नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक
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| “महमूद: हंसी के पीछे की कहानी” |
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिनके चेहरे पर मुस्कान देखते ही दर्शकों के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। महमूद उन्हीं कलाकारों में से एक थे। उन्होंने सिर्फ फिल्मों में कॉमेडी नहीं की, बल्कि कॉमेडी को हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। जिस दौर में फिल्मों में नायक और नायिका की प्रेम कहानी के बीच हास्य कलाकार को अक्सर एक सहायक किरदार समझा जाता था, उसी दौर में महमूद ने अपनी मौजूदगी को इतना मजबूत बना दिया कि कई फिल्मों में उनकी एंट्री का दर्शक बेसब्री से इंतजार करते थे।
29 सितंबर 1932 को बॉम्बे में जन्मे महमूद अली ने बाल कलाकार के रूप में फिल्मों की दुनिया में कदम रखा था। आगे चलकर उन्होंने अभिनेता, हास्य कलाकार, निर्देशक, निर्माता, लेखक और गायक के रूप में भी काम किया। चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया।
लेकिन महमूद की कहानी सिर्फ सफलता की नहीं है। इस कहानी में छोटे-मोटे काम करने का दौर है, आर्थिक संघर्ष है, निजी जिंदगी की उथल-पुथल है, परिवार की जिम्मेदारियां हैं और फिर वह मुकाम भी है जहां कभी छोटे-छोटे रोल करने वाला कलाकार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे लोकप्रिय कॉमेडी सितारों में गिना जाने लगा।
और शायद महमूद की सबसे बड़ी खासियत यही थी—वह जिस किरदार में आते थे, उसे सिर्फ निभाते नहीं थे, बल्कि अपनी आवाज, चेहरे के भाव, चाल-ढाल और संवाद अदायगी से यादगार बना देते थे।
महमूद का जन्म 29 सितंबर 1932 को बॉम्बे, ब्रिटिश इंडिया में हुआ था। उनके पिता मुमताज अली हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता और डांसर थे। उनकी बहन मीनू मुमताज भी फिल्मों में अभिनेत्री और डांसर के रूप में पहचानी गईं। इस तरह महमूद का बचपन फिल्मी माहौल से बिल्कुल अनजान नहीं था।
लेकिन फिल्मी परिवार से आने का मतलब यह नहीं था कि महमूद को सफलता आसानी से मिल गई। उनके शुरुआती जीवन में संघर्ष की कमी नहीं थी। अभिनय में स्थायी जगह बनाने से पहले उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए। कुछ समय तक वह ड्राइवर रहे और टेबल टेनिस सिखाने का काम भी किया। एक दौर में वह अभिनेत्री मीना कुमारी को टेबल टेनिस सिखाते थे।
यही मीना कुमारी आगे चलकर उनकी निजी जिंदगी से भी जुड़ीं, क्योंकि महमूद ने उनकी छोटी बहन मधु से शादी की थी। इस रिश्ते ने महमूद को फिल्म इंडस्ट्री के एक और चर्चित परिवार से जोड़ दिया।
लेकिन महमूद की असली पहचान उन्हें किसी रिश्ते या परिवार की वजह से नहीं मिली। उन्हें अपना नाम खुद बनाना पड़ा।
महमूद ने बहुत कम उम्र में फिल्मों की दुनिया देख ली थी। IMDb के अनुसार, उन्होंने 1943 की फिल्म किस्मत में बाल कलाकार के रूप में काम किया था। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में छोटे रोल किए और धीरे-धीरे कैमरे के सामने अपने लिए जगह बनानी शुरू की।
शुरुआती दौर में महमूद को कभी एक्स्ट्रा तो कभी छोटे किरदार मिलते थे। उन्होंने दो बीघा जमीन, सीआईडी और प्यासा जैसी फिल्मों में भी छोटे हिस्सों में काम किया। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें बस इतना ही इंतजार रहता था कि कैमरे के सामने कुछ पल मिल जाएं और वह अपनी प्रतिभा दिखा सकें।
उनके संघर्ष का एक दिलचस्प पहलू यह था कि वह फिल्म इंडस्ट्री को बाहर से देखने वाले व्यक्ति नहीं थे। वह उसके भीतर थे, लेकिन उस दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा।
यही संघर्ष बाद में उनकी कॉमेडी की ताकत बना। महमूद को आम आदमी की जिंदगी, उसकी परेशानियों, उसकी भाषा और उसके व्यवहार की गहरी समझ थी। इसलिए उनके किरदार भले ही हास्यपूर्ण होते थे, लेकिन उनमें एक पहचानने योग्य इंसानी रंग जरूर दिखाई देता था।
महमूद के करियर में 1958 की फिल्म परवरिश को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसमें उन्होंने राज कपूर के भाई का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्हें फिल्मों में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिकाएं मिलने लगीं।
इसके बाद 1959 की छोटी बहन ने उनकी पहचान को और मजबूत किया। इस फिल्म में उनके किरदार को दर्शकों ने पसंद किया और महमूद की कॉमेडी को एक अलग पहचान मिलने लगी।
फिर आया वह दौर जब महमूद की मांग तेजी से बढ़ने लगी। निर्देशक उनकी फिल्मों में उनके लिए अलग कॉमेडी ट्रैक लिखने लगे। हिंदी सिनेमा में यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था।
महमूद अब सिर्फ किसी फिल्म के बीच में आने वाला हास्य कलाकार नहीं थे। उनका किरदार फिल्म की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगा था।
1960 और 1970 के दशक में महमूद ने हिंदी सिनेमा में अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसे आज भी याद किया जाता है। उस समय फिल्मों में गंभीर पारिवारिक ड्रामा, रोमांस और एक्शन का बोलबाला था। ऐसे माहौल में महमूद की कॉमेडी दर्शकों को राहत देती थी।
लेकिन महमूद की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि कई बार दर्शक मुख्य कहानी से ज्यादा उनके आने का इंतजार करने लगे।
गुमनाम, प्यार किए जा, साधु और शैतान, बॉम्बे टू गोवा, दो फूल, कुंवारा बाप और पड़ोसन जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया।
उनकी खासियत यह थी कि वह एक ही तरह की कॉमेडी तक सीमित नहीं रहे। कभी वह भोले-भाले आदमी बने, कभी चालाक किरदार, कभी दक्षिण भारतीय लहजे वाले पात्र, तो कभी ऐसा चरित्र जो अपनी हरकतों से पूरी फिल्म का माहौल बदल देता था।
उनकी आवाज और संवाद बोलने का अंदाज भी उनकी पहचान बन गया था।
अगर महमूद के सबसे यादगार किरदारों की बात हो तो पड़ोसन का मास्टर पिल्लई जरूर याद किया जाएगा।
1968 में आई इस फिल्म में सुनील दत्त, सायरा बानो, किशोर कुमार और महमूद जैसे कलाकार थे। महमूद ने संगीत शिक्षक मास्टर पिल्लई की भूमिका निभाई। फिल्म की कहानी में संगीत, प्रेम और हास्य का अनोखा मेल था।
फिल्म का संगीत मुकाबला और खासकर 'एक चतुर नार' आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार हास्य दृश्यों में गिना जाता है। किशोर कुमार और महमूद की केमिस्ट्री ने इस दृश्य को अमर बना दिया।
महमूद की कॉमेडी सिर्फ संवादों पर निर्भर नहीं थी। उनके चेहरे के भाव, हाथ-पैर चलाने का अंदाज और हर शब्द को बोलने का तरीका दृश्य को अलग ऊर्जा देता था।
यही कारण था कि उनके किरदार कई दशक बाद भी लोगों को याद रहे।
महमूद ने कई फिल्मों में दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि या लहजे वाले किरदार निभाए। उस दौर में इन किरदारों को लेकर आज के समय से अलग सामाजिक और सिनेमाई संदर्भ था। उनकी प्रस्तुतियों में हास्य पैदा करने के लिए भाषा और उच्चारण का इस्तेमाल किया जाता था।
गुमनाम का 'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं' और दो फूल के लोकप्रिय हास्य प्रसंग इसके उदाहरण हैं। महमूद की आवाज और उच्चारण दर्शकों के बीच उनकी पहचान का हिस्सा बन गए।
हालांकि आज ऐसे पुराने दृश्यों को देखते समय उस दौर के सिनेमा और उसके हास्य के संदर्भ को ध्यान में रखना जरूरी है। महमूद की विरासत को समझने का सही तरीका यह है कि उनकी कला, टाइमिंग और उस दौर में हास्य कलाकार की बदलती स्थिति को देखा जाए।
महमूद ने अपने लंबे करियर में हिंदी सिनेमा के कई बड़े सितारों और कलाकारों के साथ काम किया।
उन्होंने राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद, अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, शशि कपूर, किशोर कुमार, आशा पारेख, सायरा बानो, मीना कुमारी, नूतन, तनुजा और अनेक दूसरे कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा की।
पड़ोसन में सुनील दत्त, सायरा बानो और किशोर कुमार के साथ उनकी कॉमिक टाइमिंग खास तौर पर याद की जाती है। बॉम्बे टू गोवा में भी वह फिल्म की हास्यात्मक ऊर्जा का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।
महमूद ने आगे चलकर अमिताभ बच्चन के शुरुआती दौर को भी करीब से देखा। उनके भाई अनवर अली ने फिल्मफेयर से जुड़े एक पुराने इंटरव्यू में महमूद की लोकप्रियता और इंडस्ट्री में उनके प्रभाव के बारे में कई किस्से साझा किए थे।
महमूद ने सिर्फ दूसरों की फिल्मों में अभिनय करके संतोष नहीं किया। उन्हें फिल्म बनाने और नए प्रयोग करने का भी शौक था।
1965 में उन्होंने भूत बंगला का निर्देशन किया। यह उस समय के लिए एक दिलचस्प प्रयोग था, क्योंकि फिल्म में हॉरर और कॉमेडी को एक साथ रखा गया था। इसमें महमूद के साथ तनुजा और नजीर हुसैन जैसे कलाकार थे। आर. डी. बर्मन ने भी फिल्म में कैमियो किया था और संगीत से जुड़े काम में योगदान दिया।
आज हॉरर-कॉमेडी हिंदी सिनेमा में एक लोकप्रिय शैली है, लेकिन महमूद ने 1960 के दशक में ही इस तरह के मिश्रण के साथ प्रयोग किया था।
यही महमूद की खासियत थी—वह केवल सफल फॉर्मूले को दोहराने वाले कलाकार नहीं थे। मौका मिलने पर वह नए क्षेत्र में जाने की कोशिश भी करते थे।
1972 की बॉम्बे टू गोवा महमूद की लोकप्रिय फिल्मों में शामिल है। इस फिल्म में उन्होंने कॉमेडी के साथ-साथ अपने खास शारीरिक अभिनय का भरपूर इस्तेमाल किया।
फिल्म में अमिताभ बच्चन सहित कई कलाकार थे और महमूद की मौजूदगी ने यात्रा-कहानी को हास्य का अलग रंग दिया।
उनका अभिनय उस समय के दूसरे कॉमेडी कलाकारों से इसलिए अलग दिखाई देता था क्योंकि वह संवाद बोलने से पहले ही अपने हावभाव से दृश्य को मजेदार बना देते थे।
महमूद की फिल्म कुंवारा बाप उनके करियर की उन फिल्मों में है जिसमें कॉमेडी के साथ भावनात्मक पक्ष भी मौजूद था।
वह सिर्फ दर्शकों को हंसाना नहीं जानते थे, बल्कि भावनात्मक दृश्य को भी पकड़ सकते थे। यही वजह है कि उनकी कई फिल्मों को सिर्फ कॉमेडी फिल्म कहकर खत्म नहीं किया जा सकता।
महमूद के अभिनय में एक मासूमियत थी। उनके किरदार अक्सर परेशानियों से घिरे होते थे, लेकिन वे मुश्किल हालात में भी हास्य खोज लेते थे।
शायद यही वजह थी कि दर्शकों को उनके किरदारों से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस होता था।
महमूद को उनके अभिनय के लिए कई बार फिल्मफेयर में नामांकन मिला और उन्होंने कई पुरस्कार भी जीते।
फिल्मफेयर के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने प्यार किए जा के लिए 1967 में Best Comedian, वॉरिस के लिए 1970 में Best Comedian और वरदान के लिए 1975 में Best Actor in a Comic Role का पुरस्कार जीता। इसके अलावा उन्हें दिल तेरा दीवाना के लिए Best Supporting Actor का फिल्मफेयर सम्मान भी मिला।
यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उस समय कॉमेडी को अभिनय की मुख्य श्रेणी के बराबर सम्मान मिलना आज की तरह सामान्य नहीं था।
महमूद ने इस स्थिति को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
महमूद की निजी जिंदगी भी उतनी ही चर्चित रही जितना उनका फिल्मी करियर।
उन्होंने अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन मधु कुमारी से शादी की थी। दोनों के बच्चे भी हुए। बाद में दोनों अलग हो गए। उपलब्ध स्रोतों में उनकी दूसरी पत्नी के रूप में ट्रेसी अली का उल्लेख मिलता है, जिनसे उनके तीन बच्चे बताए जाते हैं।
महमूद के बच्चों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध नाम लकी अली का है। लकी अली ने अपने पिता की तरह मुख्यधारा की कॉमेडी को नहीं चुना। उन्होंने संगीत और अपनी अलग गायकी के जरिए पहचान बनाई।
लकी अली ने कई मौकों पर अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को लेकर खुलकर बात की है। उन्होंने बताया कि महमूद घर पर भी बेहद अनुशासनप्रिय पिता थे। एक बातचीत में लकी ने याद किया कि उनके पिता उन्हें रोजाना पांच रुपये देते थे और खर्च का हिसाब मांगते थे। उन्होंने यह भी बताया कि घर में शाम छह बजे के बाद बाहर रहने की अनुमति नहीं थी।
यह बात दिलचस्प है कि जिस कलाकार को दुनिया पर्दे पर बेहद मजाकिया और बेफिक्र समझती थी, वह अपने बच्चों के मामले में काफी सख्त पिता भी थे।
महमूद और लकी अली के रिश्ते में हमेशा आसानी नहीं रही। लकी ने अपने जीवन के अलग-अलग दौर में पिता के साथ मतभेदों के बारे में बात की है।
लकी अली ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में अभिनय से ज्यादा संगीत की ओर झुकाव दिखाया। महमूद चाहते थे कि उनका बेटा अभिनय करे, लेकिन लकी ने आखिरकार संगीत की दुनिया में अपनी अलग राह बनाई।
लकी अली ने बाद में अपने पिता को लेकर कहा कि उन्हें अक्सर सलाह और हौसले की जरूरत महसूस होती थी और ऐसे समय में वह अपने पिता को याद करते थे।
महमूद ने अपने बेटे की मुश्किलों और संघर्षों को लेकर दुश्मन दुनिया का जैसी फिल्म से भी अपने तरीके से प्रतिक्रिया दी थी। इस फिल्म का संबंध लकी अली के जीवन के एक कठिन दौर से जोड़ा गया है। हालांकि इस निजी प्रसंग से जुड़े कई दावे अलग-अलग स्रोतों में अलग तरीके से सामने आए हैं, इसलिए इसे सनसनीखेज कहानी की तरह देखना उचित नहीं होगा।
महमूद की जिंदगी में विवाद भी रहे। उनके रिश्तों और निजी जीवन को लेकर उन्होंने स्वयं भी पुराने इंटरव्यू और संस्मरणों में बातें की थीं।
India Today की 1994 की प्रोफाइल में उनके पहले विवाह के टूटने और बाद में ट्रेसी से शादी का उल्लेख मिलता है। उसी लेख में महमूद के निजी रिश्तों को लेकर उनके अपने पुराने बयानों का भी जिक्र किया गया था।
ऐसे प्रसंगों को उनकी पूरी शख्सियत का प्रतिनिधि मानना सही नहीं होगा। एक कलाकार का निजी जीवन और उसका रचनात्मक योगदान दो अलग पहलू हैं। महमूद के मामले में भी उनके सिनेमाई काम को समझते समय उस दौर की सामाजिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
महमूद ने अपने करियर के चरम पर इतनी लोकप्रियता हासिल कर ली थी कि उनकी फीस कई मुख्य कलाकारों से ज्यादा होने की बात सामने आई है।
Indian Express की एक रिपोर्ट में उनके भाई अनवर अली के पुराने इंटरव्यू का हवाला देते हुए बताया गया कि सफलता के दौर में महमूद को बहुत बड़ी फीस मिलती थी। एक उदाहरण में उन्हें 14 दिनों के काम के लिए लगभग 7.5 लाख रुपये मिलने की बात कही गई थी।
उनकी आर्थिक सफलता का एक और संकेत यह था कि उन्होंने अपने परिवार की मदद की और अपने भाई-बहनों के लिए घर खरीदने तथा उनकी जिम्मेदारियां संभालने की कोशिश की।
हालांकि आज इंटरनेट पर महमूद की कथित नेट वर्थ को लेकर कई आंकड़े मिलते हैं, लेकिन उनके समय की संपत्ति, आय, निवेश और खर्च का कोई विश्वसनीय audited financial record सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी निश्चित करोड़ों की रकम को उनकी वास्तविक नेट वर्थ बताना सही नहीं होगा।
इतना जरूर कहा जा सकता है कि अपने करियर के शिखर पर महमूद आर्थिक रूप से बेहद सफल कलाकार थे।
महमूद की जिंदगी से जुड़े कई किस्से आज भी सुनने को मिलते हैं। उनके बेटे लकी अली ने एक बातचीत में बताया था कि उनके पिता के पास 27 कारें थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें खुद किसी कार को चलाने की आजादी नहीं थी।
यह किस्सा महमूद की दो अलग छवियों को सामने लाता है। एक तरफ वह बेहद सफल स्टार थे, दूसरी तरफ अपने बच्चों को लेकर अनुशासन के मामले में काफी सख्त थे।
उनके लिए सफलता का मतलब सिर्फ पैसा और शोहरत नहीं था। वह अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, भले ही उनकी शैली सख्त क्यों न रही हो।
महमूद की लोकप्रियता का असर सिर्फ उनकी फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कई कलाकारों को प्रेरित किया।
इसी संदर्भ में जूनियर महमूद का किस्सा बेहद दिलचस्प है। उनका असली नाम नईम सैयद था। उन्होंने एक कार्यक्रम में महमूद की शैली में प्रस्तुति दी थी। इसके बाद महमूद ने उन्हें 'जूनियर महमूद' नाम दिया और यही नाम उनकी पहचान बन गया।
जूनियर महमूद ने बाद में सैकड़ों फिल्मों में काम किया और बाल कलाकार के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई।
यह घटना बताती है कि महमूद सिर्फ खुद स्टार बनने वाले कलाकार नहीं थे, बल्कि उनके व्यक्तित्व ने आने वाली पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रभावित किया।
महमूद को नए कलाकारों और प्रतिभाओं को मौका देने के लिए भी याद किया जाता है।
भूत बंगला में आर. डी. बर्मन के साथ उनका जुड़ाव खास तौर पर उल्लेखनीय था। बर्मन ने उस फिल्म में कैमियो किया और बाद में संगीत के क्षेत्र में भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली नामों में शामिल हुए।
इसी तरह महमूद का फिल्म निर्माण और निर्देशन की तरफ जाना भी उनके प्रयोगधर्मी स्वभाव को दिखाता है।
1970 के दशक में महमूद का स्टारडम अपने चरम पर था। लेकिन 1980 के दशक में उनकी फिल्मी उपस्थिति धीरे-धीरे कम होने लगी। इस दौरान जगदीप, असरानी, पेंटल, देवेन वर्मा और बाद में कादर खान जैसे कई कॉमेडी कलाकार भी अपनी अलग पहचान बनाने लगे।
फिर भी महमूद पूरी तरह गायब नहीं हुए। 1990 के दशक में उन्होंने चुनिंदा फिल्मों में काम किया।
1994 की अंदाज अपना अपना में उनका किरदार जॉनी भी दर्शकों को याद रहा। IMDb पर इसे उनके उल्लेखनीय बाद के कामों में शामिल किया गया है।
यह दिलचस्प है कि फिल्म रिलीज के समय उनका दौर पहले जैसा नहीं था, लेकिन उनके अभिनय में वह पुरानी कॉमिक ऊर्जा अब भी दिखाई देती थी।
23 जुलाई 2004 को महमूद का निधन अमेरिका के पेंसिल्वेनिया में हुआ। वह 71 वर्ष के थे। समकालीन रिपोर्टों में उनके निधन को हिंदी सिनेमा के लिए बड़ी क्षति बताया गया था।
उनके निधन की खबर सुनकर फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई। अभिनेत्री आशा पारेख ने उन्हें शानदार कॉमिक टाइमिंग वाला कलाकार और संवेदनशील इंसान बताया था।
एक ऐसा कलाकार जिसने पूरी जिंदगी दूसरों को हंसाया, उसके जाने के बाद हिंदी सिनेमा के पास उसकी यादों के अलावा बहुत कुछ नहीं था—लेकिन उसकी फिल्मों में कैद हंसी आज भी जिंदा है।
महमूद से पहले भी हिंदी फिल्मों में कॉमेडियन थे और उनके बाद भी कई बड़े कॉमेडियन आए। लेकिन महमूद का योगदान यह था कि उन्होंने कॉमेडियन को सिर्फ 'कॉमेडी ट्रैक' तक सीमित नहीं रहने दिया।
उन्होंने साबित किया कि एक हास्य कलाकार भी फिल्म का आकर्षण बन सकता है।
उनकी मौजूदगी फिल्म की मार्केटिंग का हिस्सा बन सकती है।
उनका गाना फिल्म की पहचान बन सकता है।
उनका किरदार मुख्य कलाकारों के बराबर चर्चा पा सकता है।
और सबसे बड़ी बात—दर्शक किसी कॉमेडियन को भी उसी उत्साह से देखने थिएटर जा सकते हैं, जिस उत्साह से वे हीरो या हीरोइन को देखने जाते हैं।
आज हिंदी सिनेमा में जॉनी लीवर, परेश रावल, राजपाल यादव, संजय मिश्रा, बोमन ईरानी और कई दूसरे कलाकारों की कॉमेडी और चरित्र अभिनय को जिस सम्मान से देखा जाता है, उस यात्रा के पुराने महत्वपूर्ण पड़ावों में महमूद का नाम जरूर आता है।
महमूद के जीवन से जुड़ी कई बातें उनकी बहुआयामी प्रतिभा को सामने लाती हैं।
वह बाल कलाकार के रूप में फिल्मी दुनिया में आए थे और बाद में चार दशक से ज्यादा समय तक काम करते रहे।
उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया, बल्कि निर्देशन और निर्माण में भी हाथ आजमाया। भूत बंगला इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उनकी फिल्मी लोकप्रियता इतनी थी कि कुछ निर्माता और वितरक उनके नाम को फिल्म की बिक्री की ताकत मानते थे। उनके भाई अनवर अली ने पुराने इंटरव्यू में दावा किया था कि फिल्मों के क्रेडिट में 'And Mehmood' लिखा होना भी वितरकों के लिए आकर्षण पैदा करता था। यह उनके स्टारडम के बारे में परिवार की ओर से दिया गया बयान है, जिसे उसी संदर्भ में देखना चाहिए।
महमूद ने अपने करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया—यह आंकड़ा उनके काम के विशाल दायरे को समझने के लिए पर्याप्त है।
उनके बेटे लकी अली ने बाद में संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई और पिता की प्रसिद्धि से अलग अपनी कलात्मक राह चुनी।
महमूद आज हमारे बीच नहीं हैं। 23 जुलाई 2004 को उनका निधन हो चुका है। लेकिन कलाकारों के लिए शायद 'कहां हैं' का जवाब हमेशा सिर्फ उनकी जिंदगी तक सीमित नहीं होता।
महमूद आज भी उन फिल्मों में हैं जिन्हें लोग बार-बार देखते हैं।
वह पड़ोसन के मास्टर पिल्लई में हैं।
वह बॉम्बे टू गोवा के हास्य में हैं।
वह गुमनाम और दो फूल के लोकप्रिय दृश्यों में हैं।
वह कुंवारा बाप की संवेदनशीलता में हैं।
और वह उन कलाकारों की कॉमिक टाइमिंग में भी कहीं न कहीं मौजूद हैं जिन्होंने उनसे प्रेरणा ली।
समय बदल गया। कॉमेडी बदल गई। फिल्मों का तरीका बदल गया। दर्शकों की पसंद बदल गई। लेकिन अच्छी कॉमिक टाइमिंग की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।
महमूद की कहानी हमें यह बताती है कि किसी कलाकार का महत्व सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि वह फिल्म में हीरो था या साइड कैरेक्टर।
कभी-कभी कहानी का सबसे छोटा किरदार दर्शकों की यादों में सबसे बड़ा बन जाता है।
महमूद ने छोटे-छोटे रोल से शुरुआत की। संघर्ष देखा। अपनी प्रतिभा को लगातार तराशा। फिर एक ऐसा मुकाम हासिल किया जहां वह खुद एक ब्रांड बन गए। उन्होंने कॉमेडी को सिर्फ हंसी का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे स्टारडम और पहचान की ताकत में बदल दिया।
उनकी जिंदगी में सफलताएं थीं तो निजी परेशानियां भी थीं। रिश्तों में उतार-चढ़ाव थे तो परिवार के लिए जिम्मेदारियां भी थीं। उन्होंने गलतियां भी कीं और नए प्रयोग भी किए। लेकिन इन सबके बीच उनका कलाकार कभी छोटा नहीं पड़ा।
महमूद की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने दर्शकों को हंसाने के काम को छोटा काम नहीं समझा।
उन्होंने साबित किया कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना भी एक बड़ी कला है।
और जब तक पड़ोसन का 'एक चतुर नार', गुमनाम का 'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं' या उनकी किसी फिल्म का कोई पुराना दृश्य देखकर दर्शक मुस्कुराता रहेगा, तब तक महमूद सिर्फ हिंदी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा नहीं रहेंगे—वह उसकी यादों में जिंदा रहेंगे।
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