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कुछ कलाकार फिल्मों में आते हैं और कुछ कलाकार धीरे-धीरे खुद फिल्मी इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। सचिन पिलगांवकर की कहानी दूसरी तरह की है।
जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे कैमरे के सामने खड़े होने का मतलब भी नहीं समझते, उस उम्र में सचिन ने अभिनय शुरू कर दिया था। फिर उन्होंने बाल कलाकार के तौर पर दर्जनों फिल्मों में काम किया, बड़े होकर हीरो बने, निर्देशक बने, निर्माता और लेखक की भूमिका निभाई, गाने गाए और टेलीविजन पर भी अपनी अलग पहचान बनाई।
लेकिन सचिन पिलगांवकर की सबसे खास बात सिर्फ उनकी लंबी फिल्मोग्राफी नहीं है। उनकी असली कहानी उस सफर में छिपी है जिसमें एक बाल कलाकार ने समय के साथ खुद को बदलना सीखा और छह दशक से ज्यादा लंबे करियर में लगातार नई भूमिकाएं तलाशते रहे।
17 अगस्त 1957 को मुंबई में जन्मे सचिन पिलगांवकर आज भी भारतीय मनोरंजन जगत में सक्रिय नाम हैं। उनका करियर 1962 से शुरू हुआ और अभिनय, निर्देशन, लेखन, गायन तथा निर्माण जैसे कई क्षेत्रों तक फैला।
सचिन पिलगांवकर का जन्म मुंबई में एक कोंकणी परिवार में हुआ। उनका परिवार मूल रूप से गोवा के पिलगांव से जुड़ा था। उनके पिता शरद पिलगांवकर मुंबई में प्रिंटिंग व्यवसाय से जुड़े थे और फिल्म निर्माण से भी उनका संबंध था।
सचिन का फिल्मों में आना किसी एक दिन लिया गया अचानक फैसला नहीं था। बचपन में ही कैमरे और फिल्मी माहौल से उनका रिश्ता बन गया था।
साल 1962 में मराठी फिल्म ‘हा माझा मार्ग एकला’ से उन्होंने बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की। उस समय सचिन की उम्र करीब पांच साल थी।
यह सिर्फ करियर की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सफर की पहली सीढ़ी थी जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे लंबे समय तक सक्रिय कलाकारों में शामिल कर दिया।
सचिन की बाल कलाकार के रूप में प्रतिभा जल्द ही पहचान ली गई।
‘हा माझा मार्ग एकला’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक उन्हें National Film Award for Best Child Artist से सम्मानित किया गया था। बाद में ‘अजब तुझे सरकार’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
किसी बच्चे के लिए यह असाधारण उपलब्धि थी।
एक तरफ वह स्कूल जाने की उम्र में थे और दूसरी तरफ देश का प्रतिष्ठित फिल्म सम्मान उनके करियर का हिस्सा बन चुका था।
सचिन ने बाद के वर्षों में एक इंटरव्यू में अपने बचपन के उस दौर को याद करते हुए बताया था कि जिस उम्र में उन्होंने काम शुरू किया, उस समय उन्हें दोपहर में आराम करने के लिए समय मिलता था और वे खूब सपने देखते थे। 2025 में दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह भी बताया कि बहुत कम उम्र में ही उनके भीतर निर्देशन को लेकर रुचि पैदा हो गई थी।
यानी अभिनय उनके लिए सिर्फ सामने आने का माध्यम नहीं था। कैमरे के पीछे की दुनिया को समझने की इच्छा भी बहुत जल्दी पैदा हो गई थी।
1960 और 1970 के दशक में सचिन ने लगातार फिल्मों में काम किया।
‘ज्वेल थीफ’, ‘मझली दीदी’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘चंदा और बिजली’, ‘मेला’, ‘गैंबलर’, ‘प्रेम पुजारी’ और कई दूसरी फिल्मों में वह बाल कलाकार के रूप में नजर आए।
उनका नाम उस दौर के कई बड़े कलाकारों के साथ जुड़ा। उन्होंने उस दौर में मीना कुमारी, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन जैसे सितारों के साथ काम किया।
विशेष रूप से बाल कलाकार के तौर पर जूनियर महमूद यानी नईम सैयद के साथ उनकी जोड़ी भी चर्चित रही। उपलब्ध स्रोतों के मुताबिक दोनों ने बाल कलाकार के रूप में लगभग 15 फिल्मों में साथ काम किया था।
यह दौर सचिन के लिए अभिनय की ट्रेनिंग जैसा था।
वह सिर्फ कैमरे के सामने खड़े होना नहीं सीख रहे थे, बल्कि अलग-अलग निर्देशकों, कलाकारों और सेट के माहौल से सीख रहे थे।
बाल कलाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सफलता हासिल करना नहीं होती। असली परीक्षा तब शुरू होती है जब बचपन खत्म होता है और वही चेहरा बड़े पर्दे पर एक युवा कलाकार के रूप में स्वीकार किया जाना होता है।
सचिन पिलगांवकर ने यह बदलाव भी सफलतापूर्वक किया।
1975 में आई ‘गीत गाता चल’ ने उन्हें एक युवा अभिनेता के रूप में नई पहचान दी। फिल्म में उनके साथ सारिका थीं और यह फिल्म दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुई।
इसके बाद ‘बालिका बधू’, ‘अंखियों के झरोखों से’ और ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्मों ने सचिन को रोमांटिक और पारिवारिक फिल्मों के लोकप्रिय नायक के रूप में स्थापित कर दिया।
यहां सचिन की कहानी दिलचस्प हो जाती है।
जिस बच्चे को दर्शकों ने कभी छोटे कलाकार के रूप में देखा था, वही कुछ साल बाद प्रेम कहानी के नायक के रूप में पर्दे पर दिखाई दे रहा था।
‘गीत गाता चल’ सचिन के करियर की उन फिल्मों में से है जिसने उनके वयस्क अभिनेता वाले दौर को मजबूत किया।
राजश्री प्रोडक्शंस की पारिवारिक और संगीत प्रधान फिल्मों की परंपरा में यह फिल्म उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
इसके बाद ‘बालिका बधू’ ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। फिल्म में ग्रामीण और पारिवारिक माहौल के बीच एक युवा रिश्ते की कहानी दिखाई गई थी।
फिर आई ‘अंखियों के झरोखों से’।
सारिका के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को पसंद आई और सचिन की पहचान एक संवेदनशील युवा अभिनेता के रूप में मजबूत हुई।
इन फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि बाल कलाकार की छवि से बाहर निकलना उनके लिए संभव था।
सचिन पिलगांवकर का नाम उस दौर की एक और ऐतिहासिक फिल्म से जुड़ा है—‘शोले’।
1975 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने अहमद का किरदार निभाया था। यह भूमिका छोटी थी, लेकिन फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हो गई।
यही वजह है कि सचिन की फिल्मोग्राफी को देखने पर एक दिलचस्प बात सामने आती है।
एक तरफ वह ‘गीत गाता चल’ जैसी फिल्मों में युवा नायक थे, तो दूसरी तरफ ‘शोले’ जैसी मल्टीस्टारर फिल्म का हिस्सा भी थे।
अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन, संजीव कुमार और अमजद खान जैसे कलाकारों से सजी उस फिल्म में सचिन की मौजूदगी उनके करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
अगर सचिन पिलगांवकर के अभिनय करियर की सबसे यादगार फिल्मों की बात की जाए, तो ‘नदिया के पार’ का नाम सबसे ऊपर आएगा।
1982 में आई इस फिल्म में सचिन और साधना सिंह की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया।
फिल्म का ग्रामीण परिवेश, रिश्तों की सहजता, संगीत और कहानी ने इसे खास बनाया।
सचिन के अभिनय में भी उस दौर की सरलता दिखाई देती थी। वह ऐसे हीरो नहीं थे जिन्हें सिर्फ बड़े संवाद या भारी-भरकम एक्शन से पहचाना जाए। उनकी स्क्रीन इमेज में एक आम भारतीय युवक की सहजता थी।
इसी वजह से ‘नदिया के पार’ आज भी हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय पारिवारिक फिल्मों में याद की जाती है।
सचिन की कहानी सिर्फ अभिनेता बनने तक सीमित नहीं रही।
1980 के दशक में उन्होंने निर्देशन की दिशा में भी कदम बढ़ाया। ‘माई बाप’ से उनके निर्देशन की शुरुआत मानी जाती है और इसके बाद उन्होंने कई मराठी फिल्मों का निर्देशन किया।
‘नवरी मिले नवऱ्याला’, ‘अशी ही बनवा बनवी’, ‘आमच्यासारखे आम्हीच’, ‘जाना पहचाना’, ‘एकुलती एक’ और ‘नवरा माझा नवसाचा’ जैसी फिल्मों में उनके निर्देशन का अलग रंग दिखाई दिया।
यहां सचिन ने खुद को सिर्फ अभिनेता नहीं रहने दिया।
वह कहानी, स्क्रीनप्ले, कलाकारों की टाइमिंग और कॉमेडी के पूरे व्याकरण को समझने वाले फिल्ममेकर के तौर पर सामने आए।
सचिन पिलगांवकर की निजी जिंदगी की कहानी भी उनके फिल्मी सफर से जुड़ी हुई है।
उन्होंने अभिनेत्री सुप्रिया पिलगांवकर से शादी की। दोनों की पहली मुलाकात फिल्मों के सेट पर हुई थी। सुप्रिया ने सचिन की निर्देशित फिल्म ‘नवरी मिले नवऱ्याला’ से अभिनय की शुरुआत की थी।
दिलचस्प बात यह है कि सचिन ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि सुप्रिया को शादी से पहले यह गलतफहमी थी कि शायद वह पहले से शादीशुदा हैं।
सचिन के मुताबिक फिल्मों में उन्होंने इतनी बार शादीशुदा किरदार निभाए थे कि सुप्रिया को वास्तविक जिंदगी में भी यही लगा कि शायद उनकी शादी हो चुकी है।
जब सचिन ने उन्हें शादी के लिए प्रपोज किया, तो सुप्रिया ने सबसे पहले यही पूछा कि उनकी पहले से शादी तो नहीं हुई है। सचिन ने उन्हें सच बताया और इसके बाद दोनों की शादी हुई।
यह किस्सा जितना दिलचस्प है, उतना ही इस रिश्ते की सहजता को भी दिखाता है।
सचिन और सुप्रिया पिलगांवकर की एक बेटी हैं—श्रिया पिलगांवकर।
श्रिया ने भी अभिनय को अपना करियर बनाया और बाद में फिल्म तथा ओटीटी की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।
सचिन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब श्रिया ने अभिनय में करियर बनाने की इच्छा जताई, तो वह खुद इसके लिए तैयार थे, जबकि सुप्रिया शुरुआत में चिंतित थीं।
श्रिया ने 2013 की मराठी फिल्म ‘एकुलती एक’ से अभिनय की शुरुआत की, जिसका निर्देशन सचिन ने किया था। आगे चलकर उन्होंने हिंदी सिनेमा और वेब सीरीज में भी काम किया।
इस तरह पिलगांवकर परिवार की तीन पीढ़ियां नहीं, लेकिन एक ही परिवार की तीन कलाकारों वाली कहानी भारतीय मनोरंजन जगत में अपनी अलग जगह बनाती है।
अगर सचिन पिलगांवकर की निर्देशकीय पहचान की एक फिल्म चुननी हो, तो ‘अशी ही बनवा बनवी’ का नाम सबसे ज्यादा मजबूती से सामने आता है।
1988 में रिलीज हुई इस मराठी कॉमेडी में सचिन ने निर्देशन के साथ अभिनय भी किया।
फिल्म में उनके साथ अशोक सराफ, लक्ष्मीकांत बेर्डे, सिद्धार्थ, सुप्रिया पिलगांवकर, अश्विनी भावे, निवेदिता सराफ, प्रिया अरुण और वीजू खोटे जैसे कलाकार थे।
कहानी में किराए का घर पाने के लिए कुछ पुरुषों को शादीशुदा जोड़ों का रूप धारण करना पड़ता है। इसी स्थिति से पैदा होने वाली गलतफहमियां और हास्य फिल्म की जान बनते हैं।
सचिन ने इसमें सुधीर/सुधा की भूमिका निभाई, जबकि लक्ष्मीकांत बेर्डे ने परशुराम/पार्वती का किरदार निभाया।
अशोक सराफ, लक्ष्मीकांत बेर्डे और सचिन पिलगांवकर की कॉमिक टाइमिंग ने फिल्म को यादगार बना दिया।
आज भी यह फिल्म मराठी सिनेमा की कल्ट कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है।
सचिन पिलगांवकर का करियर इतना लंबा है कि उनके सह-कलाकारों की पूरी सूची बेहद बड़ी हो जाती है।
बाल कलाकार के रूप में उन्होंने मीना कुमारी, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन सहित कई दिग्गजों के साथ काम किया।
वयस्क अभिनेता के तौर पर सारिका के साथ उनकी जोड़ी ‘गीत गाता चल’ और ‘अंखियों के झरोखों से’ जैसी फिल्मों में नजर आई।
‘नदिया के पार’ में साधना सिंह उनके साथ थीं।
‘शोले’ में उन्होंने अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया बच्चन, संजीव कुमार और अमजद खान जैसे कलाकारों के साथ काम किया।
मराठी सिनेमा में अशोक सराफ और लक्ष्मीकांत बेर्डे के साथ उनका सहयोग विशेष रूप से याद किया जाता है।
बाद के दौर में वह ‘हिचकी’, ‘क्वैदी बैंड’, ‘रणांगण’, ‘कट्यार काळजात घुसली’ और ‘नवरा माझा नवसाचा 2’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाई दिए।
सचिन पिलगांवकर ने सिर्फ फिल्मों में ही काम नहीं किया।
टेलीविजन पर उन्होंने अभिनय, निर्देशन और निर्माण से जुड़े काम भी किए।
उनका नाम खास तौर पर ‘तू तू मैं मैं’ से जुड़ा रहा, जिसमें रिमा लागू और सुप्रिया पिलगांवकर की जोड़ी ने दर्शकों का मनोरंजन किया। यह शो भारतीय टेलीविजन की लोकप्रिय कॉमेडी प्रस्तुतियों में याद किया जाता है।
इसके अलावा उन्होंने ‘कड़वी खट्टी मीठी’ जैसे टीवी प्रोजेक्ट्स से भी जुड़कर अपने काम का दायरा बढ़ाया।
यही वह जगह है जहां सचिन की बहुमुखी प्रतिभा सामने आती है।
वह किसी एक माध्यम पर निर्भर कलाकार नहीं रहे।
सिनेमा से टीवी, अभिनय से निर्देशन और फिर संगीत तक—उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में खुद को आजमाया।
सचिन पिलगांवकर की प्रतिभा का एक कम चर्चित पहलू उनका गायन और संगीत से जुड़ाव भी है।
उन्होंने फिल्मों में गाने गाए हैं और कुछ प्रोजेक्ट्स में संगीत से भी जुड़े रहे हैं।
2019 की मराठी फिल्म ‘अशी ही आशिकी’ में उन्होंने निर्देशन, लेखन और संगीत से भी जुड़ी जिम्मेदारियां निभाईं।
इस तरह उनका करियर किसी एक पहचान में बंद नहीं होता।
उन्हें सिर्फ ‘नदिया के पार’ वाला अभिनेता कहना उनके पूरे योगदान को छोटा कर देना होगा।
2004 की मराठी फिल्म ‘नवरा माझा नवसाचा’ भी सचिन के निर्देशन करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल है।
फिल्म में उन्होंने निर्देशन के साथ अभिनय भी किया और यह मराठी दर्शकों के बीच लोकप्रिय रही।
करीब दो दशक बाद इसका दूसरा भाग ‘नवरा माझा नवसाचा 2’ 2024 में रिलीज हुआ, जिसमें सचिन, सुप्रिया पिलगांवकर, अशोक सराफ और स्वप्निल जोशी सहित कई कलाकार नजर आए। सचिन ने इस फिल्म में अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर भी काम किया।
यह किसी कलाकार के लिए अपने ही पुराने काम की दुनिया में लौटने का खास अनुभव रहा होगा।
सचिन पिलगांवकर के खाते में कई महत्वपूर्ण पुरस्कार रहे हैं।
राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा उन्हें महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।
निर्देशक के तौर पर ‘गम्मत जम्मत’, ‘अशी ही बनवा बनवी’, ‘आत्मविश्वास’ और ‘एका पेक्षा एक’ जैसी फिल्मों के लिए उन्हें महाराष्ट्र राज्य स्तर पर सम्मान मिला।
बाद के वर्षों में ‘कट्यार काळजात घुसली’ के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला।
इन पुरस्कारों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उनका काम अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों तक पहुंचा।
सचिन पिलगांवकर का नाम कुछ मौकों पर उनके बयानों को लेकर खबरों में जरूर आया है, लेकिन उनके करियर को किसी बड़े निजी विवाद या सनसनीखेज मामले से जोड़ना उचित नहीं होगा।
2025 में एक इंटरव्यू के दौरान लैंगिक समानता को लेकर उनकी टिप्पणी चर्चा में आई थी और मीडिया में उस पर बहस हुई।
लेकिन उनके बारे में लिखते समय यह जरूरी है कि ऐसे बयानों को संदर्भ से काटकर उनके पूरे व्यक्तित्व की पहचान न बनाया जाए।
उनकी सार्वजनिक छवि मुख्य रूप से छह दशक लंबे फिल्मी काम से बनी है।
जब श्रिया पिलगांवकर ने अभिनय शुरू किया, तब स्वाभाविक रूप से उनके माता-पिता की वजह से नेपोटिज्म का सवाल भी उठा।
सचिन ने इस बहस पर अपनी नाराजगी छिपाई नहीं थी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि बच्चों को अपनी जिंदगी और अपने फैसले खुद लेने चाहिए।
यहां एक पिता और अभिनेता के बीच का फर्क साफ दिखाई देता है।
एक तरफ वह अपनी बेटी की सफलता से खुश थे, वहीं दूसरी तरफ वह चाहते थे कि श्रिया अपने फैसले खुद ले और अपनी गलतियों से सीखे।
सचिन पिलगांवकर की संपत्ति और नेट वर्थ को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं।
लेकिन इन आंकड़ों की कोई ऐसी विश्वसनीय, आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है जिसके आधार पर एक निश्चित रकम को उनकी वास्तविक नेट वर्थ कहा जा सके।
इसलिए सचिन पिलगांवकर की नेट वर्थ का कोई अनुमानित आंकड़ा तथ्य के रूप में देना सही नहीं होगा।
इतना जरूर कहा जा सकता है कि छह दशक से ज्यादा लंबे अभिनय, निर्देशन, निर्माण, टेलीविजन और संगीत से जुड़े करियर के कारण उन्होंने मनोरंजन उद्योग में एक लंबा पेशेवर सफर बनाया है।
उनकी लाइफस्टाइल के बारे में भी सोशल मीडिया या अनौपचारिक वेबसाइटों के दावों को प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं है।
सचिन ने लगभग पांच साल की उम्र में फिल्मों में काम शुरू किया।
इतनी कम उम्र में फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनना अपने आप में असाधारण था।
2025 के एक इंटरव्यू में सचिन ने बताया कि बहुत कम उम्र में ही उनके मन में निर्देशक बनने का विचार आया था।
यानी निर्देशन उनके लिए अचानक अपनाया गया पेशा नहीं था।
2025 में एक इंटरव्यू के दौरान सचिन ने महान अभिनेत्री मधुबाला से बचपन में हुई मुलाकात को याद किया।
उन्होंने बताया कि वह मुलाकात उनके लिए बेहद यादगार थी।
यह उनके निजी जीवन का सबसे मजेदार किस्सा है।
सुप्रिया को सचिन के कई ऑन-स्क्रीन विवाह देखने के कारण लगा कि शायद वह वास्तविक जीवन में भी शादीशुदा हैं। सचिन ने खुद यह कहानी इंटरव्यू में सुनाई थी।
2023 में सचिन ने साफ कहा था कि वह रिटायरमेंट के बारे में नहीं सोचते।
उनका मानना था कि कलाकार को किसी तय उम्र में खुद को खत्म समझ लेने की जरूरत नहीं है। जब तक काम करने की इच्छा और क्षमता है, तब तक आगे बढ़ते रहना चाहिए।
यह बात शायद उनके पूरे करियर को सबसे बेहतर तरीके से समझाती है।
सचिन पिलगांवकर आज भी सक्रिय हैं।
2024 में ‘नवरा माझा नवसाचा 2’ के जरिए वह अभिनय और निर्देशन दोनों भूमिकाओं में दिखाई दिए।
दिसंबर 2025 में वह बेटी श्रिया पिलगांवकर के साथ पुणे लिटरेचर फेस्टिवल में भी दिखाई दिए, जहां दोनों ने अपने फिल्मी सफर और परिवार से जुड़े अनुभव साझा किए।
और अगस्त 2026 में भी सचिन का नाम मराठी रंगमंच से जुड़ी चर्चाओं में सक्रिय रूप से सामने आया। हालिया रिपोर्ट में उन्होंने ‘भूमिका’ नाटक के लेखक क्षितीज पटवर्धन की तारीफ की और वरिष्ठ नाटककार वसंत कानेटकर का भी उल्लेख किया।
यानी छह दशक बाद भी सचिन की कहानी किसी पुराने अध्याय पर बंद नहीं हुई है।
सचिन पिलगांवकर की यात्रा को अगर सिर्फ फिल्मों की सूची की तरह पढ़ा जाए तो यह एक लंबा करियर नजर आता है।
लेकिन अगर इसे ध्यान से देखा जाए तो यह खुद को बदलते रहने की कहानी है।
बाल कलाकार बने तो वहीं नहीं रुके।
हीरो बने तो सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रहे।
निर्देशन किया तो लेखन और निर्माण की ओर भी बढ़े।
टीवी आया तो वहां भी अपनी जगह बनाई।
परिवार में अगली पीढ़ी ने अभिनय चुना तो बेटी के फैसले का सम्मान किया।
और जब उम्र के इस पड़ाव पर भी काम करने की बात आई, तो उन्होंने रिटायरमेंट को मंजिल नहीं माना।
यही शायद सचिन पिलगांवकर की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
सिनेमा में छह दशक बिताना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन सचिन पिलगांवकर की कहानी सिर्फ इस वजह से खास नहीं है कि उन्होंने 1962 में बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की थी।
यह कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने समय के साथ खुद को बदलने से इनकार नहीं किया।
कभी वह छोटे बच्चे के रूप में कैमरे के सामने खड़े हुए।
फिर युवा नायक बने।
‘नदिया के पार’ और ‘गीत गाता चल’ से घर-घर पहुंचे।
‘शोले’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म का हिस्सा बने।
फिर कैमरे के पीछे जाकर ‘अशी ही बनवा बनवी’ जैसी यादगार फिल्म बनाई।
टेलीविजन पर दर्शकों को हंसाया।
गायन और संगीत में हाथ आजमाया।
और आज भी अभिनय तथा सिनेमा से जुड़े हुए हैं।
सचिन पिलगांवकर की जिंदगी का सबसे खूबसूरत संदेश शायद यही है—कलाकार की उम्र बढ़ सकती है, लेकिन अगर सीखने और काम करने की भूख जिंदा है तो उसका सफर कभी खत्म नहीं होता।
और शायद इसी वजह से सचिन पिलगांवकर सिर्फ एक अभिनेता का नाम नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की बदलती हुई कई पीढ़ियों के बीच एक जीवंत पुल हैं।
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