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| पेन बेचने वाला बना कॉमेडी किंग! |
कुछ कलाकार पर्दे पर आते हैं और अपनी एक्टिंग से कहानी को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनके आते ही कहानी का माहौल बदल जाता है। चेहरा देखते ही मुस्कान आ जाती है, आवाज सुनते ही हंसी छूट जाती है और कुछ ही सेकंड में पूरा सीन उनके नाम हो जाता है।
जॉनी लीवर उन्हीं कलाकारों में से एक हैं।
आज हिंदी सिनेमा में उनका नाम सिर्फ एक कॉमेडियन के तौर पर नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली हास्य कलाकारों में लिया जाता है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है।
जिस इंसान ने बचपन में आर्थिक मुश्किलों के कारण सातवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी, जिसने मुंबई की सड़कों पर पेन बेचते हुए फिल्मी सितारों की नकल की, उसी कलाकार ने आगे चलकर तेजाब, बाजीगर, राजा हिंदुस्तानी, दीवाना मस्ताना, दुल्हे राजा, कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम, कभी हां कभी ना, गोलमाल और हाउसफुल जैसी फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई।
14 अगस्त 1957 को जन्मे जॉनी लीवर 2026 में 69 साल के हो चुके हैं।
लेकिन जॉनी लीवर की कहानी सिर्फ हंसाने की कहानी नहीं है। इसमें गरीबी है, संघर्ष है, डर है, बेशुमार सफलता है, परिवार से जुड़ी मुश्किलें हैं, आत्म-सुधार है और सबसे बढ़कर—खुद को बदलने की ताकत है।
जॉनी लीवर का जन्म 14 अगस्त 1957 को तत्कालीन आंध्र प्रदेश के कनिगिरी में एक तेलुगु ईसाई परिवार में हुआ। उनका जन्म नाम जॉन प्रकाश राव जनुमाला बताया जाता है। बाद में यही नाम बदलकर फिल्मी दुनिया में जॉनी लीवर के नाम से मशहूर हुआ।
उनके पिता प्रकाश राव जनुमाला हिंदुस्तान लीवर में काम करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। जॉनी लीवर का बचपन मुंबई के किंग्स सर्कल और धारावी इलाके में बीता।
आर्थिक परेशानियों का असर उनकी पढ़ाई पर भी पड़ा। उन्होंने सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की और उसके बाद परिवार की परिस्थितियों के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा।
लेकिन शायद उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि जिस बच्चे की पढ़ाई छूट रही है, वह आगे चलकर लोगों को पढ़ाई से ज्यादा जिंदगी के सबक अपनी कॉमेडी से देगा।
जॉनी लीवर को बचपन से ही लोगों की नकल करने का शौक था। वह फिल्मी कलाकारों की आवाज, चाल-ढाल और अंदाज की नकल किया करते थे।
उन्होंने छोटी उम्र से ही स्टेज पर परफॉर्म करना शुरू कर दिया था। आर्थिक जरूरतों के कारण उन्होंने अलग-अलग छोटे-मोटे काम भी किए और मुंबई की सड़कों पर पेन बेचने के दौरान फिल्मी सितारों की मिमिक्री करके लोगों का मनोरंजन किया।
यही वह दौर था जब उनकी सबसे बड़ी ताकत धीरे-धीरे सामने आ रही थी—आवाज बदलने की कला, चेहरे के हाव-भाव और किसी इंसान की बॉडी लैंग्वेज को पकड़ लेने की अद्भुत क्षमता।
यह कहानी भी उनके संघर्ष से ही जुड़ी है।
18 साल की उम्र में जॉनी ने अपने पिता के साथ हिंदुस्तान लीवर में काम किया। कंपनी के कार्यक्रमों में वह अधिकारियों और दूसरे लोगों की मिमिक्री किया करते थे।
उनकी मिमिक्री इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग उन्हें 'जॉनी लीवर' कहने लगे। बाद में यही नाम उनकी पहचान बन गया और फिल्म इंडस्ट्री में भी उन्होंने इसी नाम को अपना लिया।
यानी जिस कंपनी में वह नौकरी करने पहुंचे थे, उसी कंपनी के नाम का एक हिस्सा आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे मशहूर स्क्रीन नेम्स में शामिल हो गया।
यह जॉनी लीवर की कहानी का शायद सबसे खूबसूरत संयोग है।
जॉनी लीवर ने करीब छह साल हिंदुस्तान लीवर में काम किया। लेकिन उनका मन हमेशा मंच और मिमिक्री में लगा रहता था।
धीरे-धीरे उन्होंने स्टेज शो करना शुरू किया और मिमिक्री कलाकार के तौर पर उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। उनके प्रदर्शन में सिर्फ किसी की आवाज की नकल नहीं होती थी। वह पूरे व्यक्तित्व को पकड़ लेते थे।
इसी दौरान उनकी मुलाकात महान संगीतकार कल्याणजी से हुई। कल्याणजी उनके मेंटर बने और जॉनी लीवर ने उनसे काफी कुछ सीखा।
कल्याणजी-आनंदजी के शो और ऑर्केस्ट्रा के साथ काम करते हुए जॉनी लीवर को बड़े मंच मिले। उनकी कॉमेडी ने उन्हें सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं रखा।
1980 के दशक में उनके मिमिक्री और कॉमेडी कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग भी लोकप्रिय होने लगी। उनकी एल्बम हंसी के हंगामे को भारत के बाहर भी लोकप्रियता मिली।
आज जिस कलाकार को कैमरे के सामने बिल्कुल सहज देखा जाता है, कभी वही कैमरे से इतना डर गया था कि रातभर सो नहीं पाया था।
जॉनी लीवर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि फिल्मों में उनका शुरुआती ब्रेक ये रिश्ता ना टूटे से जुड़ा था। उन्होंने बताया कि पहली बार कैमरे के सामने जाने को लेकर वह बेहद घबराए हुए थे और शूटिंग छोड़कर वापस जाने का विचार भी उनके मन में आया था।
इसके बाद 1982 में वह दर्द का रिश्ता में नजर आए। फिल्म का निर्देशन और निर्माण सुनील दत्त ने किया था और इसमें सुनील दत्त, स्मिता पाटिल, रीना रॉय और अशोक कुमार जैसे बड़े कलाकार थे। जॉनी लीवर ने फिल्म में एक छोटी भूमिका निभाई।
उनके लिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी।
यह उस लंबे सफर की शुरुआत थी जिसमें एक स्टेज कलाकार धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों के सबसे भरोसेमंद कॉमेडी एक्टर्स में बदलने वाला था।
जॉनी लीवर के करियर में 1986 का Hope 86 कार्यक्रम एक अहम मोड़ माना जाता है।
इस कार्यक्रम में उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सामने परफॉर्म किया। वह वहां मुख्य कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि एक तरह के 'फिलर' के तौर पर मंच पर आए थे।
लेकिन उनकी परफॉर्मेंस ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींच लिया।
इसके बाद निर्माता गुल आनंद ने उन्हें जलवा में काम दिया। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और अर्चना पूरन सिंह प्रमुख भूमिकाओं में थे। जॉनी लीवर के लिए यह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह मजबूत करने का बड़ा मौका साबित हुई।
यहीं से उनकी यात्रा तेज होने लगी।
1980 के दशक के आखिर में जॉनी लीवर लगातार फिल्मों में नजर आने लगे।
तेजाब, चालबाज, किशन कन्हैया, खिलाड़ी, चमत्कार और कई दूसरी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह केवल 'एक जैसा कॉमेडी किरदार' नहीं निभाते थे।
कभी वह पुलिस वाले बने, कभी नौकर, कभी गैंग से जुड़ा किरदार, कभी चालाक सहायक और कभी ऐसा आम आदमी जो अपनी अजीबोगरीब हरकतों से पूरे सीन को यादगार बना देता था।
उनकी कॉमेडी का आधार सिर्फ डायलॉग नहीं था।
उनकी बॉडी लैंग्वेज ही आधी कॉमेडी थी।
चेहरे के भाव बदलना, आवाज का उतार-चढ़ाव, अचानक रुक जाना, किसी शब्द को अलग अंदाज में बोलना और सामने वाले कलाकार की ऊर्जा को पकड़कर उसके साथ खेलना—यह सब उनकी शैली का हिस्सा बन गया।
1990 का दशक जॉनी लीवर के करियर का सबसे महत्वपूर्ण दौर रहा।
बाजीगर में उनके किरदार ने दर्शकों को खूब हंसाया। राजा हिंदुस्तानी में भी उनकी कॉमिक टाइमिंग याद की गई। इसके बाद दीवाना मस्ताना और दुल्हे राजा जैसी फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी।
जॉनी लीवर को Filmfare Best Performance in a Comic Role का पुरस्कार दीवाना मस्ताना के लिए मिला।
इसके बाद दुल्हे राजा के लिए भी उन्होंने यही सम्मान हासिल किया। यानी उन्होंने लगातार दो वर्षों में इस श्रेणी में Filmfare जीता।
यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि जॉनी लीवर अब सिर्फ 'कॉमेडी करने वाले सपोर्टिंग एक्टर' नहीं रह गए थे।
वह खुद एक ब्रांड बन चुके थे।
90 के दशक में जॉनी लीवर और गोविंदा की जोड़ी ने कई फिल्मों में दर्शकों को खूब हंसाया।
गोविंदा की तेज बॉडी लैंग्वेज और जॉनी लीवर की टाइमिंग का मेल कई बार ऐसा माहौल बना देता था कि कहानी चाहे किसी भी दिशा में जा रही हो, दर्शकों का ध्यान उनकी तरफ खिंच जाता था।
दीवाना मस्ताना, दुल्हे राजा और दूसरी फिल्मों में उनका कॉमिक तालमेल हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय कॉमेडी जोड़ियों में गिना जाता है।
जॉनी लीवर ने इसी दौर में डेविड धवन और अब्बास-मस्तान जैसे निर्देशकों के साथ भी बार-बार काम किया।
जॉनी लीवर की खासियत यह रही कि उनकी लोकप्रियता किसी एक अभिनेता या एक दशक तक सीमित नहीं रही।
उन्होंने शाहरुख खान के साथ बाजीगर, कभी हां कभी ना, कुछ कुछ होता है, कभी खुशी कभी गम और दिलवाले जैसी फिल्मों में काम किया।
अक्षय कुमार के साथ खिलाड़ी, खिलाड़ी 786, अवारा पागल दीवाना, वेलकम, हाउसफुल फ्रेंचाइजी सहित कई फिल्मों में वह नजर आए।
आमिर खान के साथ राजा हिंदुस्तानी और दूसरी फिल्मों में उन्होंने काम किया।
सलमान खान, गोविंदा, अनिल कपूर, अजय देवगन, सनी देओल, संजय दत्त, अमिताभ बच्चन, परेश रावल, कादर खान और कई दूसरे बड़े कलाकारों के साथ भी जॉनी लीवर ने अलग-अलग फिल्मों में स्क्रीन साझा की।
उनकी फिल्मोग्राफी सैकड़ों फिल्मों तक फैली हुई है। उपलब्ध फिल्मोग्राफी स्रोत उन्हें 350 से अधिक फिल्मों से जोड़ते हैं।
जॉनी लीवर को सिर्फ 'कॉमेडियन' कह देना उनके अभिनय की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी कि वह छोटे से छोटे किरदार को भी अपनी मौजूदगी से यादगार बना देते थे।
उनके कई किरदार फिल्म की कहानी के केंद्र में नहीं होते थे, लेकिन दर्शक थिएटर से निकलने के बाद उन्हीं के संवाद और अंदाज याद रखते थे।
यही वजह है कि हिंदी सिनेमा में 'कॉमेडी सपोर्टिंग रोल' को जिस लोकप्रियता और स्टार वैल्यू तक पहुंचाने में कुछ कलाकारों का बड़ा योगदान रहा, जॉनी लीवर उनमें सबसे प्रमुख नाम हैं।
नई सदी की शुरुआत में भी जॉनी लीवर की मांग बनी रही।
कुछ कुछ होता है, कहो ना... प्यार है, कभी खुशी कभी गम, कभी खुशी कभी गम, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, आवारा पागल दीवाना, अजनबी, गोलमाल और कई अन्य फिल्मों में उन्होंने अपनी कॉमिक शैली का इस्तेमाल किया।
कोई... मिल गया में उनके काम को लेकर उन्हें Pogo Amazing Kids Award में Most Amazing Comedian का सम्मान भी मिला।
इस दौर में उनकी कॉमेडी का अंदाज भी बदल रहा था।
वह सिर्फ संवाद बोलकर हंसाने के बजाय किरदार की पूरी मानसिकता को कॉमेडी का हिस्सा बना देते थे।
जॉनी लीवर ने 1984 में सुजाता से शादी की। दोनों के दो बच्चे हैं—बेटी जेमी लीवर और बेटा जेस्सी लीवर।
जेमी लीवर ने भी पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए कॉमेडी और एक्टिंग की दुनिया में अपनी पहचान बनाई है। वह मिमिक्री और कॉमेडी के लिए जानी जाती हैं।
जॉनी लीवर के छोटे भाई जिमी मोसेस भी कॉमेडियन, मिमिक्री आर्टिस्ट और परफॉर्मर हैं।
यानी मनोरंजन की कला उनके परिवार में सिर्फ पेशा नहीं रही, बल्कि कई स्तरों पर एक विरासत बन गई।
जॉनी लीवर की जिंदगी का एक ऐसा पक्ष भी है जिसके बारे में उन्होंने खुद खुलकर बात की है।
2025 में कॉमेडियन सपन वर्मा के शो में बेटी जेमी लीवर के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने अपने करियर के चरम दौर में शराब की समस्या के बारे में खुलासा किया।
उन्होंने बताया कि दिन में फिल्मों की शूटिंग और रात में स्टेज शो के कारण वह बेहद थक जाते थे। इसी दौर में उनका शराब पीना भी बढ़ गया था। उन्होंने यहां तक बताया कि वह मुंबई के चौपाटी इलाके में रात देर तक शराब पीते थे।
लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनकी लत नहीं, बल्कि उससे बाहर निकलना है।
जॉनी लीवर के मुताबिक उन्होंने शराब छोड़ने का फैसला किया और 2025 में बताया कि करीब 24 साल से उन्होंने शराब को हाथ नहीं लगाया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कभी शराब के नशे में स्टेज पर परफॉर्म नहीं किया।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शराब की वजह से परिवार को तकलीफ हुई और पत्नी तथा बच्चों के साथ उनके रिश्तों पर भी असर पड़ा था।
यह स्वीकारोक्ति उनकी जिंदगी के सबसे ईमानदार हिस्सों में से एक है।
क्योंकि स्टार बनने के बाद अपनी कमजोरियों के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना आसान नहीं होता।
जॉनी लीवर के करियर में 1998 में एक विवाद भी सामने आया था। दुबई में एक निजी कार्यक्रम से जुड़े मामले में उन पर भारतीय राष्ट्रगान और संविधान का अपमान करने का आरोप लगा और उन्हें सजा सुनाए जाने की रिपोर्टें सामने आईं।
हालांकि जॉनी लीवर ने उस समय आरोपों को गलत बताया था और कहा था कि उनका उद्देश्य राष्ट्रगान का अपमान करना नहीं था। उन्होंने अपनी देशभक्ति पर भी जोर दिया था।
इसलिए इस घटना को उनके करियर की पूरी पहचान मानना उचित नहीं होगा। यह उनके लंबे करियर का एक विवादित अध्याय था, जिस पर उनके अपने पक्ष को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
जॉनी लीवर के परिवार ने एक बेहद कठिन दौर तब देखा जब उनके बेटे जेस्सी को बचपन में गर्दन में ट्यूमर की समस्या हुई थी।
2026 में जेमी लीवर ने एक बातचीत में इस पुराने पारिवारिक संघर्ष के बारे में विस्तार से बात की और बताया कि इस घटना ने पूरे परिवार को गहराई से प्रभावित किया था।
जॉनी लीवर के लिए यह वह दौर था जब करोड़ों लोगों को हंसाने वाला कलाकार खुद अपने परिवार को लेकर चिंता और असहायता महसूस कर रहा था।
यही वह हिस्सा है जो उनकी सार्वजनिक छवि के पीछे छिपे इंसान को समझने में मदद करता है।
जॉनी लीवर की संपत्ति को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग आंकड़े दिखाई देते हैं। लेकिन उनकी आधिकारिक नेट वर्थ सार्वजनिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
इसलिए किसी एक निश्चित करोड़ की रकम को तथ्य के रूप में लिखना सही नहीं होगा।
इतना जरूर स्पष्ट है कि दशकों लंबे फिल्मी करियर, स्टेज शो, अंतरराष्ट्रीय परफॉर्मेंस, फिल्मों और अन्य पेशेवर कामों ने उन्हें एक सफल और आर्थिक रूप से स्थापित कलाकार बनाया है।
उनकी लाइफस्टाइल के बारे में भी कई वेबसाइट्स अलग-अलग दावे करती हैं, लेकिन बिना विश्वसनीय प्राथमिक स्रोत के महंगी कारों, घरों या संपत्ति के सटीक आंकड़े को तथ्य मानना उचित नहीं है।
उनका स्क्रीन नेम हिंदुस्तान लीवर में काम करने के दिनों से जुड़ा है। कंपनी के कार्यक्रमों में मिमिक्री करने के कारण उन्हें जॉनी लीवर कहा जाने लगा।
पहली शूटिंग को लेकर जॉनी इतने घबराए थे कि उन्हें वहां से भाग जाने का मन हुआ था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
जॉनी किसी व्यक्ति की आवाज के साथ उसके चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज को भी पकड़ते थे। यही उनकी मिमिक्री को अलग बनाता था।
Hope 86 में उनका प्रदर्शन फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों के सामने हुआ और उसके बाद उनके फिल्मी करियर को महत्वपूर्ण गति मिली।
2025 में उन्होंने अपनी पुरानी शराब की लत के बारे में खुलकर बात की और इसे दूसरों के लिए चेतावनी के रूप में पेश किया।
आज जब हम हिंदी फिल्मों की कॉमेडी की बात करते हैं तो कादर खान, शक्ति कपूर, असरानी, महमूद, जगदीप, राजपाल यादव, परेश रावल जैसे कई बड़े कलाकारों के साथ जॉनी लीवर का नाम भी मजबूती से सामने आता है।
लेकिन जॉनी की शैली थोड़ी अलग थी।
वह संवाद को सिर्फ बोलते नहीं थे—उसे अपने चेहरे, आवाज और शरीर से 'परफॉर्म' करते थे।
उनकी कॉमेडी का एक हिस्सा स्क्रिप्ट में लिखा होता था, लेकिन दूसरा हिस्सा अक्सर उनकी टाइमिंग से पैदा होता था।
यही कारण है कि उनके कई दृश्य आज भी सोशल मीडिया और टीवी पर दोबारा देखे जाते हैं।
उनकी बेटी जेमी लीवर का मिमिक्री और कॉमेडी की तरफ आना भी इस बात का संकेत है कि जॉनी लीवर की कला अगली पीढ़ी तक पहुंच चुकी है।
जॉनी लीवर ने उम्र बढ़ने के साथ फिल्मों की संख्या जरूर कम की है, लेकिन उन्होंने अभिनय से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई है।
हाल के वर्षों में वह लंतरानी, आई वांट टू टॉक, बैडएस रवि कुमार, बी हैप्पी, हाउसफुल 5, है जवानी तो इश्क होना है और वेलकम टू द जंगल जैसी परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं। 2026 की उपलब्ध फिल्मोग्राफी जानकारी में तेरा यार हूं मैं और गोलमाल 5 भी उनके आगामी/संबंधित प्रोजेक्ट्स में सूचीबद्ध हैं।
इससे एक बात साफ है—जॉनी लीवर के लिए रिटायरमेंट का मतलब पूरी तरह पर्दे से गायब होना नहीं रहा।
वह आज भी उस पीढ़ी के कलाकार हैं जिन्हें दर्शक सिर्फ नाम से पहचान लेते हैं।
जॉनी लीवर की जिंदगी को अगर सिर्फ 'गरीब लड़का बॉलीवुड का कॉमेडी किंग बन गया' वाली कहानी बना दिया जाए, तो यह उनकी यात्रा के साथ न्याय नहीं होगा।
उनकी असली कहानी इससे कहीं बड़ी है।
एक ऐसा बच्चा जिसकी पढ़ाई आर्थिक मुश्किलों के कारण छूट गई।
एक ऐसा युवक जिसने नौकरी करते हुए अपनी कला को जिंदा रखा।
एक ऐसा स्टेज कलाकार जिसने फिल्म इंडस्ट्री के सामने खुद को साबित किया।
एक ऐसा अभिनेता जिसने छोटे किरदारों को अपनी मौजूदगी से बड़ा बना दिया।
एक ऐसा सुपरस्टार जिसने सफलता के बीच अपनी निजी कमजोरियों का सामना किया।
और फिर एक ऐसा इंसान जिसने अपनी जिंदगी को दोबारा संभाला।
यही जॉनी लीवर की असली जीत है।
जॉनी लीवर की कहानी में सबसे खूबसूरत बात यह नहीं है कि उन्होंने कितनी फिल्में कीं या कितने पुरस्कार जीते।
सबसे खूबसूरत बात यह है कि उन्होंने मौका मिलने का इंतजार नहीं किया—उन्होंने अपनी कला से खुद के लिए जगह बनाई।
मुंबई की सड़कों पर पेन बेचते हुए लोगों की नकल करने वाला युवक एक दिन ऐसा कलाकार बना, जिसकी नकल करने की कोशिश खुद कई कॉमेडियन करने लगे।
Filmfare की ट्रॉफियां उनके करियर की उपलब्धि जरूर हैं, लेकिन उनकी असली विरासत उन अनगिनत दर्शकों की हंसी है जिन्होंने थिएटर में उनका नाम आते ही खुशी महसूस की।
जॉनी लीवर ने साबित किया कि कॉमेडी कोई हल्की चीज नहीं है।
लोगों को रुलाना शायद अभिनय का हिस्सा हो सकता है, लेकिन करोड़ों लोगों को लगातार हंसाते रहना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी कला है।
और जॉनी लीवर ने इस कला को सिर्फ निभाया नहीं—उन्होंने हिंदी सिनेमा में इसकी एक पूरी पहचान बना दी।
एक पेन बेचने वाले संघर्षशील कलाकार से लेकर भारतीय सिनेमा के सबसे पहचाने जाने वाले कॉमेडियन तक का यह सफर आज भी यही कहता है—प्रतिभा छोटी जगह से निकल सकती है, लेकिन अगर उसमें मेहनत और जिद जुड़ जाए, तो उसकी पहुंच बहुत दूर तक जाती है।
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