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नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक

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 नाना पाटेकर: भूख से निकली वह आवाज, जिसने भारतीय सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया “₹35 से स्टार बनने तक…” कुछ कलाकार पर्दे पर किरदार निभाते हैं, कुछ कलाकार किरदार में इस तरह उतर जाते हैं कि दर्शक उन्हें भूल ही नहीं पाता। नाना पाटेकर दूसरी श्रेणी के कलाकार थे। उनकी आंखों में गुस्सा दिखाई देता था, आवाज में एक अलग तरह की खुरदुराहट थी और संवाद बोलने का अंदाज ऐसा कि साधारण-सा वाक्य भी दिल के भीतर उतर जाता था। उन्होंने जब पुलिसवाले का किरदार निभाया तो वह पुलिसवाला सिर्फ पर्दे पर नहीं रहा, जब उन्होंने खलनायक का किरदार निभाया तो वह सिर्फ विलेन नहीं लगे और जब उन्होंने टूटे हुए इंसान की भूमिका की तो दर्शकों को उसमें अपना दर्द दिखाई दिया। लेकिन नाना पाटेकर की असली कहानी कैमरे के सामने शुरू नहीं हुई थी। वह कहानी बहुत पहले शुरू हो चुकी थी—उस समय, जब एक बच्चे को अपने परिवार की मदद करने के लिए स्कूल के बाद मुंबई की सड़कों पर फिल्म पोस्टर पेंट करने पड़ते थे। नाना ने खुद बताया था कि 13 साल की उम्र में वह पोस्टर पेंट करते थे, करीब आठ किलोमीटर पैदल जाते थे और बदले में उन्हें एक वक्त का खाना तथा महीन...

नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक

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 नाना पाटेकर: भूख से निकली वह आवाज, जिसने भारतीय सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया “₹35 से स्टार बनने तक…” कुछ कलाकार पर्दे पर किरदार निभाते हैं, कुछ कलाकार किरदार में इस तरह उतर जाते हैं कि दर्शक उन्हें भूल ही नहीं पाता। नाना पाटेकर दूसरी श्रेणी के कलाकार थे। उनकी आंखों में गुस्सा दिखाई देता था, आवाज में एक अलग तरह की खुरदुराहट थी और संवाद बोलने का अंदाज ऐसा कि साधारण-सा वाक्य भी दिल के भीतर उतर जाता था। उन्होंने जब पुलिसवाले का किरदार निभाया तो वह पुलिसवाला सिर्फ पर्दे पर नहीं रहा, जब उन्होंने खलनायक का किरदार निभाया तो वह सिर्फ विलेन नहीं लगे और जब उन्होंने टूटे हुए इंसान की भूमिका की तो दर्शकों को उसमें अपना दर्द दिखाई दिया। लेकिन नाना पाटेकर की असली कहानी कैमरे के सामने शुरू नहीं हुई थी। वह कहानी बहुत पहले शुरू हो चुकी थी—उस समय, जब एक बच्चे को अपने परिवार की मदद करने के लिए स्कूल के बाद मुंबई की सड़कों पर फिल्म पोस्टर पेंट करने पड़ते थे। नाना ने खुद बताया था कि 13 साल की उम्र में वह पोस्टर पेंट करते थे, करीब आठ किलोमीटर पैदल जाते थे और बदले में उन्हें एक वक्त का खाना तथा महीन...

एस. डी. बर्मन की पूरी कहानी: राजघराने से बॉलीवुड के महान संगीतकार तक का सफर

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 एस. डी. बर्मन: राजघराने से निकलकर हिंदी सिनेमा की धुनों का बादशाह बनने की पूरी कहानी राजघराने से संगीत की दुनिया तक कभी-कभी किसी कलाकार की सबसे बड़ी पहचान उसकी शोहरत नहीं, बल्कि यह होती है कि उसके जाने के दशकों बाद भी उसकी बनाई हुई धुनें लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनी रहें। एस. डी. बर्मन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 1 अक्टूबर 1906 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के कुमिल्ला में जन्मे सचिन देव बर्मन ने जिस दौर में संगीत की दुनिया में कदम रखा, उस समय फिल्म संगीत आज की तरह स्थापित और व्यवस्थित उद्योग नहीं था। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, रंगमंच और पारंपरिक गायकी के बीच से गुजरते हुए उन्होंने अपनी एक अलग भाषा बनाई। वह राजपरिवार से आते थे, लेकिन उनकी असली ताकत राजसी विरासत नहीं थी। वह बंगाल और पूर्वी भारत की लोकधुनों से गहरे प्रभावित थे। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में कई बार ऐसा एहसास होता है जैसे कोई गीत स्टूडियो में नहीं, बल्कि नदी के किनारे, खेतों के बीच या किसी पुराने गांव की पगडंडी पर जन्मा हो। एस. डी. बर्मन सिर्फ संगीत निर्देशक नहीं थे। वह गायक भी थे। उनकी आवाज़ पारंपरिक अर्थों में चमकद...