नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक
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| राजघराने से संगीत की दुनिया तक |
कभी-कभी किसी कलाकार की सबसे बड़ी पहचान उसकी शोहरत नहीं, बल्कि यह होती है कि उसके जाने के दशकों बाद भी उसकी बनाई हुई धुनें लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनी रहें। एस. डी. बर्मन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
1 अक्टूबर 1906 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के कुमिल्ला में जन्मे सचिन देव बर्मन ने जिस दौर में संगीत की दुनिया में कदम रखा, उस समय फिल्म संगीत आज की तरह स्थापित और व्यवस्थित उद्योग नहीं था। शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, रंगमंच और पारंपरिक गायकी के बीच से गुजरते हुए उन्होंने अपनी एक अलग भाषा बनाई।
वह राजपरिवार से आते थे, लेकिन उनकी असली ताकत राजसी विरासत नहीं थी। वह बंगाल और पूर्वी भारत की लोकधुनों से गहरे प्रभावित थे। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में कई बार ऐसा एहसास होता है जैसे कोई गीत स्टूडियो में नहीं, बल्कि नदी के किनारे, खेतों के बीच या किसी पुराने गांव की पगडंडी पर जन्मा हो।
एस. डी. बर्मन सिर्फ संगीत निर्देशक नहीं थे। वह गायक भी थे। उनकी आवाज़ पारंपरिक अर्थों में चमकदार नहीं थी, लेकिन उसमें एक ऐसी सच्चाई थी जो सीधे श्रोता तक पहुंचती थी। ‘ओ रे माझी’, ‘वहां कौन है तेरा’, ‘सुन मेरे बंधु रे’ और ‘सफल होगी तेरी आराधना’ जैसे गीतों में उनकी अपनी आवाज़ ने अलग ही पहचान बनाई।
और फिर आया वह दौर जब उन्होंने देव आनंद, गुरु दत्त, बिमल रॉय, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त और कई दूसरे दिग्गजों के साथ मिलकर हिंदी फिल्म संगीत को ऐसी ऊंचाई दी, जिसका प्रभाव आज भी सुनाई देता है।
सचिन देव बर्मन का जन्म कुमिल्ला में हुआ था, जो आज बांग्लादेश में है। उनके पिता नबद्वीपचंद्र देव बर्मन संगीत के जानकार थे और सितार तथा ध्रुपद से जुड़े हुए थे। उनके परिवार की जड़ें त्रिपुरा के राजघराने से जुड़ी थीं। एस. डी. बर्मन ने अपने जीवन के शुरुआती करीब 18 वर्ष कुमिल्ला के दक्षिण चरथा स्थित पारिवारिक राजबाड़ी में बिताए थे।
लेकिन राजसी वातावरण में पलने वाले इस बच्चे की रुचि सिर्फ पारिवारिक प्रतिष्ठा में नहीं थी। संगीत धीरे-धीरे उनके जीवन का केंद्र बनता गया।
उन्होंने संगीत की शिक्षा कई गुरुओं से ली। उनके प्रशिक्षण में उनके पिता के अलावा के. सी. डे, उस्ताद बादल खान और उस्ताद अलाउद्दीन खान जैसे बड़े संगीतज्ञों का प्रभाव बताया जाता है। इस प्रशिक्षण ने उनके भीतर शास्त्रीय संगीत की समझ पैदा की, लेकिन उनकी आत्मा लोक संगीत में बसती रही।
यही मिश्रण आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बना—शास्त्रीय अनुशासन और लोक संगीत की सहजता।
एस. डी. बर्मन के संगीत को समझने के लिए उनके लोक संगीत प्रेम को समझना जरूरी है।
उन्होंने बंगाल और आसपास के इलाकों में प्रचलित लोकधुनों को बहुत करीब से सुना और आत्मसात किया। उनकी रचनाओं में बंगाली लोक संगीत की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
उनकी खासियत यह थी कि वह लोकधुन को हूबहू दोहराने के बजाय उसे फिल्म की कहानी और पात्रों के अनुरूप ढाल देते थे। इसीलिए उनकी धुनें ग्रामीण भी लगती थीं और सिनेमाई भी।
बाद में देव आनंद ने भी उनके संगीत की इसी विशेषता की प्रशंसा की थी। एस. डी. बर्मन के पास लोकधुनों का बहुत बड़ा भंडार था और यही उनकी रचनात्मक पूंजी बन गया।
एस. डी. बर्मन का फिल्मी सफर केवल संगीत निर्देशक के रूप में शुरू नहीं हुआ था। वह पहले एक गायक के रूप में भी सक्रिय रहे।
1930 के दशक में उन्होंने रेडियो पर गाया और बंगाली संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनानी शुरू की। 1932 में उनका पहला रिकॉर्ड जारी होने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद उन्होंने बंगाली फिल्मों और संगीत कार्यक्रमों में भी काम किया।
फिल्म संगीत में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था। उन्होंने बंगाली फिल्मों में संगीत दिया और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। बाद में वह मुंबई पहुंचे और हिंदी फिल्म उद्योग में काम शुरू किया।
1947 में आई ‘दो भाई’ उनके शुरुआती बड़े हिंदी फिल्म ब्रेकथ्रू में से एक बनी। फिल्म के गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ ने गीता रॉय यानी बाद की गीता दत्त की आवाज़ को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यहीं से एस. डी. बर्मन के हिंदी फिल्म संगीत के बड़े सफर ने रफ्तार पकड़नी शुरू की।
आज जब एस. डी. बर्मन का नाम हिंदी सिनेमा के महान संगीतकारों में लिया जाता है, तो यह भूल जाना आसान है कि उनके करियर में उतार-चढ़ाव भी आए थे।
मुंबई में शुरुआती दौर में उन्हें लगातार सफलता नहीं मिली। कई फिल्मों का संगीत अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाया। एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने हिंदी फिल्मों में संगीत देने की अपनी महत्वाकांक्षा छोड़ने तक के बारे में सोचा था।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—अपनी शैली पर विश्वास।
उन्होंने उस समय के प्रचलित संगीत से अलग अपनी जगह बनाई। उनकी धुनों में अनावश्यक जटिलता नहीं थी। वह धुन को कहानी, किरदार और भावना से जोड़ते थे।
धीरे-धीरे यही तरीका उनकी पहचान बन गया।
1950 के दशक में एस. डी. बर्मन का नाम हिंदी फिल्म संगीत के सबसे महत्वपूर्ण नामों में शामिल हो चुका था।
गुरु दत्त के साथ उनका सहयोग विशेष रूप से याद किया जाता है। ‘प्यासा’ (1957) और ‘कागज के फूल’ (1959) जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसी धुनें रचीं जिनमें प्रेम, अकेलापन, निराशा और जीवन की कड़वी सच्चाइयां सुनाई देती हैं।
‘प्यासा’ के ‘जाने वो कैसे लोग थे’ और ‘कागज के फूल’ के ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ जैसे गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत के क्लासिक्स में गिने जाते हैं।
यहां एस. डी. बर्मन की एक और खासियत सामने आई—वह सिर्फ धुन नहीं बनाते थे, बल्कि गीत की परिस्थिति को समझकर उसके लिए सही आवाज़ चुनते थे।
एस. डी. बर्मन और देव आनंद की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार रचनात्मक साझेदारियों में रही।
‘बाजी’, ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘काला पानी’, ‘काला बाजार’, ‘गाइड’, ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों में दोनों की साझेदारी ने संगीत को कहानी के साथ जोड़ने का शानदार उदाहरण पेश किया।
1954 की ‘टैक्सी ड्राइवर’ के संगीत के लिए एस. डी. बर्मन को पहला Filmfare Best Music Director Award मिला।
उनकी धुनों में देव आनंद के किरदारों की शहरी ऊर्जा भी थी और उनकी रोमांटिक संवेदनशीलता भी।
1965 की ‘गाइड’ एस. डी. बर्मन के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है।
फिल्म के गीतों में अलग-अलग भावनाओं के लिए अलग-अलग संगीत रंग दिखाई देते हैं।
‘आज फिर जीने की तमन्ना है’,
‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं’,
‘दिन ढल जाए’,
‘गाता रहे मेरा दिल’,
‘पिया तोसे नैना लागे रे’,
और ‘वहां कौन है तेरा’—
इन गीतों ने फिल्म के भावनात्मक संसार को और गहरा किया।
‘वहां कौन है तेरा’ में खुद एस. डी. बर्मन की आवाज़ सुनाई दी। उनकी आवाज़ ने गीत को किसी पारंपरिक फिल्मी गाने की बजाय जैसे जीवन की यात्रा पर निकले किसी व्यक्ति की पुकार बना दिया।
बिमल रॉय के साथ एस. डी. बर्मन की जोड़ी भी बेहद महत्वपूर्ण रही।
‘देवदास’, ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों में उनका संगीत कहानी के भावनात्मक वातावरण का अभिन्न हिस्सा बना।
‘सुजाता’ में ‘जलते हैं जिसके लिए’, ‘काली घटा छाए’ और ‘नन्ही कली सोने चली’ जैसे गीतों ने अलग-अलग भावनाओं को आवाज़ दी।
‘बंदिनी’ का ‘अब के बरस भेज भैया को बाबुल’ और एस. डी. बर्मन की अपनी आवाज़ में ‘मेरे साजन हैं उस पार’ भी उनकी संगीत शैली की विशिष्टता को दिखाते हैं।
1969 की ‘अराधना’ एस. डी. बर्मन के करियर में बेहद महत्वपूर्ण फिल्म थी।
इस फिल्म के संगीत से जुड़ा एक खास तथ्य यह है कि उस समय स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण उनके बेटे राहुल देव बर्मन ने भी संगीत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि अंतिम श्रेय एस. डी. बर्मन के नाम पर रहा।
फिल्म के गीतों ने किशोर कुमार की आवाज़ को एक नए दौर में पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
‘मेरे सपनों की रानी’, ‘रूप तेरा मस्ताना’ और ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’ जैसे गीतों ने फिल्म को संगीत के स्तर पर भी बड़ी सफलता दिलाई।
इसी फिल्म के ‘सफल होगी तेरी आराधना’ गीत को एस. डी. बर्मन ने खुद गाया और इसके लिए उन्हें 1970 में National Film Award for Best Male Playback Singer मिला।
एस. डी. बर्मन की महानता का एक हिस्सा उनकी धुनों में था, लेकिन दूसरा हिस्सा था—आवाज़ की सही पहचान।
उन्होंने अलग-अलग गायकों की आवाज़ की खासियत को समझकर उनका इस्तेमाल किया।
गीता दत्त के साथ उनका काम ‘दो भाई’, ‘बाजी’, ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ जैसी फिल्मों में खास तौर पर याद किया जाता है।
लता मंगेशकर के साथ उन्होंने ‘गाइड’, ‘बंदिनी’, ‘अराधना’ सहित कई फिल्मों में काम किया।
मोहम्मद रफी की आवाज़ में उनकी रचनाओं ने गंभीरता और भावनात्मक गहराई हासिल की।
किशोर कुमार के साथ उनका रिश्ता भी बेहद खास था। एस. डी. बर्मन ने किशोर की आवाज़ की सहजता और शरारत को कई यादगार गीतों में इस्तेमाल किया। दोनों के बीच पेशेवर रिश्ते के साथ आत्मीयता भी थी। कई प्रकाशित संस्मरणों में किशोर कुमार द्वारा उन्हें बेहद सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
एस. डी. बर्मन का करियर कई पीढ़ियों के कलाकारों को जोड़ता है।
उन्होंने देव आनंद के साथ ‘बाजी’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘काला पानी’, ‘काला बाजार’, ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों में काम किया।
गुरु दत्त के साथ ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ जैसी यादगार फिल्में दीं।
बिमल रॉय के साथ ‘देवदास’, ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ जैसे प्रोजेक्ट किए।
गायकों में किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त, हेमंत कुमार, तलत महमूद और मन्ना डे जैसी आवाज़ों के साथ उनकी यादगार साझेदारियां रहीं।
यही वजह है कि एस. डी. बर्मन का संगीत किसी एक अभिनेता या एक दौर तक सीमित नहीं रहा।
एस. डी. बर्मन की निजी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता मीरा देव बर्मन के साथ था।
दोनों की मुलाकात संगीत के माध्यम से हुई। मीरा उनकी शिष्या भी रही थीं। दोनों ने 1938 में शादी की। उनके एकमात्र बेटे राहुल देव बर्मन हुए, जिन्हें आगे चलकर दुनिया ने महान संगीतकार आर. डी. बर्मन के रूप में जाना।
मीरा देव बर्मन खुद भी संगीत और लेखन से जुड़ी थीं। उन्होंने बंगाली फिल्मों के लिए गीत लिखे और एस. डी. बर्मन के काम में भी सहयोग किया।
इस तरह बर्मन परिवार में संगीत सिर्फ पेशा नहीं था, बल्कि जीवन का हिस्सा था।
एस. डी. बर्मन की विरासत उनके बेटे आर. डी. बर्मन तक पहुंची।
आर. डी. बर्मन ने बाद में हिंदी फिल्म संगीत को एक बिल्कुल अलग आधुनिक ध्वनि दी। लेकिन उनके भीतर संगीत की शुरुआती समझ और संस्कार पिता से आए।
यह दिलचस्प है कि पिता और बेटे की संगीत शैली अलग होने के बावजूद दोनों ने अपनी-अपनी पीढ़ी पर गहरा प्रभाव डाला।
एस. डी. बर्मन की धुनों में लोक और शास्त्रीयता की सहजता थी, जबकि आर. डी. बर्मन ने आगे चलकर पश्चिमी वाद्ययंत्रों और नई रिकॉर्डिंग तकनीकों सहित कई प्रयोग किए।
फिर भी दोनों के बीच एक समानता थी—धुन को यादगार बनाना।
एस. डी. बर्मन का जीवन विवादों से ज्यादा संगीत और संघर्ष के लिए जाना जाता है। फिर भी उनके करियर में कुछ पेशेवर मतभेद और कठिन दौर जरूर आए।
उनके और लता मंगेशकर के बीच 1950 के दशक में पेशेवर मतभेद की चर्चा कई जीवनी-स्रोतों में मिलती है। हालांकि ऐसे पुराने घटनाक्रमों के बारे में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, इसलिए उन्हें निश्चित व्यक्तिगत विवाद के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इसी तरह उनके बेटे आर. डी. बर्मन के संगीत करियर में आने के बाद दोनों की पीढ़ियों के बीच रचनात्मक अंतर भी दिखाई दिया।
एक चर्चित घटना 1971 की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ और उसके गीत ‘दम मारो दम’ से जुड़ी है। Indian Express ने पुस्तक-संदर्भों के आधार पर लिखा है कि एस. डी. बर्मन फिल्म के विषय से सहज नहीं थे और गीत सुनने पर उनकी प्रतिक्रिया नकारात्मक थी। इसे पिता-पुत्र के बीच किसी स्थायी रिश्ते के संकट के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा; यह एक विशेष रचनात्मक मतभेद के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
एस. डी. बर्मन को उनके लंबे संगीत सफर में कई महत्वपूर्ण सम्मान मिले।
उन्हें 1958 में Sangeet Natak Akademi Award मिला। भारत सरकार ने 1969 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया।
Filmfare Awards में उन्हें ‘Taxi Driver’ (1954) के लिए Best Music Director और बाद में ‘Abhimaan’ (1973) के लिए भी Best Music Director का पुरस्कार मिला।
1970 में ‘अराधना’ के ‘सफल होगी तेरी आराधना’ के लिए उन्हें National Film Award for Best Male Playback Singer मिला।
1974 में ‘Zindagi Zindagi’ के लिए National Film Award for Best Music Direction भी उनके नाम रहा।
ये सम्मान बताते हैं कि उनकी प्रतिभा सिर्फ लोकप्रिय गीतों तक सीमित नहीं थी; उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर संगीत योगदान के लिए मान्यता मिली।
यह सवाल आज के दौर में लगभग हर सेलिब्रिटी की जीवनी के साथ पूछा जाता है, लेकिन एस. डी. बर्मन के मामले में एक जिम्मेदार तथ्य यह है कि उनकी मृत्यु के समय उनकी प्रमाणित नेट वर्थ का कोई विश्वसनीय सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
इंटरनेट पर अलग-अलग वेबसाइटें उनकी संपत्ति को लेकर अनुमानित रकम देती हैं, लेकिन उन आंकड़ों के पीछे विश्वसनीय प्राथमिक दस्तावेज या प्रमाणित वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।
इसलिए किसी अनुमानित करोड़ों की रकम को एस. डी. बर्मन की वास्तविक नेट वर्थ बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
उनकी असली संपत्ति उनकी रचनाओं की विरासत थी—ऐसी धुनें जिनकी कीमत किसी एक बैंक बैलेंस से नहीं मापी जा सकती।
एस. डी. बर्मन की छवि उन फिल्मी हस्तियों जैसी नहीं थी जिनकी पहचान आलीशान जीवनशैली से बनी हो।
उनका जीवन संगीत-केंद्रित था। लोक संगीत, शास्त्रीय प्रशिक्षण और साधारण धुनों की शक्ति में उनका विश्वास उनकी कला में दिखाई देता था।
उनके लिए संगीत की सफलता का पैमाना सिर्फ बड़े लोगों की तारीफ नहीं, बल्कि आम श्रोता का किसी धुन को गुनगुनाना भी था। उनके बारे में प्रकाशित सामग्री में यह विचार सामने आता है कि वह ऐसी धुनें बनाना चाहते थे जिन्हें आम लोग आसानी से अपना सकें।
एस. डी. बर्मन का जन्म त्रिपुरा के राजपरिवार से जुड़े परिवार में हुआ था, लेकिन इतिहास ने उन्हें राजा या राजकुमार के रूप में याद नहीं रखा।
उन्हें याद किया गया एक संगीतकार के रूप में।
संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध होने के बावजूद एस. डी. बर्मन की अपनी आवाज़ भी कई फिल्मों में सुनाई दी।
‘बंदिनी’ का ‘ओ मेरे साजन हैं उस पार’, ‘गाइड’ का ‘वहां कौन है तेरा’ और ‘सुजाता’ का ‘सुन मेरे बंधु रे’ उनकी आवाज़ की खास पहचान हैं।
उनकी आवाज़ पारंपरिक प्लेबैक सिंगर जैसी चिकनी या अत्यंत मधुर नहीं थी। उसमें एक खुरदुरापन था।
लेकिन शायद यही उनकी ताकत थी।
उनकी आवाज़ में ऐसा लगता था जैसे कोई अनुभवी इंसान जीवन की कोई सच्ची बात बता रहा हो।
एस. डी. बर्मन ने गीता दत्त से लेकर लता मंगेशकर और किशोर कुमार से लेकर आर. डी. बर्मन की नई पीढ़ी तक के संक्रमण को देखा।
उनका करियर भारतीय फिल्म संगीत के बदलते इतिहास का एक तरह से जीवंत दस्तावेज है।
स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद उन्होंने 1970 के दशक में भी यादगार संगीत दिया।
‘शर्मिली’, ‘अभिमान’, ‘प्रेम नगर’, ‘सगीना’, ‘चुपके चुपके’ और ‘मिली’ जैसी फिल्मों में उनका काम उनके अंतिम वर्षों तक जारी रहा।
एस. डी. बर्मन का निधन 31 अक्टूबर 1975 को मुंबई में हुआ। वह 69 वर्ष के थे। उपलब्ध जीवनी-स्रोतों में उनके अंतिम समय में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का उल्लेख मिलता है।
उनके निधन के साथ हिंदी फिल्म संगीत ने एक ऐसा संगीतकार खो दिया जिसने करीब चार दशकों में अपनी अलग दुनिया बनाई थी।
लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
क्योंकि उनकी बनाई धुनें उनके बाद भी जीवित रहीं।
एस. डी. बर्मन आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संगीत आज भी भारतीय सिनेमा की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।
2022 में उनके कुमिल्ला स्थित पुराने घर को सांस्कृतिक परिसर में बदलने की योजना की खबर सामने आई थी। यह वही घर था जहां उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती वर्ष बिताए थे।
उनकी विरासत भारत और बांग्लादेश दोनों के सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ती है।
आज भी जब ‘वहां कौन है तेरा’, ‘दिन ढल जाए’, ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’, ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ या ‘मेरे सपनों की रानी’ जैसे गीत बजते हैं, तो एक पूरी पीढ़ी के साथ-साथ नई पीढ़ी भी उन धुनों से जुड़ जाती है।
यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी जीत होती है।
एस. डी. बर्मन की जिंदगी को अगर एक वाक्य में समझना हो, तो शायद यह कहा जा सकता है कि उन्होंने राजसी विरासत को पीछे छोड़कर संगीत की ऐसी विरासत बनाई, जिसे कोई राजमहल अपने भीतर कैद नहीं कर सकता।
उन्होंने लोक संगीत से सीखा, शास्त्रीय संगीत से अनुशासन लिया और सिनेमा से अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम पाया।
उनके संगीत में चमक से ज्यादा आत्मा थी।
शायद यही कारण है कि उनके गीत केवल पुराने गाने बनकर नहीं रह गए।
वे यादें बन गए।
किसी के लिए ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ बीते प्यार की कहानी है। किसी के लिए ‘वहां कौन है तेरा’ जिंदगी की यात्रा का सवाल। किसी के लिए ‘गाता रहे मेरा दिल’ उम्मीद की आवाज़ है।
और यही एस. डी. बर्मन की सबसे बड़ी पहचान है।
उन्होंने गाने नहीं बनाए, उन्होंने ऐसी धुनें बनाईं जिनमें इंसान अपने जीवन की कोई न कोई कहानी सुन सकता है।
31 अक्टूबर 1975 को उनका शरीर इस दुनिया से चला गया, लेकिन उनकी आवाज़ और उनकी धुनें आज भी चलती हुई जिंदगी के बीच कहीं न कहीं सुनाई देती हैं।
शायद महान संगीत की यही परिभाषा है—
संगीतकार चला जाता है, लेकिन उसकी धुन समय से भी लंबी उम्र जीती है।
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