नाना पाटेकर की पूरी कहानी: ₹35 से शुरू हुआ सफर, National Award से Padma Shri तक
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| वकील से बने सिनेमा के महानायक! |
भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनकी फिल्मों से नहीं बनती, बल्कि अभिनय के प्रति उनका नजरिया उन्हें अलग बनाता है। ममूटी उन्हीं दुर्लभ कलाकारों में से एक हैं।
एक ऐसा अभिनेता जिसने कभी अदालत में वकालत की, लेकिन किस्मत उन्हें कैमरे के सामने ले आई। शुरुआती वर्षों में छोटे रोल किए, संघर्ष देखा, असफलताएं झेलीं और फिर धीरे-धीरे मलयालम सिनेमा की सबसे मजबूत पहचान बन गए।
आज ममूटी सिर्फ एक सुपरस्टार नहीं हैं। वह एक संस्था की तरह देखे जाते हैं।
पांच दशक से अधिक लंबे करियर में 400 से ज्यादा फिल्मों का हिस्सा रह चुके ममूटी ने मलयालम के साथ तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान उनके नाम हैं।
लेकिन उनकी कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने खुद को दोहराना स्वीकार नहीं किया।
जहां कई सितारे एक सफल फॉर्मूले को जिंदगी भर दोहराते रहते हैं, वहीं ममूटी आज भी ऐसे किरदार चुनते हैं जिनमें जोखिम है। Nanpakal Nerathu Mayakkam, Kaathal: The Core और Bramayugam जैसी फिल्मों ने नई पीढ़ी को भी यह महसूस कराया कि असली अभिनेता की उम्र नहीं होती—उसकी भूख होती है, और ममूटी के भीतर वह भूख आज भी जिंदा है।
ममूटी का असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है। उनका जन्म 7 सितंबर 1951 को केरल में हुआ था। उनका बचपन एक साधारण परिवार और जमीन से जुड़े माहौल में बीता।
उनके पिता इस्माइल कृषि और ग्रामीण जीवन से जुड़े थे, जबकि उनकी मां फातिमा गृहिणी थीं। परिवार की सादगी और अनुशासन ने ममूटी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला।
ममूटी परिवार के बड़े बच्चों में थे और उनके भाई-बहनों के साथ उनका बचपन सामान्य मध्यमवर्गीय परिवेश में गुजरा।
बाद में परिवार एर्नाकुलम क्षेत्र की ओर आ गया, जहां उनकी पढ़ाई आगे बढ़ी।
शिक्षा के मामले में ममूटी हमेशा गंभीर रहे। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद कानून की शिक्षा हासिल की और एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली।
यह जानकर कई लोगों को हैरानी होती है कि फिल्मों में पूरी तरह आने से पहले ममूटी ने वकालत भी की थी।
यानि जिस व्यक्ति को आगे चलकर लाखों दर्शक पर्दे पर न्याय, अपराध, राजनीति, प्रेम और इंसानी रिश्तों के जटिल किरदार निभाते देखेंगे, वह कभी वास्तविक जीवन में कानून की दुनिया का हिस्सा था।
शायद यही अनुभव उनके अभिनय की गहराई का भी एक कारण बना।
ममूटी का फिल्मों से रिश्ता अचानक नहीं बना था।
कॉलेज के दिनों में ही उन्हें अभिनय का पहला अवसर मिला। 1971 की मलयालम फिल्म Anubhavangal Paalichakal में वह एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में दिखाई दिए। यह भूमिका छोटी थी और उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि पर्दे पर दिखने वाला यह युवा आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में शामिल होगा।
लेकिन पहला कदम और सफल करियर—दोनों के बीच लंबी दूरी थी।
1970 के दशक में फिल्म उद्योग में जगह बनाना आसान नहीं था। खासकर तब, जब किसी कलाकार के पास फिल्मी परिवार का मजबूत सहारा न हो।
ममूटी ने भी इस दौर में इंतजार किया।
छोटे अवसर मिले, सहायक भूमिकाएं मिलीं, कुछ फिल्में आईं और चली गईं। लेकिन अभिनय का सपना खत्म नहीं हुआ।
1979 में उन्हें मुख्य भूमिका का अवसर Devalokam में मिला, हालांकि फिल्म रिलीज नहीं हो सकी। इसके बाद 1980 में Vilkkanundu Swapnangal जैसी फिल्म में उनकी पहचान अधिक स्पष्ट होने लगी।
असल बदलाव अगले कुछ वर्षों में आया।
आज ममूटी का नाम सुनते ही एक स्थापित सुपरस्टार की छवि सामने आती है, लेकिन उनके शुरुआती साल बिल्कुल आसान नहीं थे।
उनके पास कोई तैयार स्टारडम नहीं था। उन्हें हर भूमिका के जरिए खुद को साबित करना पड़ा। उस दौर में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में प्रतिभाशाली कलाकारों की कमी नहीं थी। इसलिए सिर्फ अच्छा दिखना या संवाद बोल लेना पर्याप्त नहीं था।
ममूटी की सबसे बड़ी ताकत धीरे-धीरे सामने आई—उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और किरदार में पूरी तरह उतर जाने की क्षमता।
1981 की फिल्म Ahimsa उनके करियर के शुरुआती महत्वपूर्ण पड़ावों में रही। इस फिल्म के प्रदर्शन ने उन्हें गंभीर अभिनेता के रूप में पहचान दिलाई और उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार में सम्मान मिला।
इसके बाद उनके करियर की रफ्तार धीरे-धीरे बदलने लगी। उन्होंने यह समझ लिया था कि सिर्फ नायक बनना काफी नहीं है। उन्हें अभिनेता बनना था। यही सोच बाद में ममूटी और कई अन्य सुपरस्टारों के बीच सबसे बड़ा अंतर साबित हुई।
1980 का दशक ममूटी के लिए निर्णायक साबित हुआ।
उन्होंने लगातार ऐसी फिल्में कीं जिनमें उनकी अभिनय क्षमता के अलग-अलग रंग दिखाई दिए।
Sandhyakku Virinja Poovu, Aa Raathri, Athirathram, Nirakkoottu और Yathra जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच मजबूत बनाया।
Yathra और Nirakkoottu जैसी फिल्मों ने साबित किया कि ममूटी केवल एक्शन या रोमांटिक भूमिकाओं तक सीमित रहने वाले अभिनेता नहीं हैं।
उनके चेहरे पर भावनाओं की एक अलग भाषा दिखाई देती थी। वह कई बार कम संवादों में भी बहुत कुछ कह देते थे। लेकिन हर सफलता के बाद उनका करियर लगातार ऊपर ही नहीं गया।
एक दौर ऐसा भी आया जब कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकीं। यह किसी भी अभिनेता के लिए मुश्किल समय हो सकता था। फिर आया साल 1987।
और फिल्म थी—New Delhi।
इस क्राइम थ्रिलर ने ममूटी के करियर को जबरदस्त नई ऊर्जा दी। फिल्म की सफलता के बाद उनकी व्यावसायिक स्थिति फिर मजबूत हुई और आने वाले वर्षों में वह मलयालम सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में स्थापित हो गए।
ममूटी ने अपने करियर में सिर्फ एक तरह की फिल्मों पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। वकील बने। राजनीतिक किरदार किए। ऐतिहासिक पात्र निभाए। ग्रामीण पृष्ठभूमि के आम आदमी बने। जटिल मानसिक स्थिति वाले चरित्र निभाए। और जरूरत पड़ने पर नकारात्मक रंग वाले किरदारों से भी दूरी नहीं बनाई।
उनकी सबसे बड़ी खासियत यही रही कि वह स्टार इमेज के भीतर कैद नहीं हुए।
ममूटी की फिल्मों को देखें तो महसूस होता है कि उनके लिए किरदार की उम्र, लुक या नैतिक छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका अभिनय संभावनाओं से भरपूर होना है।
यही कारण है कि पांच दशक बाद भी युवा निर्देशक उनके साथ काम करने को उत्साहित रहते हैं।
ममूटी की फिल्मोग्राफी इतनी विशाल है कि उनकी सभी महत्वपूर्ण फिल्मों को एक लेख में समेटना मुश्किल है। फिर भी कुछ फिल्में ऐसी हैं जिन्होंने उनके करियर और भारतीय सिनेमा में उनकी पहचान को विशेष रूप से मजबूत किया।
1989 की यह फिल्म ममूटी के करियर की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मों में गिनी जाती है।
ऐतिहासिक और लोककथा के संसार में स्थापित इस फिल्म में उनके अभिनय को बेहद सराहा गया।
यह फिल्म केवल व्यावसायिक सफलता नहीं थी, बल्कि ममूटी की अभिनय क्षमता का बड़ा प्रमाण भी बनी।
अदूर गोपालकृष्णन के निर्देशन में बनी Mathilukal ममूटी के करियर की उन फिल्मों में शामिल है, जिनका जिक्र गंभीर सिनेमा की चर्चा में जरूर होता है।
इस फिल्म में भावनाओं की बारीकियों को जिस तरह उन्होंने पर्दे पर उतारा, वह उनके अभिनय की संवेदनशीलता को दिखाता है।
यह फिल्म भी ममूटी के अभिनय करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इस दौर तक वह सिर्फ लोकप्रिय स्टार नहीं रह गए थे। आलोचक भी उन्हें भारतीय सिनेमा के श्रेष्ठ अभिनेताओं में गिनने लगे थे।
1990 के दशक में ममूटी ने अपनी अभिनय क्षमता को और ऊंचाई दी। Vidheyan और Ponthan Mada जैसी फिल्मों में उनके प्रदर्शन ने दिखाया कि वह कठिन और चुनौतीपूर्ण किरदारों से डरते नहीं हैं।
राष्ट्रीय पुरस्कार स्तर पर उनकी उपलब्धियों में इस दौर की फिल्मों की बड़ी भूमिका रही।
ममूटी के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में Dr. Babasaheb Ambedkar का नाम विशेष रूप से लिया जाता है।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पर्दे पर निभाना केवल अभिनय नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी थी। ममूटी ने इस भूमिका के लिए गहन तैयारी की।
उनकी शारीरिक भाषा, आवाज और व्यक्तित्व को पकड़ने की कोशिश ने दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान खींचा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह प्रदर्शन बताता है कि भाषा किसी महान अभिनेता के लिए दीवार नहीं होती।
ममूटी मुख्य रूप से मलयालम सिनेमा से आए थे, लेकिन उन्होंने एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व को इस तरह निभाया कि उनका काम भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।
ममूटी की पहचान सिर्फ मलयालम फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कई भाषाओं की फिल्मों में काम किया।
तमिल सिनेमा में Thalapathi उनकी चर्चित फिल्मों में शामिल है। इस फिल्म में उन्होंने रजनीकांत जैसे बड़े सुपरस्टार के साथ काम किया।
Thalapathi में ममूटी की मौजूदगी ने यह दिखाया कि दो बड़े अभिनेता जब एक मजबूत कहानी में साथ आते हैं तो फिल्म का प्रभाव कितना अलग हो सकता है।
उन्होंने तमिल फिल्म Kandukondain Kandukondain में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तेलुगु सिनेमा में Swathi Kiranam जैसी फिल्म उनके करियर की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल है।
हिंदी और अंग्रेजी द्विभाषी परियोजना Dr. Babasaheb Ambedkar ने उन्हें पूरे भारत में नई पहचान दी।
भाषाएं बदलीं, निर्देशक बदले, फिल्म उद्योग बदले—लेकिन ममूटी की अभिनय शैली की सबसे बड़ी पहचान बनी रही: किरदार के प्रति ईमानदारी।
पांच दशक से अधिक लंबे करियर में ममूटी ने भारतीय सिनेमा की कई पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम किया है।
उनकी सबसे चर्चित पेशेवर साझेदारियों में मोहनलाल का नाम सबसे ऊपर आता है।
मलयालम सिनेमा के ये दोनों दिग्गज कलाकार लंबे समय से एक-दूसरे के समकालीन रहे हैं और साथ में कई फिल्मों में दिखाई दिए हैं।
उनकी जोड़ी को प्रतिस्पर्धा से ज्यादा मलयालम सिनेमा के दो मजबूत स्तंभों के रूप में देखा जाता है। मोहनलाल ने ममूटी के 75वें जन्मदिन पर उनके साथ 50 से अधिक फिल्मों में काम करने का उल्लेख करते हुए उनके अभिनय के प्रति जुनून की प्रशंसा की।
ममूटी ने अलग-अलग दौर में रजनीकांत, अमिताभ बच्चन, अजय देवगन सहित विभिन्न भारतीय फिल्म उद्योगों के कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा की है।
मलयालम सिनेमा में उन्होंने शोभना, सुहासिनी, उर्वशी, रेवती, मंजू वारियर, ज्योतिका और नई पीढ़ी के कई कलाकारों के साथ काम किया।
तमिल फिल्म Kandukondain Kandukondain में वह ऐश्वर्या राय बच्चन, तब्बू और अजित कुमार जैसे सितारों के साथ दिखाई दिए।
उनकी खासियत यह रही कि वह अपने सह-कलाकार की लोकप्रियता से प्रभावित होकर अभिनय का संतुलन नहीं बदलते थे। सीन में जो किरदार जरूरी होता, ममूटी उसी के अनुसार खुद को ढालते।
अभिनेता होने के साथ-साथ ममूटी फिल्म निर्माण से भी जुड़े रहे हैं।
उनकी प्रोडक्शन गतिविधियों ने उन्हें नई और प्रयोगात्मक कहानियों को समर्थन देने का अवसर दिया।
हाल के वर्षों में उनकी प्रोडक्शन कंपनी Mammootty Kampany के जरिए ऐसी फिल्मों पर ध्यान दिया गया जिनमें कहानी और नए फिल्मकारों की दृष्टि महत्वपूर्ण रही।
Nanpakal Nerathu Mayakkam और Kaathal: The Core जैसी फिल्मों को देखकर यह समझा जा सकता है कि ममूटी केवल सुरक्षित स्टार प्रोजेक्ट्स में विश्वास नहीं करते। वह जोखिम लेने को तैयार हैं। और शायद यही जोखिम उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाए हुए है।
ममूटी ने 1980 में सुल्फत से शादी की। उनके दो बच्चे हैं—बेटी सुरुमी और बेटा दुलकर सलमान।
दुलकर सलमान आज खुद भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल हैं और मलयालम के साथ हिंदी, तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी काम कर चुके हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ममूटी ने अपने बेटे के करियर को लेकर जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करने के बजाय उसे अपना रास्ता बनाने की स्वतंत्रता दी।
हाल के एक इंटरव्यू में दुलकर ने पिता से मिली जीवन-दृष्टि के बारे में बताया कि ममूटी का संदेश था—अपना रास्ता खुद खोजो, असफल हो, सीखो और आगे बढ़ो। यह बात ममूटी के व्यक्तित्व को समझने में मदद करती है।
वह केवल सफलता सिखाने वाले पिता नहीं, बल्कि अनुभव से सीखने की आजादी देने वाले पिता भी हैं।
ममूटी का करियर बहुत लंबा रहा है और इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में कई तरह की चर्चाएं होना स्वाभाविक है।
हालांकि उनकी सार्वजनिक छवि सामान्यतः एक अनुशासित और काम पर केंद्रित अभिनेता की रही है।
उनके करियर में असफल फिल्मों के दौर आए, आलोचनाएं हुईं और बदलते समय के साथ उन्हें नई पीढ़ी के दर्शकों के सामने खुद को लगातार साबित करना पड़ा।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने आलोचनाओं का जवाब अक्सर इंटरव्यू या विवादों से नहीं, बल्कि फिल्मों के जरिए दिया।
जब किसी अभिनेता के करियर को लेकर सवाल उठे और फिर वह एक चुनौतीपूर्ण भूमिका में शानदार प्रदर्शन करे, तो वही उसका सबसे मजबूत जवाब होता है।
ममूटी ने अपने लंबे करियर में कई बार यही किया।
ममूटी की व्यक्तिगत नेट वर्थ को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग अनुमान उपलब्ध हैं, लेकिन किसी आधिकारिक सार्वजनिक वित्तीय दस्तावेज के आधार पर उनकी सटीक संपत्ति की पुष्टि करना संभव नहीं है।
इसलिए उनके बारे में वायरल होने वाले करोड़ों रुपये के दावों को निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इतना जरूर स्पष्ट है कि पांच दशक से अधिक के सफल करियर, अभिनय, फिल्म निर्माण और ब्रांड वैल्यू के कारण वह दक्षिण भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली सितारों में शामिल हैं।
उनकी जीवनशैली में सफलता की चमक जरूर दिखाई देती है, लेकिन उनकी सार्वजनिक छवि लंबे समय से अनुशासन और काम के प्रति समर्पण वाली रही है।
उनके लिए असली संपत्ति शायद वह स्वतंत्रता है जो उन्हें 70 के दशक के बाद भी अपनी पसंद की फिल्में चुनने देती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि अभिनय को पेशा बनाने से पहले ममूटी ने कानून की पढ़ाई की और वकालत की। यह उनके जीवन का वह अध्याय है जो बताता है कि अभिनय उनका एकमात्र संभावित करियर नहीं था। लेकिन उन्होंने आखिरकार उस रास्ते को चुना जिसमें अनिश्चितता ज्यादा थी—सिनेमा।
1971 में Anubhavangal Paalichakal में उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के रूप में काम किया था।
वह छोटा सा पर्दे का अनुभव आगे चलकर पांच दशक के विशाल करियर की शुरुआत साबित हुआ।
अक्सर अभिनेता उम्र बढ़ने के साथ सुरक्षित भूमिकाएं चुनने लगते हैं। ममूटी ने इसका उल्टा किया।
हाल के वर्षों में Nanpakal Nerathu Mayakkam, Kaathal: The Core और हॉरर-ड्रामा Bramayugam जैसी फिल्मों का चुनाव बताता है कि वह आज भी खुद को चुनौती देना चाहते हैं।
विशेष रूप से इन फिल्मों ने युवा दर्शकों के बीच भी उनकी अभिनय क्षमता को नए सिरे से चर्चा में ला दिया।
ममूटी को भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए कई बड़े पुरस्कार मिले हैं।
उनके खाते में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, अनेक केरल राज्य फिल्म पुरस्कार और Filmfare Awards South शामिल हैं। उन्हें 1998 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
2026 में भारत सरकार ने उन्हें कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो उनके लंबे और प्रभावशाली सिनेमाई योगदान की एक और बड़ी राष्ट्रीय मान्यता है।
ममूटी की सफलता केवल इसलिए प्रेरक नहीं है कि वह एक सुपरस्टार बने।
उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने सफलता के बाद खुद को रोकने से इनकार किया। आज के दौर में कंटेंट सिनेमा की बात बहुत होती है।
लेकिन ममूटी दशकों पहले से ऐसे किरदार करते आए हैं जिनमें अभिनेता को अपनी स्टार इमेज से बाहर निकलना पड़ता था। उनकी फिल्में नई पीढ़ी के कलाकारों को एक महत्वपूर्ण संदेश देती हैं—
लोकप्रिय होना और अच्छा अभिनेता होना, दोनों अलग चीजें हैं। महान बनने के लिए दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
75 वर्ष की उम्र में भी ममूटी अभिनय की दुनिया में सक्रिय हैं। उनका करियर किसी पुरानी याद की तरह नहीं चल रहा, बल्कि वह आज भी नए प्रोजेक्ट्स और नई कहानियों का हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में उनकी फिल्मों ने आलोचनात्मक और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर चर्चा पैदा की है।
2024 की Bramayugam ने एक बार फिर साबित किया कि ममूटी नए जॉनर में भी खुद को पूरी ताकत से पेश कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कार में भी सम्मान मिला।
वर्तमान दौर में भी उनके कई प्रोजेक्ट्स को लेकर दर्शकों में उत्सुकता बनी हुई है। सितंबर 2026 में उनके 75वें जन्मदिन के अवसर पर फिल्म Mela का टाइटल और फर्स्ट लुक भी जारी किया गया, जो इस बात का संकेत है कि ममूटी का सफर अभी रुका नहीं है।
इसके अलावा दिग्गज निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन के साथ लंबे अंतराल के बाद उनका फिर से जुड़ना भी सिनेमा प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण रहा है।
मलयालम सिनेमा के इतिहास की चर्चा ममूटी और मोहनलाल के बिना पूरी नहीं हो सकती। दोनों ने लगभग एक ही दौर में अपनी पहचान बनाई। दोनों की अभिनय शैली अलग रही। दोनों की स्टार अपील अलग रही। लेकिन इन दोनों कलाकारों की मौजूदगी ने मलयालम सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई।
जहां प्रशंसक अक्सर दोनों की तुलना करते रहे, वहीं दोनों ने अपने-अपने तरीके से अभिनय की ऐसी विरासत बनाई जिसे किसी एक पैमाने पर मापना संभव नहीं। ममूटी का करियर अधिक नियंत्रित, अनुशासित और किरदार-केंद्रित दिखाई देता है। उनके भीतर स्टारडम है, लेकिन अभिनय की बेचैनी उससे कहीं ज्यादा बड़ी है।
ममूटी की कहानी किसी ऐसे अभिनेता की कहानी नहीं है जिसे शुरुआत में ही सब कुछ मिल गया था।
यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने पढ़ाई की, कानून की दुनिया देखी, छोटे रोल किए, इंतजार किया और धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। फिर सफलता मिली। लेकिन उन्होंने सफलता को अंतिम मंजिल नहीं बनने दिया। शायद यही ममूटी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
उन्होंने केवल सुपरस्टार बनने का सपना नहीं देखा। उन्होंने हर दौर में बेहतर अभिनेता बनने की कोशिश की। आज जब फिल्म इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है, थिएटर और ओटीटी के बीच दर्शकों की पसंद बदल रही है और स्टारडम के पुराने नियम टूट रहे हैं, तब ममूटी जैसे अभिनेता का लगातार प्रासंगिक बने रहना अपने आप में एक उपलब्धि है।
उनकी यात्रा हमें सिखाती है कि प्रतिभा जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है खुद को बदलने की हिम्मत।
75 वर्ष की उम्र में भी नई फिल्मों, नए किरदारों और नई चुनौतियों के लिए तैयार ममूटी शायद इसी वजह से सिर्फ मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार नहीं हैं।
वह भारतीय सिनेमा की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके लिए अभिनय नौकरी नहीं—एक जीवनभर चलने वाली साधना है।
और शायद ममूटी की असली कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि कुछ कलाकार रिटायर नहीं होते। वे बस हर नई फिल्म के साथ खुद को फिर से जन्म देते हैं।
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