ईशा कोप्पिकर की पूरी कहानी: ‘खल्लास गर्ल’ का संघर्ष, करियर, शादी, तलाक और नई शुरुआत
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| इंजीनियरिंग छोड़ी, बने नेशनल अवॉर्ड विनर! |
कभी-कभी जिंदगी हमें उस रास्ते पर ले जाती है, जिसकी हमने कल्पना तक नहीं की होती। इंजीनियर बनने की पढ़ाई कर रहा एक युवक अचानक अभिनय की दुनिया की तरफ मुड़ता है। फिर थिएटर में खुद को तराशता है, National School of Drama से प्रशिक्षण लेता है और आगे चलकर ऐसा अभिनेता बनता है, जिसकी पहचान किसी एक भाषा, किसी एक इंडस्ट्री या किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं रहती।
यह कहानी है अतुल कुलकर्णी की।
हिंदी सिनेमा में अतुल कुलकर्णी का नाम अक्सर उन कलाकारों में लिया जाता है, जो पर्दे पर आते हैं तो भले ही उनके पास फिल्म के सबसे ज्यादा सीन न हों, लेकिन उनका किरदार कहानी से निकलने के बाद भी दर्शक के जेहन में बना रहता है। ‘हे राम’, ‘चांदनी बार’, ‘रंग दे बसंती’, ‘नटरंग’, ‘द घाजी अटैक’, ‘राज़ी’, ‘रुद्र’ और ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके अभिनय की अलग-अलग परतें सामने रखीं।
सबसे खास बात यह है कि अतुल कुलकर्णी सिर्फ अभिनेता नहीं हैं। उन्होंने लेखन में भी अपनी अलग पहचान बनाई। आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की पटकथा लिखने के पीछे भी वही शख्स थे, जिन्होंने अभिनय की दुनिया में अपनी जगह थिएटर से बनाई थी। उन्होंने खुद बताया था कि इस कहानी का शुरुआती ड्राफ्ट उन्होंने बहुत कम समय में लिखा था, लेकिन उसे पर्दे तक पहुंचने में कई साल लग गए।
तो आखिर कौन हैं अतुल कुलकर्णी? इंजीनियरिंग छोड़कर अभिनय को चुनने का फैसला उन्होंने क्यों किया? थिएटर ने उनके व्यक्तित्व को कैसे बदला? दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने के बाद भी उन्होंने खुद को सिर्फ ‘अवार्ड विनिंग एक्टर’ तक सीमित क्यों नहीं किया? और ‘लाल सिंह चड्ढा’ जैसी फिल्म लिखने का विचार उनके दिमाग में कैसे आया?
आइए जानते हैं अतुल कुलकर्णी की पूरी कहानी।
अतुल कुलकर्णी का जन्म 10 सितंबर 1965 को बेलगाम, कर्नाटक में हुआ था। उनका पालन-पोषण महाराष्ट्र के सोलापुर से भी जुड़ा रहा और उनकी शुरुआती शिक्षा वहीं हुई। उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार उन्होंने हरिभाई देवकरण हाई स्कूल, सोलापुर में पढ़ाई की और बाद में कॉलेज के दौरान अंग्रेजी साहित्य की ओर अपना रुझान विकसित किया।
उनकी जिंदगी की पहली बड़ी दिशा अभिनय नहीं बल्कि इंजीनियरिंग थी।
उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया, लेकिन उन्हें यह रास्ता अपने लिए सही नहीं लगा। पहले वर्ष में ही उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ दी और वापस सोलापुर आकर साहित्य की पढ़ाई की।
यही वह फैसला था, जिसने आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।
उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इंजीनियरिंग छोड़ने वाला यह युवक भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित चरित्र अभिनेताओं में से एक बनेगा।
अतुल कुलकर्णी के लिए अभिनय अचानक पैदा हुआ कोई सपना नहीं था। इसकी शुरुआत उनके स्कूल और कॉलेज के दिनों में ही हो चुकी थी।
उन्होंने महाराष्ट्र की राज्य स्तरीय नाट्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। 1989 से 1992 के बीच अभिनय और नाट्य निर्देशन के लिए उन्हें पुरस्कार भी मिले। थिएटर में काम करते हुए उन्होंने सिर्फ मंच पर अभिनय नहीं सीखा, बल्कि निर्देशन और मंच के पीछे की दुनिया को भी करीब से समझा।
कॉलेज के दौरान वे सोलापुर की Natya Aradhana नाम की थिएटर संस्था से जुड़े। शुरुआती दौर में उन्होंने बैकस्टेज काम किया और धीरे-धीरे मंच पर अभिनय करने का अवसर मिला।
यहीं से उनके भीतर यह विश्वास मजबूत हुआ कि अभिनय को सिर्फ शौक नहीं, बल्कि जीवन का पेशा बनाया जा सकता है।
थिएटर के अनुभव के बाद अतुल कुलकर्णी ने अभिनय को औपचारिक रूप से सीखने का फैसला किया।
उन्होंने नई दिल्ली स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से ड्रामेटिक आर्ट्स की पढ़ाई की और 1995 में प्रशिक्षण पूरा किया।
NSD से निकलना उनके लिए सिर्फ एक डिग्री या डिप्लोमा हासिल करना नहीं था। यह वह दौर था जिसने उन्हें अभिनय को सिर्फ संवाद बोलने की कला से आगे देखने की दृष्टि दी।
थिएटर ने उन्हें किरदार को समझना सिखाया और NSD ने उस समझ को तकनीक दी।
उनकी शुरुआती रंगमंचीय यात्रा में ‘गांधी विरुद्ध गांधी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। इस नाटक में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आधिकारिक कैटलॉग में भी उनके थिएटर कार्य और इस भूमिका का उल्लेख मिलता है।
NSD से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद अतुल कुलकर्णी मुंबई पहुंचे। लेकिन उनके लिए फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किसी बड़े स्टार की तरह नहीं था।
उन्हें धीरे-धीरे छोटे और महत्वपूर्ण किरदारों के जरिए पहचान बनानी थी।
शुरुआती फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में काम किया। हिंदी के साथ-साथ उन्होंने मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम और अंग्रेजी सिनेमा में भी अभिनय किया। यही बहुभाषी काम आगे चलकर उनके करियर की सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल हुआ।
अतुल कुलकर्णी ने कभी खुद को केवल ‘हिंदी फिल्म अभिनेता’ तक सीमित नहीं किया।
उनकी प्राथमिकता कहानी और किरदार रहे।
एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि वे किसी फिल्म को करने का फैसला कैसे करते हैं, तो उन्होंने साफ कहा कि उनके लिए सबसे पहले कहानी मायने रखती है।
शायद यही वजह है कि उनका करियर मुख्यधारा और समानांतर सिनेमा के बीच एक दिलचस्प पुल बन गया।
साल 2000 में आई कमल हासन की फिल्म ‘हे राम’ अतुल कुलकर्णी के करियर का बड़ा मोड़ साबित हुई।
फिल्म में उन्होंने एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया। यह कोई सामान्य सपोर्टिंग रोल नहीं था। कहानी के राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में उनके किरदार की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उनके अभिनय को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
एक अभिनेता के लिए यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी।
लेकिन अतुल कुलकर्णी के करियर की खासियत यह रही कि उन्होंने इस पुरस्कार को मंजिल नहीं बनाया।
वह आगे बढ़ते रहे।
अगर ‘हे राम’ ने अतुल कुलकर्णी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई, तो ‘चांदनी बार’ ने यह साबित कर दिया कि वह किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं हैं।
मधुर भंडारकर की इस फिल्म में तब्बू मुख्य भूमिका में थीं और फिल्म ने मुंबई के बार और उसके आसपास की कठिन सामाजिक दुनिया को पर्दे पर रखा।
अतुल कुलकर्णी ने इसमें भी प्रभावशाली भूमिका निभाई।
उनके अभिनय को एक बार फिर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के सम्मान से नवाजा गया।
दो अलग फिल्मों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना उनके अभिनय करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
और दिलचस्प बात यह है कि उनकी सफलता किसी पारंपरिक ‘हीरो’ की छवि पर निर्भर नहीं थी।
उनकी ताकत किरदार था।
2006 में आई ‘रंग दे बसंती’ में अतुल कुलकर्णी ने आमिर खान, सिद्धार्थ, कुणाल कपूर, शरमन जोशी और आर. माधवन जैसे कलाकारों के साथ काम किया।
फिल्म में उनका किरदार कहानी के राजनीतिक और सामाजिक पक्ष से जुड़ा था।
राकेश ओमप्रकाश मेहरा की इस फिल्म ने युवाओं, इतिहास, व्यवस्था और देश के प्रति जिम्मेदारी जैसे विषयों को लोकप्रिय सिनेमा के केंद्र में रखा।
फिल्म की सफलता ने अतुल कुलकर्णी को एक बार फिर बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।
यह उनके करियर का वह दौर था जब वह साबित कर चुके थे कि गंभीर सिनेमा और लोकप्रिय सिनेमा—दोनों में उनका अभिनय काम कर सकता है।
अतुल कुलकर्णी ने सिर्फ हिंदी फिल्मों में ही अपना प्रभाव नहीं छोड़ा।
मराठी सिनेमा में ‘नटरंग’ उनके उल्लेखनीय कामों में शामिल है। फिल्म में अतुल कुलकर्णी सहित कलाकारों के अभिनय की चर्चा हुई और उनके प्रदर्शन ने एक बार फिर यह दिखाया कि भाषा उनके अभिनय की सीमा नहीं है।
‘नटरंग’ के लिए उन्हें एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवॉर्ड्स में अभिनय की श्रेणी में नामांकन भी मिला।
बाद में कन्नड़ फिल्म ‘Edegarike’ के लिए उन्होंने फिल्मफेयर अवॉर्ड साउथ में बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पुरस्कार जीता।
यानी राष्ट्रीय पुरस्कार से लेकर क्षेत्रीय फिल्म पुरस्कारों तक, उनका सफर लगातार अलग-अलग भाषाओं में आगे बढ़ता रहा।
अतुल कुलकर्णी ने अपने लंबे करियर में कई बड़े कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा की है।
उन्होंने कमल हासन के साथ ‘हे राम’ में काम किया।
तब्बू के साथ ‘चांदनी बार’ में नजर आए।
आमिर खान के साथ ‘रंग दे बसंती’ में काम किया और बाद में ‘लाल सिंह चड्ढा’ के लेखक के रूप में भी उनके साथ जुड़े।
उन्होंने करीना कपूर खान, कुणाल कपूर, सिद्धार्थ, आर. माधवन, अजय देवगन, अभिषेक बच्चन, सोनम कपूर, ओम पुरी, ऋषि कपूर, विद्या बालन और कई अन्य कलाकारों के साथ अलग-अलग फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में काम किया।
उनकी फिल्मोग्राफी में ‘Page 3’, ‘Delhi-6’, ‘Jazbaa’, ‘Raees’, ‘The Ghazi Attack’, ‘Baazaar’, ‘Manikarnika: The Queen of Jhansi’, ‘Mere Pyare Prime Minister’, ‘Wild Dog’, ‘A Thursday’ और कई अन्य प्रोजेक्ट्स शामिल हैं।
यह सूची बताती है कि अतुल कुलकर्णी का करियर सिर्फ फिल्मों की संख्या का नहीं, बल्कि विविध किरदारों का सफर रहा है।
अतुल कुलकर्णी की कहानी का एक बेहद दिलचस्प अध्याय तब शुरू हुआ, जब उन्होंने कैमरे के सामने से कैमरे के पीछे की तरफ कदम बढ़ाया।
फिल्म थी ‘लाल सिंह चड्ढा’।
यह फिल्म हॉलीवुड की चर्चित फिल्म ‘Forrest Gump’ का आधिकारिक भारतीय रूपांतरण थी। इसका स्क्रीनप्ले अतुल कुलकर्णी ने लिखा।
और इस कहानी के पीछे का किस्सा खुद एक फिल्मी कहानी जैसा है।
अतुल ने बताया था कि ‘Jaane Tu… Ya Jaane Na’ के प्रीमियर के बाद आमिर खान के साथ बातचीत में ‘Forrest Gump’ का जिक्र हुआ था। अगले दिन उनका आउटडोर शूट रद्द हो गया और उनके पास कुछ दिन खाली थे।
उन्होंने फिल्म दोबारा देखी।
फिर उनके मन में सवाल आया—अगर यही कहानी भारत में पैदा हुए एक व्यक्ति की होती तो?
उन्होंने लिखना शुरू किया।
और करीब 10-12 दिनों में शुरुआती स्क्रिप्ट तैयार हो गई।
लेकिन स्क्रिप्ट लिखना कहानी का अंत नहीं था।
असल यात्रा उसके बाद शुरू हुई।
अतुल कुलकर्णी के मुताबिक, स्क्रिप्ट लिखने के बाद फिल्म को बनाने और अधिकार हासिल करने में कई साल लगे।
उन्होंने बताया था कि आमिर खान ने शुरुआत में स्क्रिप्ट पढ़ने में समय लिया और बाद में जब उन्होंने कहानी सुनी तो बहुत कम समय में फिल्म करने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद ‘Forrest Gump’ के अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया चली।
यानी जिस स्क्रिप्ट को लिखने में लगभग दो हफ्ते भी नहीं लगे, उसे पर्दे तक पहुंचने में करीब एक दशक का समय लग गया।
यही शायद सिनेमा की सबसे बड़ी सच्चाई है।
कहानी लिखना एक चीज है।
उसे सही समय, सही लोगों और सही परिस्थितियों के साथ फिल्म बनते देखना दूसरी चीज।
2022 में रिलीज हुई ‘लाल सिंह चड्ढा’ को समीक्षकों की तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली और बॉक्स ऑफिस पर फिल्म उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी।
फिल्म की रिलीज से पहले और बाद में सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा और विवाद रहा।
लेकिन अतुल कुलकर्णी ने बाद में फिल्म के सफर को लेकर निराशा के बजाय संतोष व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि टीम ने वही बनाने की कोशिश की, जो वे बनाना चाहती थी। बाद में ओटीटी पर दर्शकों से मिले सकारात्मक संदेशों ने भी उन्हें खुशी दी।
यह बात अतुल के व्यक्तित्व के बारे में काफी कुछ बताती है।
उनके लिए किसी फिल्म की सफलता सिर्फ बॉक्स ऑफिस नंबर नहीं है।
अगर कहानी किसी दर्शक के मन में जगह बना लेती है, तो वह भी एक उपलब्धि है।
अतुल कुलकर्णी की निजी जिंदगी भी थिएटर से जुड़ी रही है।
उन्होंने थिएटर अभिनेत्री गीतांजलि कुलकर्णी से शादी की। दोनों की मुलाकात नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के दिनों से जुड़ी बताई जाती है। उपलब्ध स्रोतों में उनकी शादी का वर्ष 1996 दिया गया है।
गीतांजलि कुलकर्णी भी थिएटर और अभिनय की दुनिया में सक्रिय रही हैं।
दोनों ने अभिनय के साथ-साथ शिक्षा और सामाजिक काम के क्षेत्र में भी रुचि दिखाई।
उनके रिश्ते की खास बात यह है कि दोनों की पेशेवर दुनिया की शुरुआत थिएटर से हुई और आगे चलकर दोनों ने अभिनय से बाहर भी काम किया।
अतुल कुलकर्णी के व्यक्तित्व का एक कम चर्चित पहलू उनका सामाजिक और शैक्षिक काम है।
उन्होंने QUEST यानी Quality Education Support Trust के साथ काम किया, जिसका उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाना था।
संस्था की स्थापना 2007 में हुई थी और अतुल इसके शुरुआती वर्षों में अध्यक्ष रहे। बाद में फरवरी 2021 में उन्होंने QUEST के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति ली। यह अभिनय से संन्यास नहीं था, बल्कि संस्था की जिम्मेदारी से अलग होने का फैसला था।
QUEST का काम वंचित और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा से जुड़े प्रयासों पर केंद्रित रहा है। संस्था के काम में बच्चों, शिक्षकों और शुरुआती शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम शामिल रहे हैं।
इस पहलू को समझना जरूरी है, क्योंकि इससे अतुल कुलकर्णी का सिनेमा के बाहर का व्यक्तित्व भी सामने आता है।
अतुल कुलकर्णी का करियर विवादों के बजाय उनके अभिनय, थिएटर और सामाजिक काम के लिए ज्यादा जाना जाता है।
‘लाल सिंह चड्ढा’ के समय फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस जरूर हुई थी। फिल्म के विषय और आमिर खान को लेकर भी काफी चर्चा हुई।
लेकिन अतुल कुलकर्णी के खिलाफ किसी सनसनीखेज निजी विवाद को उनकी जीवनी का हिस्सा बनाना उचित नहीं होगा, क्योंकि ऐसी बातों को प्रमाणित किए बिना लिखना तथ्यात्मक पत्रकारिता के मानकों के खिलाफ होगा।
उनके करियर की असली कहानी किसी विवाद से कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
इंटरनेट पर अतुल कुलकर्णी की नेट वर्थ को लेकर अलग-अलग आंकड़े देखने को मिल सकते हैं, लेकिन उनकी संपत्ति या कुल नेट वर्थ का कोई विश्वसनीय, आधिकारिक रूप से सत्यापित आंकड़ा सार्वजनिक नहीं है।
इसलिए किसी वेबसाइट पर प्रकाशित अनुमानित रकम को उनकी वास्तविक संपत्ति बताना सही नहीं होगा।
इतना जरूर कहा जा सकता है कि लंबे समय से हिंदी और क्षेत्रीय सिनेमा, थिएटर, OTT तथा स्क्रीनराइटिंग में सक्रिय रहने के कारण उन्होंने एक सफल पेशेवर करियर बनाया है।
लेकिन ‘अतुल कुलकर्णी की नेट वर्थ इतने करोड़ है’ जैसी निश्चित संख्या उपलब्ध प्रमाण के बिना नहीं दी जानी चाहिए।
अतुल कुलकर्णी उन कलाकारों में दिखाई देते हैं जिनकी सार्वजनिक पहचान ग्लैमर और महंगी लाइफस्टाइल से ज्यादा उनके काम से बनी है।
उन्होंने लंबे समय तक ऐसे किरदार चुने जिनमें अभिनेता को खुद को कहानी के हिसाब से ढालना पड़ता है।
उनका करियर यह भी दिखाता है कि एक कलाकार के लिए लोकप्रियता ही सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं होती।
कभी राष्ट्रीय पुरस्कार, कभी क्षेत्रीय सिनेमा का सम्मान, कभी थिएटर और कभी लेखन—उन्होंने अपने करियर को अलग-अलग दिशाओं में फैलाया।
एक समय अतुल कुलकर्णी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन पहले ही वर्ष में उन्हें एहसास हुआ कि यह क्षेत्र उनके लिए नहीं है।
उन्होंने पढ़ाई छोड़कर साहित्य की ओर रुख किया।
अगर उन्होंने उस समय वह फैसला न लिया होता, तो शायद भारतीय सिनेमा को अतुल कुलकर्णी जैसा अभिनेता नहीं मिलता।
अतुल ने थिएटर में अभिनय के साथ निर्देशन का अनुभव भी हासिल किया।
राज्य स्तरीय नाट्य प्रतियोगिताओं में उन्हें अभिनय और निर्देशन के लिए सम्मान मिला था।
यानी पर्दे पर किसी किरदार की भावनाओं को समझने से पहले वे थिएटर की पूरी प्रक्रिया को समझ चुके थे।
यह शायद उनके करियर का सबसे दिलचस्प किस्सा है।
एक फिल्म देखकर उनके मन में विचार आया कि अगर यही कहानी भारतीय संदर्भ में हो तो कैसी होगी।
उन्होंने नोट्स बनाए और लिखना शुरू कर दिया।
कुछ ही दिनों में पहला ड्राफ्ट तैयार हो गया। बाद में इसे फिल्म बनने में वर्षों लगे।
‘लाल सिंह चड्ढा’ के दौरान अतुल ने अपने बारे में कहा था कि वे खुद को सिर्फ लेखक की संज्ञा देने के बजाय एक तरह से ‘expressor’ मानते हैं।
उनके लिए रचनात्मकता किसी एक माध्यम में बंधी हुई चीज नहीं थी।
शायद इसी वजह से वह अभिनय, थिएटर, लेखन और सामाजिक काम—इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रहे।
हिंदी फिल्मों के दर्शकों के लिए अतुल कुलकर्णी जाना-पहचाना नाम हैं, लेकिन उनका काम कई भारतीय भाषाओं में फैला है।
हिंदी, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम और अंग्रेजी सिनेमा में उनकी मौजूदगी उनके बहुमुखी करियर को दिखाती है।
अतुल कुलकर्णी ने उम्र के साथ अभिनय से दूरी नहीं बनाई है।
उनका काम फिल्मों और OTT प्रोजेक्ट्स में जारी रहा है। हाल के वर्षों में ‘A Thursday’, ‘Rudra’, ‘City of Dreams’ और अन्य प्रोजेक्ट्स में उन्हें देखा गया।
2026 में भी उनकी फिल्मोग्राफी में नए प्रोजेक्ट्स दर्ज हैं। उपलब्ध फिल्म डेटाबेस के अनुसार ‘Biker’ और ‘Dacoit: A Love Story’ जैसे प्रोजेक्ट्स में उनके अभिनय का उल्लेख मिलता है, जबकि आने वाले प्रोजेक्ट्स की सूची में भी उनका नाम मौजूद है।
इससे एक बात साफ है—अतुल कुलकर्णी के लिए अभिनय कोई ऐसी मंजिल नहीं थी जिसे हासिल करके रुक जाना हो।
यह उनके लिए लगातार सीखते रहने की प्रक्रिया है।
अतुल कुलकर्णी की कहानी को सिर्फ एक अभिनेता की बायोग्राफी के रूप में देखना शायद उनके सफर को छोटा कर देना होगा।
यह कहानी उस व्यक्ति की है जिसने एक तय रास्ता छोड़ा।
इंजीनियरिंग छोड़ना आसान फैसला नहीं रहा होगा।
फिर थिएटर।
फिर NSD।
फिर छोटे किरदार।
फिर राष्ट्रीय पुरस्कार।
फिर अलग-अलग भाषाओं का सिनेमा।
फिर OTT।
और आखिर में एक ऐसी फिल्म की पटकथा लिखना, जिसे बनने में करीब एक दशक का समय लगा।
उनके सफर में एक चीज लगातार दिखाई देती है—धैर्य।
अवार्ड मिलने के बाद भी रुकना नहीं।
लोकप्रिय फिल्म मिलने के बाद भी खुद को दोहराना नहीं।
और लेखन में कदम रखने के बाद भी सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हटना कि सामने ‘Forrest Gump’ जैसी विश्व प्रसिद्ध फिल्म की विरासत मौजूद है।
अतुल कुलकर्णी की कहानी शायद उन लोगों के लिए सबसे ज्यादा प्रेरणादायक है, जिन्हें लगता है कि जिंदगी में एक बार चुना गया रास्ता हमेशा के लिए तय हो जाता है।
उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ी।
थिएटर चुना।
फिर अभिनय को पेशेवर जीवन बनाया।
राष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
कई भाषाओं में काम किया।
बड़े सितारों के साथ स्क्रीन साझा की।
OTT के दौर में खुद को नए माध्यम के हिसाब से ढाला।
और फिर लेखक बनकर एक ऐसी कहानी को भारतीय संदर्भ दिया, जिसे दुनिया पहले से जानती थी।
उनकी यात्रा बताती है कि सफलता हमेशा सबसे आगे खड़े व्यक्ति की कहानी नहीं होती।
कई बार सफलता उस कलाकार की कहानी होती है, जो हर बार किरदार के पीछे खड़ा रहता है—लेकिन जब पर्दा गिरता है, तो दर्शक उसे याद रखते हैं।
अतुल कुलकर्णी इसी तरह के अभिनेता हैं।
एक ऐसा कलाकार, जिसकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं कि उसने कितने पुरस्कार जीते, बल्कि यह है कि उसने हर नए किरदार के साथ खुद को फिर से खोजने की कोशिश की।
और शायद यही एक सच्चे कलाकार की सबसे खूबसूरत पहचान है।
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