प्रेम चोपड़ा की अनसुनी कहानी: लाहौर से बॉलीवुड के सबसे यादगार विलेन बनने तक का सफर
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| रंजिता कौर की अनसुनी कहानी |
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ अभिनेत्रियां ऐसी रही हैं, जिनकी लोकप्रियता केवल फिल्मों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। उनका चेहरा, उनकी आवाज, उनकी मासूमियत और पर्दे पर निभाए किरदार दर्शकों की यादों का हिस्सा बन जाते हैं। रंजिता कौर भी ऐसी ही अभिनेत्री हैं।
1976 में जब रंजिता ने ऋषि कपूर के साथ 'लैला मजनू' से फिल्मों में कदम रखा, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह नई लड़की आने वाले वर्षों में हिंदी सिनेमा के रोमांटिक दौर की पहचान बन जाएगी। लेकिन उनकी पहली ही फिल्म ने उन्हें ऐसी पहचान दी, जो दशकों बाद भी कायम है। Filmfare ने भी उनके डेब्यू को उस दौर की खास स्टार खोज के रूप में याद किया है।
इसके बाद 'अंखियों के झरोखों से', 'पति पत्नी और वो', 'सत्ते पे सत्ता', 'तेरी कसम', 'सुरक्षा', 'तराना', 'हमसे बढ़कर कौन' और 'आदत से मजबूर' जैसी फिल्मों ने रंजिता के करियर को अलग-अलग रंग दिए।
उनकी खासियत यह थी कि वह केवल एक तरह के किरदारों तक सीमित नहीं रहीं। कभी वह मासूम प्रेमिका बनीं, कभी पत्नी, कभी संघर्ष करती महिला और कभी मुख्य कहानी के बीच अपनी अलग छाप छोड़ने वाला किरदार।
और फिर एक समय ऐसा भी आया जब जिस अभिनेत्री को हिंदी फिल्मों में लगातार देखा जाता था, उसने धीरे-धीरे कैमरे से दूरी बना ली।
आज रंजिता कौर की कहानी केवल एक फिल्म स्टार की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब अभिनय, संगीत और भावनाओं से भरी फिल्में दर्शकों के दिल में उतरती थीं और एक अभिनेत्री बिना शोर-शराबे के भी लंबे समय तक याद रह सकती थी।
रंजिता कौर का जन्म 22 सितंबर 1956 को पंजाब में हुआ। उनके मूल नाम के संबंध में उपलब्ध स्रोतों में रंजिता मिर्जा का उल्लेख मिलता है। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद उन्होंने अपनी मां का maiden name 'कौर' अपनाया।
उनके शुरुआती पारिवारिक जीवन के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत अधिक विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनके माता-पिता या बचपन से जुड़े कई इंटरनेट दावों को तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
रंजिता की एक बहन रुबिना भी अभिनय की दुनिया से जुड़ी थीं। रुबिना ने 1986 की फिल्म 'एक मैं और एक तू' में काम किया था।
रंजिता के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग लेने का फैसला किया।
उन्होंने Film and Television Institute of India यानी FTII से अभिनय का प्रशिक्षण लिया। उसी संस्थान में उस दौर के कई प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ उनका संपर्क हुआ। उपलब्ध एक पुराने इंटरव्यू के अनुसार वह FTII में मिथुन चक्रवर्ती, नीता मेहता, टॉम ऑल्टर और बेंजामिन गिलानी जैसे कलाकारों के साथ पढ़ी थीं और 1974 में संस्थान से ग्रेजुएट हुईं।
यही प्रशिक्षण आगे उनके अभिनय की बारीकी में दिखाई दिया।
आज जब किसी कलाकार की पहली फिल्म बड़े स्टार के साथ होती है तो उसे अक्सर बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाता है। लेकिन रंजिता के लिए 'लैला मजनू' तक पहुंचने का रास्ता इतना सीधा नहीं था।
FTII से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई लौटीं। एक दोस्त के साथ वह Famous Studios गई थीं, जहां निर्माता एफ.सी. मेहरा से मुलाकात का मौका मिला। वहीं निर्देशक राहुल रावल की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने अपने पिता एच.एस. रावल से रंजिता के बारे में बात की।
इसके बाद रंजिता को उनके घर बुलाया गया और उनका फोटो टेस्ट किया गया।
'लैला मजनू' जैसी बड़ी फिल्म और सामने ऋषि कपूर जैसे लोकप्रिय अभिनेता होने की वजह से रंजिता खुद भी थोड़ा घबरा गई थीं। उनके मुताबिक बाबा आजमी ने भी उन्हें इस फिल्म के लिए कोशिश करने को कहा था, लेकिन बड़े प्रोजेक्ट का दबाव देखकर वह पीछे हटने लगी थीं।
फिल्म के लिए दो अभिनेत्रियों को लेकर विचार हुआ और आखिरकार रंजिता को लैला के किरदार के लिए चुना गया।
कई बार किसी कलाकार का करियर एक छोटे से मौके से बदल जाता है। रंजिता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
साल 1976।
रंजिता कौर की पहली फिल्म आई—'लैला मजनू'।
फिल्म में उनके सामने ऋषि कपूर थे और कहानी प्रेम की उस क्लासिक दास्तान पर आधारित थी जिसे भारतीय दर्शक पहले से जानते थे। फिल्म का निर्देशन एच.एस. रावल ने किया था। इसके संगीत और गीतों ने भी फिल्म को यादगार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। Filmfare के अनुसार फिल्म के संगीत में मदन मोहन और जयदेव का योगदान था और साहिर लुधियानवी के गीतों ने इसकी रोमांटिक दुनिया को और मजबूत किया।
रंजिता के लिए यह सिर्फ डेब्यू फिल्म नहीं थी।
यह उनके करियर का वह दरवाजा था जिसके दूसरी तरफ हिंदी सिनेमा की एक लंबी यात्रा उनका इंतजार कर रही थी।
उनकी खूबसूरती में उस समय की फिल्मों के अनुरूप एक सादगी थी। वह ग्लैमरस दिखने के बावजूद पर्दे पर बहुत सहज और मासूम दिखाई देती थीं।
यही वजह थी कि रोमांटिक किरदार उनके साथ बहुत स्वाभाविक लगने लगे।
अगर 'लैला मजनू' ने रंजिता को पहचान दी तो 'अंखियों के झरोखों से' ने उन्हें दर्शकों के दिल में गहराई से उतार दिया।
1978 में आई यह फिल्म राजश्री प्रोडक्शंस से जुड़ी थी और इसमें रंजिता के साथ सचिन ने अभिनय किया। फिल्म का निर्देशन हिरेन नाग ने किया था और संगीत रविंद्र जैन ने दिया था।
फिल्म की कहानी प्रेम और भावनाओं के साथ एक बेहद दर्दनाक मोड़ लेती है। रंजिता ने इसमें लिली का किरदार निभाया था।
यह वह दौर था जब प्रेम कहानियां सिर्फ रोमांस तक सीमित नहीं होती थीं। उनमें इंतजार, त्याग, बीमारी, परिवार और बिछड़ने का दर्द भी होता था।
रंजिता की अभिनय शैली उस भावनात्मक सिनेमा के लिए बिल्कुल उपयुक्त थी।
उनके चेहरे की मासूमियत और भावनाओं को बिना ज्यादा संवाद के व्यक्त करने की क्षमता इस फिल्म की ताकत बनी।
इस फिल्म के लिए उन्हें Filmfare Award में Best Actress के लिए नामांकन मिला था।
आज भी 'अंखियों के झरोखों से' का नाम आते ही रंजिता की छवि दर्शकों के सामने उभर आती है।
उसी साल यानी 1978 में रंजिता की एक और महत्वपूर्ण फिल्म आई—'पति पत्नी और वो'।
बी.आर. चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में संजीव कुमार, विद्या सिन्हा और रंजिता कौर प्रमुख भूमिकाओं में थे। रंजिता ने इसमें निर्मला देशपांडे का किरदार निभाया।
यह फिल्म उनके रोमांटिक इमेज से अलग तरह की कहानी थी।
फिल्म में रंजिता का किरदार उस सामाजिक और वैवाहिक कहानी का हिस्सा था जिसमें रिश्तों की जटिलता और इंसानी कमजोरियों को दिखाया गया था।
उनके अभिनय को यहां भी पहचान मिली और उन्हें Filmfare में Best Supporting Actress के लिए नामांकन मिला।
इस तरह एक ही दौर में रंजिता ने साबित कर दिया कि उन्हें केवल मासूम प्रेमिका के रूप में सीमित करना आसान नहीं था।
रंजिता कौर के करियर का एक बड़ा अध्याय मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी फिल्मों का रहा।
दोनों ने 'सुरक्षा', 'तराना', 'हमसे बढ़कर कौन', 'आदत से मजबूर', 'बाजी' और बाद में 'गुनाहों का देवता' जैसी फिल्मों में साथ काम किया।
उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया।
मिथुन और रंजिता दोनों FTII से जुड़े थे और उनके बीच दोस्ती भी रही। लेखिका और फिल्म पत्रकार भावना सोमाया ने भी दोनों की जोड़ी को याद करते हुए लिखा कि दोनों के साथ काम करने के दौरान किसी बड़े विवाद की बात सामने नहीं आई और उनके प्रशंसकों के बीच यह जोड़ी खास लोकप्रिय थी।
उनकी जोड़ी की खासियत यह थी कि वह केवल रोमांटिक फिल्मों तक सीमित नहीं थी। दोनों ने एक्शन, ड्रामा और कमर्शियल सिनेमा के अलग-अलग रंगों में साथ काम किया।
रंजिता के करियर में एक और महत्वपूर्ण फिल्म थी 'सत्ते पे सत्ता'।
1982 में रिलीज हुई इस फिल्म में अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे और रंजिता ने भी महत्वपूर्ण किरदार निभाया। उनके किरदार का नाम सीमा था।
अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार के साथ काम करना उस दौर में किसी भी अभिनेत्री के लिए करियर का बड़ा पड़ाव था।
रंजिता ने इस फिल्म में अपनी जगह बनाई और उनके करियर में एक और बड़ी फिल्म जुड़ गई।
रंजिता का फिल्मी सफर कई बड़े कलाकारों के साथ जुड़ा रहा।
उन्होंने ऋषि कपूर के साथ 'लैला मजनू' में डेब्यू किया।
सचिन के साथ 'अंखियों के झरोखों से' उनकी सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हुई।
संजीव कुमार के साथ 'पति पत्नी और वो' में उन्होंने अलग तरह की भूमिका निभाई।
मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी लंबी और चर्चित ऑन-स्क्रीन साझेदारी रही।
इसके अलावा उन्होंने अमिताभ बच्चन, राज बब्बर, राज किरण, दीपक पराशर, विनोद मेहरा और अमोल पालेकर जैसे कलाकारों के साथ भी काम किया।
उनके करियर की यही विविधता बताती है कि वह सिर्फ एक रोमांटिक अभिनेत्री नहीं थीं।
1980 के दशक में रंजिता लगातार फिल्मों में नजर आती रहीं।
'आप तो ऐसे न थे', 'ख्वाब', 'क्रोधी', 'लापरवाह', 'सत्ते पे सत्ता', 'तेरी कसम', 'हाथकड़ी', 'हादसा', 'मेहंदी', 'मुझे इंसाफ चाहिए', 'बाजी', 'घर एक मंदिर' और 'राज तिलक' जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदार देखने को मिले।
उनका करियर केवल एक दशक की रोमांटिक नायिका की कहानी नहीं था।
उन्होंने बदलते हिंदी सिनेमा के साथ अपने किरदारों को भी बदला।
1983 की 'तेरी कसम' के लिए भी उन्हें Filmfare में Best Supporting Actress का नामांकन मिला।
इस तरह उनके करियर में कुल तीन Filmfare नामांकन दर्ज हैं—'अंखियों के झरोखों से' के लिए Best Actress, 'पति पत्नी और वो' के लिए Best Supporting Actress और 'तेरी कसम' के लिए Best Supporting Actress। उपलब्ध रिकॉर्ड में इन नामांकनों में जीत दर्ज नहीं है।
हर फिल्मी करियर हमेशा एक ही गति से नहीं चलता।
रंजिता ने 1980 के दशक में काफी काम किया, लेकिन 1990 के आसपास उनका फिल्मी सफर काफी हद तक थम गया।
'गुनाहों का देवता' (1990) को उनके उस दौर की अंतिम फिल्मों में गिना जाता है। इसके बाद उन्होंने टेलीविजन पर भी काम किया और 'अजूबे', 'साहिल', 'घुटन' और 'नूरजहां' जैसे प्रोजेक्ट्स से जुड़ीं।
फिर उन्होंने अभिनय से एक लंबा ब्रेक लिया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—रंजिता का फिल्मों से दूर होना किसी एक घटना से जोड़ना सही नहीं होगा। अलग-अलग रिपोर्टों में उनके करियर ब्रेक के अलग संदर्भ मिलते हैं, जबकि बाद में खुद रंजिता ने अपने जीवन में अमेरिका जाने और बेटे की पढ़ाई के कारण लंबे समय तक बाहर रहने की बात कही।
रंजिता कौर ने बाद में राज मसंद से शादी की।
उनका एक बेटा है, जिसका नाम सार्वजनिक स्रोतों में स्काई बताया गया है। शादी के बाद रंजिता लंबे समय तक अमेरिका में रहीं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक परिवार का अमेरिका में कारोबार भी रहा।
2018 में Filmfare ने भी लिखा था कि वह अमेरिका में परिवार के साथ रहते हुए वर्जीनिया में 7-Eleven convenience stores के कारोबार से जुड़ी थीं।
बाद में परिवार पुणे में भी रहा।
2020 में दिए एक इंटरव्यू में रंजिता ने बताया था कि उनका परिवार बेटे की पढ़ाई के लिए अमेरिका गया था और बाद में वे लोग पुणे वापस आकर बस गए।
रंजिता के निजी जीवन से जुड़ी सबसे ज्यादा चर्चित बातों में उनका नाम अभिनेता-निर्देशक अकबर खान के साथ जुड़ना रहा है।
उपलब्ध जीवनी स्रोतों में दोनों की सगाई का उल्लेख मिलता है। IMDb के जीवनी पृष्ठ पर भी उन्हें अकबर खान से engaged बताया गया है।
अकबर खान ने बाद के एक इंटरव्यू में रंजिता के साथ अपनी पुरानी तस्वीरों और उस दौर की यादों को साझा किया था।
लेकिन इस रिश्ते के बारे में इंटरनेट पर मौजूद कई सनसनीखेज कहानियों को तथ्य मानना उचित नहीं है। इसलिए उनके रिश्ते के बारे में वही बात कहना सुरक्षित है जिसका सार्वजनिक स्रोतों में पर्याप्त आधार मिलता है।
बाद में रंजिता ने राज मसंद से विवाह किया।
रंजिता कौर की निजी जिंदगी से जुड़ी एक संवेदनशील घटना 2019 में सामने आई थी।
उनके पति राज मसंद ने पुणे पुलिस की वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन के माध्यम से रंजिता और उनके बेटे के खिलाफ शिकायत की थी। पुलिस के अनुसार शिकायत में शारीरिक दुर्व्यवहार के आरोप लगाए गए थे। बाद में पुलिस की काउंसलिंग के बाद परिवार में सुलह हुई और शिकायत वापस ले ली गई।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह मामला शिकायत और उसके बाद हुए पारिवारिक समझौते तक सीमित रहा; इसे किसी अंतिम न्यायिक दोषसिद्धि के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
इस घटना के बाद रंजिता ने भी मीडिया में इसे पारिवारिक और कारोबारी विवाद से जुड़ा मामला बताया था।
किसी जीवित व्यक्ति की निजी जिंदगी के बारे में लिखते समय इस घटना को सनसनी में बदलने के बजाय उपलब्ध रिकॉर्ड तक सीमित रहना ही उचित है।
इंटरनेट पर रंजिता कौर की संपत्ति और नेट वर्थ को लेकर कई आंकड़े दिखाई देते हैं, लेकिन विश्वसनीय प्राथमिक स्रोत या आधिकारिक वित्तीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं जिनके आधार पर उनकी निश्चित नेट वर्थ बताई जा सके।
इसलिए लाखों या करोड़ों रुपये का कोई निश्चित आंकड़ा लिखना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
इतना जरूर सार्वजनिक रिपोर्टों से सामने आता है कि उनके परिवार का अमेरिका में convenience-store business रहा है और वह लंबे समय तक इस पारिवारिक कारोबार से जुड़ी रही हैं।
इसलिए उनकी लाइफस्टाइल या संपत्ति को लेकर अनुमान लगाने के बजाय उपलब्ध जानकारी तक सीमित रहना बेहतर है।
रंजिता की फिल्मी शुरुआत किसी छोटे रोल से नहीं हुई थी।
उनकी पहली फिल्म 'लैला मजनू' थी और उनके सामने ऋषि कपूर थे। एक नई अभिनेत्री के लिए यह बहुत बड़ा अवसर था।
70 के दशक में हर अभिनेत्री के लिए फिल्म संस्थान से औपचारिक अभिनय प्रशिक्षण लेना आम बात नहीं थी। रंजिता ने FTII से प्रशिक्षण लिया और वहीं से उनकी अभिनय यात्रा को मजबूत आधार मिला।
मिथुन चक्रवर्ती और रंजिता दोनों FTII से जुड़े थे। बाद के वर्षों में भी दोनों की दोस्ती की यादें सामने आती रही हैं। मिथुन ने एक पुराने संस्मरण में पुणे में रंजिता से मुलाकात और FTII लौटने की भावुक याद साझा की थी।
1978 रंजिता के करियर का बेहद महत्वपूर्ण साल था।
इसी साल 'अंखियों के झरोखों से' और 'पति पत्नी और वो' जैसी फिल्मों में वह नजर आईं। दोनों फिल्मों की शैली और उनके किरदार एक-दूसरे से काफी अलग थे।
रंजिता ने 2020 में बताया था कि परिवार बेटे की पढ़ाई के लिए अमेरिका गया था और बाद में पुणे लौट आया। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक बाहर रहने की वजह से फिल्म इंडस्ट्री से उनका संपर्क कम हो गया था।
यह उनके करियर ब्रेक को समझने का एक महत्वपूर्ण संदर्भ है।
लंबे अंतराल के बाद रंजिता ने 'अनजाने: द अननोन' से फिल्मों में वापसी की। यह फिल्म 2005 में आई थी।
इसके बाद वह 'जाना पहचाना' में नजर आईं, जिसमें उन्होंने सचिन के साथ दोबारा काम किया। यह फिल्म 'अंखियों के झरोखों से' की कहानी से जुड़ी sequel के रूप में सामने आई थी।
यह वापसी अपने आप में भावुक थी।
जिस अभिनेत्री और अभिनेता ने दशकों पहले पर्दे पर एक यादगार प्रेम कहानी को जिया था, वे वर्षों बाद फिर एक साथ दिखाई दिए।
इसके बाद रंजिता 'जिंदगी तेरे नाम' में मिथुन चक्रवर्ती के साथ भी नजर आईं। फिल्म की शूटिंग पहले हुई थी और इसका रिलीज लंबे समय बाद 2012 में हुआ।
उपलब्ध फिल्मोग्राफी के अनुसार 2012 की 'जिंदगी तेरे नाम' उनकी आखिरी रिलीज्ड फिल्म मानी जाती है।
रंजिता कौर ने लंबे समय से फिल्मों में नियमित काम नहीं किया है।
2020 में दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह अमेरिका में बेटे की पढ़ाई के दौरान लंबे समय तक रहीं और बाद में परिवार के साथ पुणे लौट आईं।
आज उनके बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारी सामने आती है। यही शायद उस पीढ़ी के कई कलाकारों की खासियत भी थी—जब कैमरा उनसे दूर हुआ तो उन्होंने अपनी निजी जिंदगी को सुर्खियों से दूर रखना चुना।
उनकी उपलब्ध फिल्मोग्राफी में 2012 के बाद कोई नई प्रमुख अभिनय फिल्म दर्ज नहीं है।
इसलिए 2026 में उनकी किसी नई फिल्म, नए प्रोजेक्ट या किसी निश्चित पेशेवर गतिविधि का दावा बिना ताजा आधिकारिक पुष्टि के करना उचित नहीं होगा।
रंजिता कौर का करियर उस दौर से निकला जब बॉलीवुड में स्टार बनने के लिए केवल ग्लैमर पर्याप्त नहीं था। एक अभिनेत्री को दर्शकों के साथ भावनात्मक रिश्ता बनाना पड़ता था।
'लैला मजनू' की लैला हो या 'अंखियों के झरोखों से' की लिली—रंजिता ने अपने किरदारों में एक ऐसी सादगी दिखाई जो आज भी उनके प्रशंसकों को उनकी तरफ खींचती है।
उन्होंने संजीव कुमार के साथ अलग तरह की कहानी की, मिथुन चक्रवर्ती के साथ कई कमर्शियल फिल्मों में नजर आईं और अमिताभ बच्चन के साथ 'सत्ते पे सत्ता' जैसी फिल्म का हिस्सा बनीं।
उनके करियर में पुरस्कारों की लंबी सूची भले न हो, लेकिन उनके नाम के साथ जुड़ी फिल्मों की सूची हिंदी सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को याद दिलाती है। शायद किसी अभिनेता की असली सफलता यही होती है।
जब दशकों बाद भी उसका चेहरा किसी पुराने गीत के साथ अचानक टीवी स्क्रीन पर दिखाई दे और दर्शक कह उठे—“अरे, ये तो रंजिता हैं…”
रंजिता कौर की कहानी एक ऐसी अभिनेत्री की कहानी है जिसने बहुत कम उम्र में फिल्मों की दुनिया में कदम रखा, पहली ही फिल्म से पहचान बनाई और कुछ ही वर्षों में हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं।
उन्होंने प्यार किया, दर्द निभाया, कॉमेडी और ड्रामा का हिस्सा बनीं और बड़े सितारों के साथ स्क्रीन साझा की। फिर जिंदगी ने उन्हें फिल्मों से दूर कर दिया। लेकिन फिल्मों से दूरी का मतलब यादों से दूरी नहीं होता।
आज भी जब 'लैला मजनू' का नाम लिया जाता है, 'अंखियों के झरोखों से' के गीत सुनाई देते हैं या 70-80 के दशक के हिंदी सिनेमा की बात होती है, रंजिता कौर का चेहरा उस दौर की तस्वीर में दिखाई देता है।
उनकी कहानी यह भी बताती है कि हर कलाकार की जिंदगी का अर्थ केवल कैमरे के सामने बिताए वर्षों से नहीं होता। कभी-कभी किसी कलाकार की सबसे बड़ी विरासत उसकी छोड़ी हुई यादें होती हैं।
और रंजिता कौर ने हिंदी सिनेमा को ऐसी ही कई यादें दी हैं—मासूमियत की, मोहब्बत की और उस दौर की, जब फिल्मों में भावनाएं सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं बल्कि दर्शकों के दिल की आवाज हुआ करती थीं।
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