नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक
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| श्रीदेवी की अनकही कहानी |
कुछ कलाकार फिल्में करते हैं, कुछ कलाकार स्टार बनते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिनके जाने के बाद भी उनका नाम सिनेमा की कहानी से कभी मिटता नहीं। श्रीदेवी इसी तीसरी श्रेणी की अभिनेत्री थीं।
13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के शिवकाशी में जन्मी श्रीदेवी ने कैमरे का सामना उस उम्र में कर लिया था, जब ज्यादातर बच्चे स्कूल की दुनिया समझना शुरू करते हैं। चार साल की उम्र में फिल्मी सफर शुरू हुआ और अगले पांच दशकों में उन्होंने तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।
लेकिन श्रीदेवी की कहानी सिर्फ फिल्मों की सफलता की कहानी नहीं है।
यह उस लड़की की कहानी है जिसने बचपन खोकर अभिनय पाया, दक्षिण भारतीय सिनेमा में अपनी जगह बनाई, हिंदी फिल्मों में शुरुआत में असफलता देखी, फिर हिम्मतवाला से ऐसा तूफान खड़ा किया कि पूरा बॉलीवुड उनकी तरफ देखने लगा।
इसके बाद सदमा, मिस्टर इंडिया, नगीना, चांदनी, चालबाज, लम्हे, जुदाई जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को नई परिभाषा दी।
और जब लगा कि उनका दौर खत्म हो चुका है, तब 15 साल से ज्यादा के अंतराल के बाद इंग्लिश विंग्लिश के साथ श्रीदेवी ने साबित कर दिया कि असली सुपरस्टार की उम्र नहीं होती।
24 फरवरी 2018 को दुबई में उनके आकस्मिक निधन ने करोड़ों प्रशंसकों को स्तब्ध कर दिया। लेकिन उनकी फिल्मों में कैद वह चेहरा आज भी उतना ही जिंदा है।
श्रीदेवी का जन्म श्री अम्मा यंगर अय्यपन के नाम से हुआ था। उनका जन्म तमिलनाडु के शिवकाशी में हुआ। उनके पिता अय्यपन वकील थे और उनकी मां राजेश्वरी थीं। श्रीदेवी का पारिवारिक और भाषाई जुड़ाव तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश दोनों से था और वह तमिल तथा तेलुगु भाषाओं से परिचित थीं।
उनकी एक बहन श्रीलता थीं। परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों और फिल्मों में बेहद कम उम्र से काम करने के कारण श्रीदेवी का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं रहा।
जब वह सिर्फ चार साल की थीं, तब 1967 की तमिल फिल्म कंधन करुणई में उन्होंने बाल कलाकार के तौर पर काम किया। इसके बाद थुनैवन जैसी फिल्मों में भी वह बाल कलाकार के रूप में नजर आईं।
यहीं से वह सफर शुरू हुआ जिसने आगे चलकर भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
श्रीदेवी का बचपन फिल्मों के सेट पर बीता।
उन्होंने तमिल के साथ-साथ तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी बाल कलाकार के रूप में काम किया। मलयालम फिल्म पूम्पट्टा में उनके अभिनय को खास सराहना मिली और इसके लिए उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का सम्मान मिला।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि वह सिर्फ एक भाषा की बाल कलाकार नहीं रह गई थीं। अलग-अलग भाषाओं और फिल्म इंडस्ट्री में काम करने से उनके अभिनय की नींव बेहद कम उम्र में मजबूत होती चली गई।
उनके लिए अभिनय कोई अचानक चुना गया करियर नहीं था।
यह उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था।
हिंदी सिनेमा में श्रीदेवी की शुरुआती मौजूदगी बाल कलाकार के रूप में हुई। जूली में उन्होंने एक छोटी भूमिका निभाई थी। बाद में 1979 में सोलहवां सावन से उन्होंने हिंदी सिनेमा में मुख्य अभिनेत्री के तौर पर कदम रखा।
लेकिन शुरुआत वैसी नहीं रही जैसी किसी भविष्य की सुपरस्टार से उम्मीद की जाती है।
सोलहवां सावन बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी। हिंदी सिनेमा में उन्हें तुरंत वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थीं।
लेकिन यही असफलता आगे की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
श्रीदेवी वापस दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर गईं और वहां लगातार काम करती रहीं। उस समय तक वह तमिल और तेलुगु सिनेमा में एक स्थापित नाम बन चुकी थीं।
हिंदी दर्शकों के सामने आने से पहले श्रीदेवी दक्षिण भारतीय सिनेमा में लंबा सफर तय कर चुकी थीं।
कमल हासन, रजनीकांत, एन.टी. रामाराव और कई बड़े दक्षिण भारतीय सितारों के साथ उन्होंने काम किया। 16 वयथिनिले, सिगप्पु रोजाक्कल, मूंदराम पिरई, प्रेमाभिषेकम, मींडुम कोकिला जैसी फिल्मों ने उन्हें दक्षिण भारतीय सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।
खास तौर पर मूंदराम पिरई में उनके अभिनय ने दिखाया कि श्रीदेवी सिर्फ ग्लैमर और डांस तक सीमित अभिनेत्री नहीं थीं।
यह फिल्म बाद में हिंदी में सदमा नाम से आई और श्रीदेवी के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो गई।
1983 में आई हिम्मतवाला श्रीदेवी के हिंदी करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई।
जितेंद्र के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को बेहद पसंद आई और फिल्म की जबरदस्त सफलता ने श्रीदेवी को रातोंरात हिंदी सिनेमा की बड़ी अभिनेत्रियों में ला खड़ा किया।
हिम्मतवाला के बाद उनके पास फिल्मों की लाइन लग गई।
जितेंद्र के साथ उनकी जोड़ी इतनी लोकप्रिय हुई कि दोनों ने कुछ ही वर्षों में करीब 20 फिल्मों में साथ काम किया। जानी दोस्त, जस्टिस चौधरी, तोहफा, बलिदान जैसी फिल्मों ने इस जोड़ी को व्यावसायिक रूप से बेहद सफल बनाया।
लेकिन श्रीदेवी ने खुद को सिर्फ मसाला फिल्मों तक सीमित नहीं किया।
यही उनके करियर की असली खूबसूरती थी।
उसी दौर में सदमा जैसी फिल्म आई।
कमल हासन के साथ इस फिल्म में श्रीदेवी ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो दुर्घटना के बाद मानसिक रूप से बच्चे जैसी अवस्था में पहुंच जाती है।
यह भूमिका बेहद कठिन थी।
एक तरफ मासूमियत दिखानी थी, दूसरी तरफ किरदार के भीतर छिपे दर्द और भावनाओं को भी व्यक्त करना था। श्रीदेवी ने इस भूमिका में संवादों से ज्यादा अपनी आंखों और चेहरे के भावों से अभिनय किया।
फिल्म की रिलीज के समय इसकी व्यावसायिक सफलता सीमित रही, लेकिन समय के साथ सदमा को श्रीदेवी के सबसे प्रभावशाली अभिनय वाली फिल्मों में गिना जाने लगा।
यही वह फिल्म थी जिसने यह साफ कर दिया कि श्रीदेवी सिर्फ एक बड़ी स्टार नहीं थीं—वह एक बेहद सक्षम अभिनेत्री भी थीं।
1987 में मिस्टर इंडिया आई।
अनिल कपूर के साथ श्रीदेवी ने पत्रकार सीमा सोनी का किरदार निभाया। फिल्म में उन्होंने कॉमेडी, रोमांस, ड्रामा और ग्लैमर—चारों को एक साथ संभाला।
हवा हवाई और काटे नहीं कटते जैसे गानों में उनका अंदाज आज भी हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय यादों का हिस्सा है।
मिस्टर इंडिया ने श्रीदेवी को एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया जो फिल्म में हीरो के बराबर नहीं, बल्कि कई बार उससे भी ज्यादा ध्यान खींच सकती थी।
1986 की नगीना ने श्रीदेवी के स्टारडम को एक और स्तर पर पहुंचाया।
फिल्म की कहानी और उनका किरदार पूरी तरह उनके इर्द-गिर्द घूमता था। नागिन के किरदार में श्रीदेवी ने जिस तरह अभिनय और डांस को मिलाया, उसने फिल्म को खास पहचान दिलाई।
मैं तेरी दुश्मन आज भी उस दौर के सबसे यादगार फिल्मी डांस नंबरों में गिना जाता है।
यह दौर महत्वपूर्ण था क्योंकि श्रीदेवी ऐसी फिल्मों को भी सफल बना रही थीं जिनकी कहानी का मुख्य भार एक महिला किरदार पर था।
फिर आया 1989।
यश चोपड़ा की चांदनी ने श्रीदेवी की छवि को पूरी तरह बदल दिया।
फिल्म में उनकी सादगी, सफेद परिधान, भावनात्मक अभिनय और रोमांटिक स्क्रीन प्रेजेंस दर्शकों के दिल में बस गई।
ऋषि कपूर और विनोद खन्ना के साथ बनी यह फिल्म हिंदी सिनेमा की रोमांटिक क्लासिक्स में शामिल हो गई।
श्रीदेवी का किरदार 'चांदनी' सिर्फ एक फिल्मी चरित्र नहीं रहा। वह 1980 के दशक के आखिर में हिंदी फिल्म रोमांस की पहचान बन गया।
1989 में ही चालबाज आई।
इस फिल्म में श्रीदेवी ने जुड़वां बहनों अंजू और मंजू की दोहरी भूमिका निभाई।
दोनों किरदारों की चाल, भाषा, व्यवहार और व्यक्तित्व अलग था। एक तरफ शर्मीली अंजू और दूसरी तरफ बेबाक मंजू—श्रीदेवी ने दोनों के बीच इतना स्पष्ट अंतर बनाया कि दर्शकों को एक ही अभिनेत्री के दो बिल्कुल अलग रूप दिखाई दिए।
फिल्म में उनकी कॉमिक टाइमिंग और शारीरिक अभिनय को खूब सराहा गया।
इस भूमिका के लिए श्रीदेवी को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला।
1991 में आई लम्हे श्रीदेवी के करियर की सबसे अलग फिल्मों में से एक थी।
यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने दो पीढ़ियों से जुड़े महिला किरदारों को निभाया।
फिल्म का विषय अपने समय के लिहाज से असामान्य था और बॉक्स ऑफिस पर इसे वैसी सफलता नहीं मिली जैसी श्रीदेवी की बड़ी व्यावसायिक फिल्मों को मिली थी।
लेकिन समय के साथ लम्हे की प्रतिष्ठा बढ़ी और इसे श्रीदेवी के चुनौतीपूर्ण अभिनय वाली फिल्मों में शामिल किया जाने लगा।
इस फिल्म के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार मिला।
अपने लंबे करियर में श्रीदेवी ने भारतीय सिनेमा के कई दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया।
उनकी सबसे चर्चित जोड़ियों में जितेंद्र, अनिल कपूर, ऋषि कपूर, कमल हासन, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, संजय दत्त, सनी देओल और दक्षिण भारतीय सिनेमा के कई बड़े सितारे शामिल रहे।
जितेंद्र के साथ उनकी जोड़ी ने कई व्यावसायिक सफल फिल्में दीं।
अनिल कपूर के साथ मिस्टर इंडिया, लम्हे और बाद में जुदाई जैसी फिल्मों ने दर्शकों के बीच खास जगह बनाई।
कमल हासन के साथ सदमा और दक्षिण भारतीय फिल्मों में उनकी साझेदारी ने उनके अभिनय के गंभीर पक्ष को सामने रखा।
ऋषि कपूर के साथ चांदनी और नगीना जैसी फिल्मों ने उन्हें रोमांटिक स्टार के रूप में लोकप्रिय बनाया।
1990 के दशक में हिंदी सिनेमा की नायिकाओं की भूमिकाएं तेजी से बदल रही थीं।
श्रीदेवी ने खुदा गवाह, गुमराह, लाडला और जुदाई जैसी फिल्मों में काम किया।
गुमराह में उन्होंने अपराध की कहानी के बीच एक भावनात्मक और संघर्षशील किरदार निभाया।
लाडला में उनका किरदार बेहद मजबूत था।
और 1997 की जुदाई उनके करियर की अंतिम बड़ी फिल्मों में से एक साबित हुई। फिल्म में उन्होंने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जिसकी भौतिक इच्छाएं उसके जीवन के रिश्तों के सामने बड़ा नैतिक सवाल खड़ा करती हैं।
फिल्म सफल रही और श्रीदेवी ने एक बार फिर साबित किया कि वह महिला-केंद्रित किरदार को व्यावसायिक सिनेमा में भी आकर्षक बना सकती हैं।
श्रीदेवी की निजी जिंदगी हमेशा लोगों की दिलचस्पी का विषय रही।
उन्होंने फिल्म निर्माता बोनी कपूर से 1996 में शादी की। उनके दो बच्चे हैं—जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर।
श्रीदेवी और बोनी कपूर के रिश्ते को लेकर उस दौर में काफी चर्चा और आलोचना हुई, क्योंकि बोनी कपूर पहले से विवाहित थे और उनके पहली पत्नी मोना शौरी कपूर से दो बच्चे, अर्जुन कपूर और अंशुला कपूर थे।
इस विषय से जुड़े कई दावे वर्षों तक मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में सामने आते रहे हैं। लेकिन श्रीदेवी की निजी जिंदगी के बारे में अपुष्ट अफवाहों को तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
श्रीदेवी ने बाद के वर्षों में अपने परिवार को काफी प्राथमिकता दी और फिल्मों से दूरी बना ली।
1997 में जुदाई के बाद श्रीदेवी लंबे समय तक फिल्मों से दूर रहीं।
यह वह समय था जब वह एक सुपरस्टार होने के बजाय पत्नी और मां की भूमिका में अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहती थीं।
करीब 15 साल तक बड़े पर्दे से दूर रहने के बावजूद उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई।
उनकी पुरानी फिल्में टीवी और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचती रहीं।
और फिर 2012 में उन्होंने ऐसा कमबैक किया जिसकी शायद किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
इंग्लिश विंग्लिश सिर्फ श्रीदेवी की वापसी नहीं थी।
यह एक अभिनेत्री का अपने दर्शकों से दोबारा मिलना था।
गौरी शिंदे की इस फिल्म में श्रीदेवी ने शशि नाम की एक गृहिणी का किरदार निभाया, जो अंग्रेजी भाषा को लेकर अपने परिवार और समाज के बीच असुरक्षित महसूस करती है।
शशि धीरे-धीरे अपनी पहचान और आत्मविश्वास वापस हासिल करती है।
किरदार बहुत साधारण था, लेकिन श्रीदेवी के अभिनय ने उसे असाधारण बना दिया।
फिल्म ने यह दिखाया कि एक अभिनेत्री जिसे कभी बॉलीवुड की सबसे बड़ी स्टार कहा गया था, वह बिना ग्लैमर और बड़े एक्शन के भी दर्शकों को भावुक कर सकती है।
इंग्लिश विंग्लिश ने श्रीदेवी को नई पीढ़ी से दोबारा जोड़ दिया। फिल्म को आलोचकों और दर्शकों दोनों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।
2017 में आई मॉम श्रीदेवी की आखिरी प्रमुख फिल्म थी।
इसमें उन्होंने एक मां की भूमिका निभाई जो अपनी बेटी के साथ हुए अपराध के बाद न्याय की तलाश में निकलती है।
यह भूमिका उनके करियर के शुरुआती दौर के ग्लैमरस किरदारों से बिल्कुल अलग थी।
यहां श्रीदेवी के पास न हवा हवाई जैसा गीत था, न चांदनी जैसी रोमांटिक छवि।
उनके पास सिर्फ एक मां का दर्द था।
और उन्होंने उसी दर्द को अपनी आंखों और अभिनय से पर्दे पर उतार दिया।
मॉम को उनकी अंतिम महत्वपूर्ण अभिनय प्रस्तुतियों में गिना जाता है।
श्रीदेवी को अपने करियर में कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले।
उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के सम्मान मिले और चालबाज तथा लम्हे के लिए उनकी जीत विशेष रूप से याद की जाती है। उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी मिला।
2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।
उनके करियर का सबसे बड़ा सम्मान शायद किसी ट्रॉफी में नहीं था।
वह सम्मान था—एक महिला कलाकार का अकेले फिल्म को अपने कंधों पर सफल बनाने की क्षमता हासिल करना।
इसी वजह से उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार के रूप में याद किया जाता है।
श्रीदेवी ने जिस उम्र में अभिनय शुरू किया, उस उम्र में उन्हें शायद यह अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि कैमरे के सामने खड़े होने का यह सिलसिला उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास तक ले जाएगा।
श्रीदेवी ने हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में काम किया।
यानी उनका स्टारडम सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं था।
सोलहवां सावन की असफलता के बाद उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम जारी रखा। कुछ वर्षों बाद हिम्मतवाला ने उनकी हिंदी फिल्म यात्रा को पूरी तरह बदल दिया।
एक ही करियर में उन्होंने बाल कलाकार, रोमांटिक नायिका, कॉमेडियन, ग्लैमरस स्टार, गंभीर अभिनेत्री, मां और बदला लेने वाली महिला जैसे बिल्कुल अलग किरदार निभाए।
कई कलाकार लंबे ब्रेक के बाद लौटते हैं, लेकिन श्रीदेवी की इंग्लिश विंग्लिश वाली वापसी खास थी क्योंकि उन्होंने उस फिल्म में अपने स्टारडम को पीछे छोड़कर किरदार को आगे रखा।
श्रीदेवी की जिंदगी पूरी तरह विवादों से मुक्त नहीं थी।
उनके और बोनी कपूर के रिश्ते को लेकर उस समय काफी सार्वजनिक चर्चा हुई। शादी की परिस्थितियों को लेकर भी मीडिया में अनेक रिपोर्टें प्रकाशित हुईं। हाल के वर्षों में उनके परिवार के सदस्यों ने भी उस दौर की सामाजिक आलोचना और उसके भावनात्मक प्रभाव के बारे में बात की है।
श्रीदेवी के करियर के दौरान दूसरी अभिनेत्रियों के साथ कथित प्रतिस्पर्धा और रिश्तों को लेकर भी कई कहानियां मीडिया में आती रहीं।
लेकिन इनमें से हर दावे को तथ्य मानना सही नहीं होगा।
इसलिए उनकी जीवनी में केवल व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई और पुष्ट जानकारी को ही आधार बनाना उचित है।
श्रीदेवी की संपत्ति और नेट वर्थ को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं।
लेकिन उनके निधन के समय उनकी कुल संपत्ति की कोई ऐसी आधिकारिक, सार्वजनिक और स्वतंत्र रूप से सत्यापित संख्या उपलब्ध नहीं है, जिसे निश्चित नेट वर्थ के रूप में लिखा जा सके।
इसलिए करोड़ों रुपये की किसी खास राशि को उनकी पक्की नेट वर्थ बताना उचित नहीं होगा।
इतना जरूर स्पष्ट है कि वह अपने समय की सबसे सफल और महंगी भारतीय अभिनेत्रियों में शामिल थीं और फिल्मों के अलावा उनके परिवार की संपत्ति तथा अन्य निवेश भी थे।
फरवरी 2018 में श्रीदेवी परिवार के साथ दुबई में थीं।
वहां एक पारिवारिक शादी में शामिल होने के दौरान 24 फरवरी 2018 को उनका निधन हो गया। वह सिर्फ 54 वर्ष की थीं।
शुरुआती मीडिया रिपोर्टों में मौत के कारण को लेकर अलग-अलग बातें सामने आईं, लेकिन दुबई पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम के बाद उनकी मृत्यु को बाथटब में आकस्मिक रूप से डूबने के रूप में दर्ज किया गया। जांच के बाद पुलिस ने मामला बंद कर दिया था।
उनकी मौत ने पूरे भारत को झकझोर दिया।
एक ऐसी अभिनेत्री, जिसने दशकों तक पर्दे पर लोगों को हंसाया, रुलाया और चौंकाया था, वह अचानक हमेशा के लिए कैमरे से दूर हो गई।
कई कलाकारों की लोकप्रियता समय के साथ कम हो जाती है।
श्रीदेवी के साथ ऐसा नहीं हुआ।
उनकी फिल्में आज भी देखी जाती हैं।
सदमा उनकी अभिनय क्षमता की याद दिलाती है।
मिस्टर इंडिया उनकी कॉमेडी और स्क्रीन प्रेजेंस की।
नगीना उनके स्टारडम की।
चांदनी उनकी रोमांटिक छवि की।
चालबाज उनके कॉमिक और डबल रोल अभिनय की।
लम्हे उनके प्रयोग करने के साहस की।
और इंग्लिश विंग्लिश यह बताती है कि उम्र और ब्रेक किसी महान कलाकार की चमक को खत्म नहीं कर सकते।
श्रीदेवी अब हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनकी विरासत भारतीय सिनेमा में आज भी मौजूद है।
उनकी बेटियां जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर भी फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं। इस तरह श्रीदेवी की अगली पीढ़ी भी अभिनय और सिनेमा से जुड़ी हुई है।
श्रीदेवी की तस्वीरें, उनके गाने और उनकी फिल्में आज भी सोशल मीडिया पर चर्चा में रहती हैं।
हर नई पीढ़ी जब हवा हवाई, मैं तेरी दुश्मन, काटे नहीं कटते या चांदनी ओ मेरी चांदनी जैसे गीतों को देखती है, तो उसे समझ आता है कि स्टारडम सिर्फ लोकप्रियता का नाम नहीं होता।
कभी-कभी स्टारडम किसी कलाकार की पूरी पहचान बन जाता है।
श्रीदेवी की कहानी को अगर सिर्फ सफलता की कहानी कहा जाए तो यह अधूरा होगा।
उन्होंने बचपन में काम शुरू किया।
दक्षिण भारतीय सिनेमा में खुद को साबित किया।
हिंदी सिनेमा में असफलता देखी।
फिर हिम्मतवाला से वापसी की।
उन्होंने ग्लैमरस भूमिकाएं कीं, लेकिन सदमा जैसी चुनौतीपूर्ण फिल्म से अपने अभिनय की गहराई भी साबित की।
उन्होंने चालबाज में कॉमेडी की, लम्हे में जोखिम लिया और इंग्लिश विंग्लिश में बेहद सामान्य भारतीय गृहिणी का किरदार निभाकर करोड़ों दर्शकों के दिल छू लिए।
यही श्रीदेवी की सबसे बड़ी खूबी थी।
वह सिर्फ किसी दौर की अभिनेत्री नहीं थीं।
वह कई दौरों को जोड़ने वाली अभिनेत्री थीं।
24 फरवरी 2018 को श्रीदेवी की सांसें थम गईं, लेकिन उनकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
क्योंकि कुछ कलाकारों की जिंदगी उनके जाने के बाद शुरू होती है—उनकी फिल्मों के जरिए, उनके किरदारों के जरिए और उन यादों के जरिए जो दर्शक अपने भीतर संभालकर रखते हैं।
श्रीदेवी ने भारतीय सिनेमा में यह साबित किया कि एक महिला भी अपने दम पर फिल्म चला सकती है, बॉक्स ऑफिस पर राज कर सकती है और किसी पुरुष सुपरस्टार की छाया के बिना अपनी अलग पहचान बना सकती है।
चार साल की वह बच्ची, जिसने कैमरे के सामने कदम रखा था, आगे चलकर भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार कहलायी।
और शायद श्रीदेवी की सबसे खूबसूरत विरासत यही है—
वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब तक भारतीय सिनेमा में अभिनय, खूबसूरती, कॉमेडी, डांस और भावनाओं की बात होगी, श्रीदेवी का नाम लिया जाता रहेगा।
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