहीं रही।
वह बाद के वर्षों में काफी निजी जीवन जीते थे।
फिल्मी पार्टियों और लगातार मीडिया कवरेज के केंद्र में रहने के बजाय वह अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक दिखाई देते थे।
उनके बारे में प्रकाशित स्मृतियों में परिवार के साथ उनके संबंधों का उल्लेख मिलता है। खासकर कपूर परिवार की अगली पीढ़ी के साथ उनके लगाव की बातें सामने आई हैं।
लेकिन उनकी निजी जीवनशैली, संपत्ति या खर्चों को लेकर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मिलने वाले अपुष्ट दावों को तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
राजीव कपूर की कहानी का सबसे भावुक अध्याय उनकी आखिरी फिल्म ‘Toolsidas Junior’ है।
कई वर्षों तक फिल्मों से दूर रहने के बाद उन्होंने अभिनय में वापसी का फैसला किया।
फिल्म में उनके साथ संजय दत्त और वरुण बुद्धदेव प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म की कहानी स्नूकर के खेल और पिता-पुत्र के रिश्ते के इर्द-गिर्द बुनी गई थी।
राजीव कपूर ने फिल्म में टूल्सीदास का किरदार निभाया।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों से पहले फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली थी।
अशुतोष गोवारिकर ने बाद में राजीव कपूर के साथ अपने लंबे जुड़ाव के बारे में भी बात की और बताया कि वह उन्हें उनके शुरुआती दिनों से जानते थे।
फिल्म में राजीव कपूर की वापसी इसलिए भी खास थी क्योंकि वह करीब तीन दशक के अंतराल के बाद पर्दे पर दिखाई देने वाले थे।
9 फरवरी 2021 को राजीव कपूर का मुंबई में निधन हो गया।
परिवार के अनुसार उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। उनके भाई रणधीर कपूर ने भी उनके निधन की पुष्टि की थी। अस्पताल ले जाने के बाद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। वह सिर्फ 58 वर्ष के थे।
उनके निधन की खबर ने कपूर परिवार और पूरी फिल्म इंडस्ट्री को झकझोर दिया।
यह विडंबना थी कि जिस समय राजीव कपूर एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौटने वाले थे, उसी समय जिंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया।
उनकी आखिरी फिल्म अभी दर्शकों तक पहुंची भी नहीं थी।
राजीव कपूर के निधन के बाद उनकी आखिरी फिल्म को लेकर दर्शकों में स्वाभाविक उत्सुकता थी।
‘Toolsidas Junior’ 2022 में रिलीज हुई और इसमें राजीव कपूर को मरणोपरांत स्क्रीन पर देखा गया।
फिल्म में वह टूल्सीदास के किरदार में थे, जबकि संजय दत्त मोहम्मद सलाम के किरदार में नजर आए।
फिल्म के निर्माताओं ने इसे राजीव कपूर की अंतिम फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया।
इस तरह तीन दशक के अंतराल के बाद जिस वापसी को राजीव कपूर खुद शायद अपनी नई शुरुआत मान रहे थे, वही उनकी सिनेमाई विरासत का अंतिम अध्याय बन गई।
राजीव कपूर राज कपूर और कृष्णा राज कपूर की पांच संतानों में सबसे छोटे बेटे थे। उनके बड़े भाई रणधीर और ऋषि कपूर भी हिंदी सिनेमा के बड़े नाम बने।
उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन आज भी उनका नाम सबसे पहले ‘राम तेरी गंगा मैली’ से जोड़ा जाता है।
राजीव कपूर ने निर्माता, निर्देशक और संपादन से जुड़े काम भी किए। ‘प्रेम ग्रंथ’ में उन्होंने निर्देशन और संपादन की जिम्मेदारी निभाई।
‘प्रेम ग्रंथ’ में ऋषि कपूर अभिनेता थे और राजीव कपूर निर्देशक।
‘Toolsidas Junior’ की शूटिंग उनके निधन से पहले पूरी हो चुकी थी और बाद में फिल्म रिलीज हुई।
1998 में आर.के. बैनर के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उन्हें फिल्मफेयर सम्मान मिला।
राजीव कपूर की जिंदगी को सिर्फ इस नजरिए से देखना आसान है कि वह एक बड़े फिल्मी परिवार से आए और उन्हें अपेक्षित स्टारडम नहीं मिला।
लेकिन उनकी पूरी कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
उन्होंने अभिनय किया।
एक बड़ी सफलता हासिल की।
फिर संघर्ष किया।
दिशा बदली।
निर्देशन और निर्माण में हाथ आजमाया।
आर.के. बैनर की विरासत को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
और जब जिंदगी ने उन्हें एक बार फिर कैमरे के सामने लौटने का मौका दिया, तब उन्होंने ‘Toolsidas Junior’ स्वीकार की।
यह एक ऐसे कलाकार की कहानी है जिसने भले ही बॉलीवुड में अपने पिता या भाइयों जैसी ऊंचाई हासिल न की हो, लेकिन उसने सिनेमा को सिर्फ स्टार बनने के नजरिए से नहीं देखा।
उसने फिल्म बनाने की प्रक्रिया के अलग-अलग पहलुओं को आजमाया।
राजीव कपूर अब हमारे बीच नहीं हैं।
उनका निधन 9 फरवरी 2021 को 58 वर्ष की उम्र में हुआ था।
लेकिन सिनेमा में किसी कलाकार की जिंदगी उसकी मृत्यु के साथ खत्म नहीं होती।
राजीव कपूर की फिल्में आज भी उपलब्ध हैं। ‘राम तेरी गंगा मैली’ उनके अभिनय करियर की सबसे बड़ी पहचान बनी हुई है।
और ‘Toolsidas Junior’ उनके प्रशंसकों के लिए एक भावुक याद है—एक ऐसी फिल्म जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में फिर से अभिनय की तरफ कदम बढ़ाया था।
उनकी कहानी कपूर परिवार की विशाल विरासत का एक शांत, लेकिन महत्वपूर्ण अध्याय है।
राजीव कपूर की जिंदगी शायद उस सपने की कहानी है जो पूरी तरह वैसा नहीं हुआ जैसा किसी ने सोचा था।
राज कपूर के बेटे होने के कारण उनसे बड़ी उम्मीदें थीं।
उन्होंने ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी बड़ी फिल्म दी, लेकिन वह सफलता लंबे समय तक उनके साथ नहीं चल सकी।
फिर उन्होंने रास्ता बदला।
अभिनेता से निर्माता बने।
निर्देशक बने।
परिवार के आर.के. बैनर के साथ काम किया।
और जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर फिर अभिनेता बनकर लौटे।
उनकी आखिरी फिल्म का पर्दे पर आना शायद इस बात का प्रतीक है कि कलाकार के भीतर का सिनेमा कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता।
राजीव कपूर आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ‘राम तेरी गंगा मैली’ के नरेन से लेकर ‘Toolsidas Junior’ के टूल्सीदास तक का उनका सफर यह याद दिलाता है कि किसी कलाकार की विरासत सिर्फ उसकी सबसे बड़ी हिट से तय नहीं होती।
कभी-कभी एक अधूरी वापसी भी पूरी जिंदगी की कहानी कह जाती है।
और राजीव कपूर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—एक स्टार परिवार में जन्मे कलाकार की, जिसने अपनी पहचान तलाशने के लिए कैमरे के सामने और पीछे, दोनों तरफ रास्ते बनाए।
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