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बॉलीवुड में कुछ सितारों की एंट्री धीरे-धीरे होती है, लेकिन कुछ कलाकार आते ही यह एहसास दिला देते हैं कि इंडस्ट्री को एक नया और असाधारण टैलेंट मिल गया है। विवेक ओबेरॉय की शुरुआत कुछ ऐसी ही थी।
साल 2002 में एक नए अभिनेता ने राम गोपाल वर्मा की गैंगस्टर फिल्म 'Company' से पर्दे पर कदम रखा। पहली ही फिल्म में उसके सामने थे अजय देवगन और मोहनलाल जैसे दिग्गज कलाकार। फिर उसी साल वह रानी मुखर्जी के साथ रोमांटिक फिल्म 'Saathiya' में नजर आए और दर्शकों के दिलों में जगह बना ली।
एक तरफ खतरनाक गैंगस्टर 'चंदू', दूसरी तरफ प्यार में डूबा 'आदित्य'—विवेक ओबेरॉय ने अपने शुरुआती दिनों में ही बता दिया था कि वह केवल एक तरह के किरदार निभाने वाले अभिनेता नहीं हैं।
लेकिन बॉलीवुड की कहानी हमेशा सीधी नहीं होती।
जिस अभिनेता को कभी इंडस्ट्री का अगला बड़ा सुपरस्टार माना गया, उसके करियर में ऐसा दौर भी आया जब फिल्में कम होने लगीं, विवादों ने सुर्खियां बटोरीं और उनकी पेशेवर यात्रा मुश्किल मोड़ पर पहुंच गई।
फिर विवेक ओबेरॉय ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने उनकी जिंदगी को सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने अभिनय के साथ बिजनेस की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
विवेक ओबेरॉय की कहानी सफलता, गलतियों, संघर्ष, विवाद, अभिनय प्रतिभा और खुद को बार-बार नए सिरे से खड़ा करने की कहानी है।
विवेक आनंद ओबेरॉय का जन्म 3 सितंबर 1976 को हैदराबाद में हुआ था। वह एक ऐसे परिवार से आते हैं जिसका संबंध लंबे समय से फिल्म और मनोरंजन जगत से रहा है।
उनके पिता सुरेश ओबेरॉय हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता रहे हैं, जबकि उनकी मां यशोधरा ओबेरॉय हैं।
फिल्मी परिवार में जन्म लेने के बावजूद विवेक का रास्ता केवल पिता के नाम पर आधारित नहीं था। अभिनय को लेकर उनकी दिलचस्पी के साथ-साथ पढ़ाई और प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया।
उन्होंने अजमेर के प्रतिष्ठित Mayo College में शिक्षा प्राप्त की और बाद में मुंबई के Mithibai College से पढ़ाई की। अभिनय के प्रति गंभीरता उन्हें विदेश तक ले गई।
एक अभिनय कार्यशाला के दौरान उनकी प्रतिभा पर ध्यान गया और इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में फिल्म अभिनय का प्रशिक्षण लिया। उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार, उन्होंने न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से फिल्म एक्टिंग में उच्च शिक्षा भी प्राप्त की।
यह अनुभव उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। विवेक केवल कैमरे के सामने खड़े होकर स्टार बनने का सपना नहीं देख रहे थे, बल्कि अभिनय की बारीकियों को समझने की कोशिश कर रहे थे।
विवेक ओबेरॉय के करियर का एक दिलचस्प पहलू यह है कि अभिनय से पहले उन्होंने लेखन का काम भी किया।
रिपोर्टेड बायोग्राफिकल जानकारी के अनुसार, भारत लौटने के बाद उन्होंने स्क्रिप्ट राइटिंग की और अपनी कमाई से पहली कार खरीदी। यह अनुभव उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू दिखाता है।
वह सिर्फ अभिनेता बनने की तैयारी नहीं कर रहे थे, बल्कि फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को भी करीब से समझ रहे थे।
शायद यही वजह थी कि जब उन्हें पहली फिल्म मिली तो वह किसी पारंपरिक रोमांटिक हीरो की भूमिका नहीं थी।
साल 2002 विवेक ओबेरॉय के जीवन का निर्णायक वर्ष साबित हुआ।
निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'Company' में उन्हें चंद्रकांत नागरे उर्फ 'चंदू' का किरदार मिला।
एक नए अभिनेता के लिए यह बेहद चुनौतीपूर्ण शुरुआत थी। फिल्म गैंगस्टर की दुनिया पर आधारित थी और विवेक को स्क्रीन शेयर करनी थी अजय देवगन, मनीषा कोइराला और मोहनलाल जैसे स्थापित कलाकारों के साथ।
लेकिन विवेक दबे नहीं।
उन्होंने 'चंदू' के किरदार में एक ऐसी आक्रामकता और सहजता दिखाई कि दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।
'Company' सिर्फ विवेक की पहली फिल्म नहीं थी, बल्कि यह उनका अभिनय परिचय-पत्र बन गई।
इस फिल्म के लिए उन्हें Filmfare में Best Male Debut और Best Supporting Actor सहित महत्वपूर्ण सम्मान मिले।
एक ही फिल्म से दो बड़े Filmfare पुरस्कार जीतना किसी नए कलाकार के लिए असाधारण उपलब्धि थी।
विवेक ओबेरॉय के शुरुआती करियर से जुड़ा एक चर्चित किस्सा उनके अभिनय के प्रति समर्पण को दिखाता है।
रिपोर्टेड बायोग्राफिकल विवरणों के अनुसार, शुरुआत में राम गोपाल वर्मा को यह संदेह था कि विवेक का व्यक्तित्व गैंगस्टर के किरदार के लिए पर्याप्त विश्वसनीय होगा या नहीं।
इसके बाद विवेक ने किरदार की तैयारी पर काम किया और मुंबई की वास्तविक जिंदगी और उस परिवेश को समझने की कोशिश की। बाद में उन्होंने खुद को 'चंदू' के रूप में निर्देशक के सामने पेश किया।
यह किस्सा बताता है कि विवेक का डेब्यू केवल फिल्मी परिवार की वजह से नहीं था। उन्हें अपनी भूमिका के लिए खुद को साबित करना पड़ा।
अगर 'Company' ने विवेक ओबेरॉय को एक गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित किया, तो 'Saathiya' ने उन्हें आम दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया।
साल 2002 में रिलीज हुई इस फिल्म में उनके साथ रानी मुखर्जी थीं। फिल्म का निर्देशन शाद अली ने किया था और यह एक संवेदनशील प्रेम कहानी थी।
यहां विवेक का बिल्कुल अलग रूप देखने को मिला।
'Company' का खतरनाक और महत्वाकांक्षी 'चंदू' गायब था। उसकी जगह था प्यार करने वाला, भावुक और जिद्दी 'आदित्य'।
यही विवेक की सबसे बड़ी ताकत थी—वह अपने शुरुआती दौर में ही दो बिल्कुल अलग दुनिया के किरदार निभा चुके थे।
'Saathiya' में उनकी और रानी मुखर्जी की जोड़ी को दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म की सफलता ने विवेक को उस दौर के सबसे चर्चित युवा अभिनेताओं में शामिल कर दिया।
उनके अभिनय को भी सराहना मिली और उन्हें Best Actor श्रेणी में Filmfare नामांकन मिला।
2002 विवेक ओबेरॉय के लिए बेहद व्यस्त वर्ष था।
उन्होंने 'Company', 'Road' और 'Saathiya' जैसी अलग-अलग फिल्मों में काम किया।
'Road' में उनके साथ अंतरा माली और मनोज बाजपेयी थे।
इसके बाद 2003 में आई 'Dum', जिसमें विवेक के साथ दिया मिर्जा नजर आईं।
फिल्मों की पसंद देखकर साफ था कि विवेक एक ही छवि में बंधना नहीं चाहते थे।
विवेक ओबेरॉय ने अपने करियर के शुरुआती वर्षों में कई तरह की फिल्में चुनीं।
उन्होंने कॉमेडी की, एक्शन किया, रोमांस किया और गंभीर राजनीतिक व सामाजिक कहानियों में भी नजर आए।
साल 2004 में आई 'Masti' उनके करियर की लोकप्रिय फिल्मों में शामिल हुई। फिल्म में उनके साथ रितेश देशमुख और आफताब शिवदासानी थे।
तीनों की कॉमिक टाइमिंग ने फिल्म को खास बनाया और 'Masti' एक सफल फ्रेंचाइजी की शुरुआत बनी।
उसी साल वह अभिषेक बच्चन और अजय देवगन के साथ मणिरत्नम की 'Yuva' में भी दिखाई दिए।
'Yuva' में विवेक ने अर्जुन का किरदार निभाया, जो उनकी फिल्मोग्राफी के गंभीर और प्रभावशाली किरदारों में गिना जाता है।
विवेक ओबेरॉय के अभिनय करियर की चर्चा 'Omkara' (2006) के बिना अधूरी है।
निर्देशक विशाल भारद्वाज की इस फिल्म में उनके साथ अजय देवगन, सैफ अली खान, करीना कपूर, कोंकणा सेन शर्मा और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार थे।
फिल्म में विवेक ने 'केशव उपाध्याय' उर्फ 'केसू फिरंगी' का किरदार निभाया।
यह भूमिका उनकी स्टार इमेज से अलग थी। 'Omkara' एक कलाकार के तौर पर उनकी क्षमता को दिखाने वाली फिल्मों में शामिल हुई।
फिल्म की कास्टिंग इतनी मजबूत थी कि हर कलाकार को अपनी जगह बनानी थी, और विवेक ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
साल 2007 में आई 'Shootout at Lokhandwala' विवेक ओबेरॉय के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में रही।
फिल्म में उन्होंने गैंगस्टर माया डोलस का किरदार निभाया। यह रोल फिर साबित करता है कि विवेक का अभिनय का मजबूत पक्ष तीव्र और ग्रे-शेड वाले किरदार हैं।
फिल्म में उनके साथ अमिताभ बच्चन, संजय दत्त और अभिषेक बच्चन जैसे कलाकार थे।
विवेक ने एक बार फिर ऐसे किरदार में प्रभाव छोड़ा जिसमें आक्रामकता, महत्वाकांक्षा और हिंसक दुनिया का मिश्रण था।
बॉलीवुड में शानदार डेब्यू का मतलब हमेशा लंबा सुपरस्टार करियर नहीं होता।
विवेक ओबेरॉय के साथ भी यही हुआ।
'Company' और 'Saathiya' जैसी शुरुआत के बाद उनसे उम्मीदें बहुत बढ़ गई थीं। लेकिन बाद के वर्षों में उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकीं।
Kisna, Home Delivery, Pyare Mohan, Naksha, Fool n Final, Mission Istaanbul जैसी फिल्मों का प्रदर्शन अलग-अलग स्तर पर रहा, लेकिन इनमें से कोई भी उनके करियर को उस ऊंचाई पर वापस नहीं ले जा सकी, जिसकी उम्मीद शुरुआती सफलता के बाद की जा रही थी।
यह दौर किसी भी अभिनेता के लिए मानसिक रूप से कठिन हो सकता है।
जब आप इंडस्ट्री में 'भविष्य का सुपरस्टार' कहे जाएं और कुछ वर्षों बाद आपको लगातार सही फिल्में न मिलें, तो यह केवल प्रोफेशनल नहीं बल्कि व्यक्तिगत परीक्षा भी बन जाती है।
विवेक का करियर इसी उतार-चढ़ाव से गुजरा।
साल 2013 विवेक ओबेरॉय के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया।
पहले आई 'Grand Masti', जिसने 'Masti' फ्रेंचाइजी को आगे बढ़ाया।
इसके बाद आई Krrish 3, जिसमें विवेक ने मुख्य खलनायक काल की भूमिका निभाई।
फिल्म में उनके सामने थे ऋतिक रोशन।
'Krrish 3' में विवेक ने अपने किरदार के लिए एक अलग लुक और बॉडी लैंग्वेज अपनाई। उनका 'काल' पारंपरिक बॉलीवुड विलेन जैसा नहीं था।
इस भूमिका ने उन्हें एक बार फिर बड़े स्तर की व्यावसायिक फिल्म में चर्चा का मौका दिया।
उनकी फिल्मोग्राफी में 'Grand Masti' और 'Krrish 3' दोनों महत्वपूर्ण व्यावसायिक सफलताओं के रूप में दर्ज हैं।
हिंदी फिल्मों के अलावा विवेक ओबेरॉय ने दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
उन्होंने तमिल फिल्म 'Vivegam' में अभिनय किया और बाद में मलयालम सिनेमा की चर्चित फिल्म 'Lucifer' में एक नकारात्मक किरदार निभाया।
'Lucifer' में वह मोहनलाल के साथ नजर आए।
इसके अलावा उन्होंने तेलुगु फिल्म 'Vinaya Vidheya Rama' और मलयालम फिल्म 'Kaduva' जैसी परियोजनाओं में भी काम किया।
यह विस्तार महत्वपूर्ण था क्योंकि विवेक ने खुद को केवल हिंदी फिल्म अभिनेता तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने भाषा और फिल्म उद्योग बदलकर नए दर्शकों तक पहुंचने की कोशिश की।
उनकी फिल्मोग्राफी में कई चर्चित नाम शामिल हैं:
उनके करियर की खासियत यही है कि इसमें केवल एक तरह की फिल्में नहीं हैं। गैंगस्टर ड्रामा से लेकर रोमांस, सेक्स कॉमेडी, राजनीतिक ड्रामा और सुपरहीरो फिल्मों तक—विवेक ने अलग-अलग जॉनर आजमाए हैं।
विवेक ओबेरॉय ने अपने करियर में कई पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम किया है।
उनके प्रमुख सह-कलाकारों में शामिल हैं:
अजय देवगन – Company, Yuva, Omkara जैसी फिल्मों में।
रानी मुखर्जी – उनकी यादगार रोमांटिक फिल्म Saathiya में।
अमिताभ बच्चन और संजय दत्त – Shootout at Lokhandwala में।
ऋतिक रोशन – Krrish 3 में।
करीना कपूर और सैफ अली खान – Omkara में।
अभिषेक बच्चन – Yuva और अन्य परियोजनाओं में।
रितेश देशमुख और आफताब शिवदासानी – Masti फ्रेंचाइजी में।
मोहनलाल – Company और बाद में Lucifer जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों के जरिए।
यही विविधता विवेक की फिल्म यात्रा को दिलचस्प बनाती है।
विवेक ओबेरॉय की निजी जिंदगी लंबे समय तक मीडिया की दिलचस्पी का विषय रही।
उनका नाम अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के साथ जुड़ने की खबरें उस दौर में व्यापक रूप से मीडिया में आई थीं।
हालांकि निजी रिश्तों के बारे में चर्चा हमेशा संवेदनशील विषय होती है और समय के साथ विवेक की जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।
विवेक ने 2010 में प्रियंका अल्वा से शादी की। प्रियंका कर्नाटक के पूर्व मंत्री स्वर्गीय जीवराज अल्वा की बेटी हैं।
शादी के बाद विवेक ने अपनी निजी जिंदगी को अपेक्षाकृत स्थिर और पारिवारिक रखा।
दोनों के दो बच्चे हैं। विवेक अक्सर परिवार से जुड़े पलों को सार्वजनिक मंचों पर साझा करते रहे हैं।
उनकी जीवन यात्रा का यह चरण बताता है कि कैमरे और सुर्खियों से बाहर भी एक अभिनेता के लिए परिवार कितना महत्वपूर्ण सहारा बन सकता है।
विवेक ओबेरॉय के करियर की चर्चा उस विवाद के बिना पूरी नहीं हो सकती जिसने उनके जीवन और सार्वजनिक छवि पर गहरा प्रभाव डाला।
साल 2003 में विवेक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें उन्होंने अभिनेता सलमान खान पर फोन पर धमकी और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए थे।
यह मामला उस समय राष्ट्रीय मनोरंजन मीडिया की बड़ी खबर बन गया था। विवेक ने उस समय अपने आरोप सार्वजनिक रूप से रखे, जबकि सलमान खान ने आरोपों से इनकार किया था। उस दौर की मीडिया रिपोर्टिंग में दोनों पक्षों की अलग-अलग स्थिति सामने आई।
यह विवाद वर्षों तक विवेक के करियर के संदर्भ में चर्चा का विषय बना रहा।
हालांकि किसी अभिनेता के करियर में गिरावट के लिए केवल एक घटना को जिम्मेदार ठहराना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। फिल्म चयन, बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन, बदलती इंडस्ट्री और व्यक्तिगत परिस्थितियां—सभी मिलकर करियर की दिशा तय करती हैं।
लेकिन इतना जरूर है कि यह घटना विवेक ओबेरॉय की सार्वजनिक छवि के सबसे चर्चित अध्यायों में से एक बन गई।
विवेक ओबेरॉय की कहानी को केवल 'सफल' या 'असफल' कहकर समझना मुश्किल है।
उनका करियर सीधी रेखा नहीं रहा।
उन्होंने:
यही उनकी यात्रा को अन्य बॉलीवुड बायोग्राफियों से अलग बनाता है।
विवेक ओबेरॉय ने समय के साथ खुद को केवल अभिनेता तक सीमित नहीं रखा।
उन्होंने उद्यमिता और निवेश की दुनिया में गंभीरता से काम किया। रियल एस्टेट, शिक्षा और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में उनकी रुचि रही है।
2025 में प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों में विवेक ने अपने कारोबारी सफर और निवेश के बारे में विस्तार से बात की थी। रिपोर्ट्स में उनकी संपत्ति को लगभग ₹1,200 करोड़ बताया गया, हालांकि नेट वर्थ के आंकड़े सार्वजनिक वित्तीय ऑडिट नहीं होते और अलग-अलग स्रोतों में बदल सकते हैं। इसलिए इसे अनुमानित मीडिया रिपोर्ट के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
विवेक की उद्यमिता की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि उन्होंने अपने अभिनय करियर के उतार-चढ़ाव के बावजूद आय और काम के दूसरे रास्ते विकसित किए।
यह बॉलीवुड के कई कलाकारों के लिए एक अलग मॉडल भी प्रस्तुत करता है—कि करियर केवल शुक्रवार की बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
हाल के वर्षों में विवेक ओबेरॉय का नाम दुबई के कारोबारी माहौल से भी जुड़ा रहा है।
2025-26 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने महामारी के दौरान UAE जाना शुरू किया और बाद में परिवार के साथ वहां स्थायी रूप से रहने का फैसला किया। उनका कारोबार, विशेषकर रियल एस्टेट से जुड़ी गतिविधियां, इस क्षेत्र में भी सक्रिय रही हैं।
हालांकि वह भारत और भारतीय मनोरंजन जगत से पूरी तरह अलग नहीं हुए हैं।
फिल्में, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बिजनेस और सार्वजनिक कार्यक्रम—विवेक कई क्षेत्रों में सक्रिय बने हुए हैं।
अधिकांश नए अभिनेता रोमांटिक फिल्म से करियर शुरू करना पसंद करते हैं, लेकिन विवेक ने 'Company' जैसे गंभीर गैंगस्टर ड्रामा से शुरुआत की।
यह जोखिम भरा फैसला था, लेकिन उनके लिए सफल साबित हुआ।
'Company' में गैंगस्टर और 'Saathiya' में रोमांटिक पति—विवेक ने बहुत कम समय में अपनी रेंज दिखा दी।
फिल्मों से पहले स्क्रिप्ट राइटिंग करके कमाई करने और उससे अपनी पहली कार खरीदने का उनका अनुभव उनकी शुरुआती मेहनत की कहानी कहता है।
विवेक ने तमिल, तेलुगु और मलयालम फिल्मों में भी काम किया। यह फैसला उनके करियर के दूसरे चरण में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
'Company', 'Shootout at Lokhandwala', 'Krrish 3' और दक्षिण भारतीय फिल्मों में उनके कई नकारात्मक किरदारों ने साबित किया कि विवेक की स्क्रीन प्रेजेंस एंटी-हीरो या ग्रे शेड भूमिकाओं में विशेष रूप से प्रभावशाली हो सकती है।
आज विवेक ओबेरॉय अभिनेता होने के साथ-साथ एक उद्यमी के रूप में भी पहचाने जाते हैं।
वह फिल्मों और मनोरंजन परियोजनाओं से जुड़े हुए हैं और साथ ही बिजनेस गतिविधियों में भी सक्रिय हैं।
2026 की फिल्मोग्राफी सूचियों के अनुसार उनके नाम से आने वाली परियोजनाओं में 'Ramayana - Part I' और 'Spirit' जैसी बड़ी फिल्में सूचीबद्ध हैं, हालांकि किसी भी फिल्म की रिलीज डेट और अंतिम कास्टिंग में बदलाव संभव होता है।
विवेक का वर्तमान दौर शायद उनके करियर के शुरुआती दौर से अलग है।
अब वह केवल बॉक्स ऑफिस पर अगली हिट का इंतजार करने वाले अभिनेता नहीं हैं। उनके पास अभिनय के अलावा एक मजबूत उद्यमशील पहचान भी है।
विवेक ओबेरॉय की जिंदगी शायद इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा होना जरूरी है, लेकिन लंबे सफर के लिए परिस्थितियों के साथ बदलने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
एक समय था जब वह बॉलीवुड के सबसे चर्चित युवा सितारों में थे।
फिर समय बदला।
फिल्में बदलीं।
इंडस्ट्री बदली।
उनकी जिंदगी में विवाद आए।
करियर ने उतार-चढ़ाव देखे।
लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।
उन्होंने नए फिल्म उद्योगों में काम किया। नए किरदार चुने। बिजनेस में कदम रखा और अपनी पहचान को एक अभिनेता की सीमा से आगे ले गए।
विवेक ओबेरॉय का करियर बॉलीवुड की सबसे दिलचस्प यात्राओं में से एक है।
'Company' का धमाकेदार डेब्यू, 'Saathiya' की रोमांटिक सफलता, 'Omkara' का गंभीर अभिनय, 'Shootout at Lokhandwala' की आक्रामक स्क्रीन प्रेजेंस, विवादों का कठिन दौर और फिर बिजनेस की दुनिया में नई पहचान—यह सब एक ही जीवन की अलग-अलग परतें हैं।
हर अभिनेता सुपरस्टार नहीं बनता और हर सफल शुरुआत जिंदगी भर कायम नहीं रहती।
लेकिन शायद असली सफलता यह है कि मुश्किल दौर आने पर इंसान अपनी कहानी का नया अध्याय लिख सके।
विवेक ओबेरॉय ने यही किया।
उनकी यात्रा बताती है कि कभी-कभी जिंदगी आपको उस रास्ते से हटा देती है जिस पर आप चलना चाहते थे, लेकिन अगर आप हार नहीं मानते, तो वही मोड़ आपको एक बिल्कुल नई मंजिल तक पहुंचा सकता है।
और शायद यही विवेक ओबेरॉय की कहानी का सबसे प्रेरणादायक सच है।
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