राम्या कृष्णन की अनसुनी कहानी: नीलांबरी से शिवगामी बनने तक का सफर
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| स्टंट फिल्मों से बनीं सुपरस्टार! |
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी मुस्कान, अदाकारी और स्क्रीन प्रेजेंस समय के साथ और भी चमकदार होती चली जाती है। मुमताज़ उन्हीं चुनिंदा अभिनेत्रियों में से एक हैं। एक समय था जब उन्हें फिल्मों में केवल छोटे-छोटे रोल या स्टंट फिल्मों की नायिका के रूप में देखा जाता था। लेकिन यही अभिनेत्री आगे चलकर 1960 और 1970 के दशक की सबसे सफल, सबसे ज्यादा फीस लेने वाली और सबसे लोकप्रिय स्टार बन गई।
मुमताज़ की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस लड़की की कहानी है जिसने सीमित अवसरों, संघर्ष और लगातार अस्वीकृतियों के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मेहनत, आत्मविश्वास और अभिनय क्षमता से साबित किया कि प्रतिभा को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी आज भी बॉलीवुड की सबसे यादगार जोड़ियों में गिनी जाती है। वहीं दो रास्ते, खिलौना, बंधन, अपना देश, सच्चा झूठा और रोटी जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार के मुकाम पर पहुंचा दिया।
आज भी जब हिंदी सिनेमा की महान अभिनेत्रियों की चर्चा होती है, तो मुमताज़ का नाम सम्मान और प्रेम के साथ लिया जाता है।
मुमताज़ का जन्म 31 जुलाई 1947 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में हुआ था। उनका पूरा नाम मुमताज़ अस्करी (Mumtaz Askari) है।
उनका परिवार पहले से ही फिल्मी दुनिया से जुड़ा हुआ था। उनकी मां नाज़ (Naz) फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट थीं, जबकि उनकी मौसी नीलोफर भी फिल्मों में काम कर चुकी थीं। हालांकि परिवार का फिल्मी संबंध होने के बावजूद आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी।
मुमताज़ का बचपन किसी स्टार किड की तरह नहीं बीता। उन्हें बचपन से ही यह समझ आ गया था कि फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाना आसान नहीं होगा। परिवार की आर्थिक परिस्थितियों ने भी उन्हें कम उम्र में काम करने के लिए प्रेरित किया।
यही कारण था कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में फिल्मों के सेट पर जाना शुरू कर दिया। शुरुआत में उन्हें भीड़ वाले दृश्यों और छोटे-छोटे किरदार मिलते थे। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही लड़की आगे चलकर हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्रियों में गिनी जाएगी।
मुमताज़ ने बहुत कम उम्र में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्मी दुनिया में कदम रखा। शुरुआती वर्षों में उन्होंने कई फिल्मों में बिना खास पहचान वाले छोटे किरदार निभाए।
उस दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पहले से स्थापित अभिनेत्रियों का दबदबा था। नई लड़कियों के लिए मुख्य भूमिकाएं पाना बेहद कठिन माना जाता था।
कई बार उन्हें सिर्फ इसलिए फिल्मों से बाहर कर दिया जाता था क्योंकि निर्माता-निर्देशकों को लगता था कि उनकी लंबाई पारंपरिक हीरोइनों जितनी नहीं है। लेकिन मुमताज़ ने इन बातों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
उन्होंने हर छोटे अवसर को सीखने का माध्यम बनाया। कैमरे के सामने सहज रहना, भाव-भंगिमाओं पर काम करना और दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचना—ये सभी गुण उन्होंने धीरे-धीरे विकसित किए।
1950 के दशक के आखिर और 1960 के शुरुआती वर्षों में मुमताज़ को फिल्मों में छोटे रोल मिलने लगे। हालांकि इन भूमिकाओं से उन्हें कोई बड़ी पहचान नहीं मिली।
उस समय फिल्म उद्योग में मुख्य अभिनेत्रियों के लिए प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक थी। ऐसे में मुमताज़ ने वह रास्ता चुना जिसे कई स्थापित अभिनेत्रियां अपनाने से बचती थीं—स्टंट और एक्शन फिल्में।
उस दौर में अभिनेता दारा सिंह के साथ बनने वाली एक्शन फिल्मों की बड़ी मांग थी। इन फिल्मों में मुमताज़ को मुख्य अभिनेत्री के रूप में काम करने का मौका मिला।
1960 के दशक में मुमताज़ और दारा सिंह की जोड़ी ने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई।
दोनों ने साथ मिलकर कई सफल स्टंट और मनोरंजक फिल्मों में काम किया। इनमें फौलाद, वीर भीमसेन, सिकंदर-ए-आजम, राका और अन्य कई फिल्में शामिल थीं।
हालांकि उस समय मुख्यधारा के फिल्म समीक्षक इन फिल्मों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इनका अच्छा प्रदर्शन होता था। छोटे शहरों और कस्बों में इन फिल्मों की जबरदस्त लोकप्रियता थी।
बाद के वर्षों में स्वयं दारा सिंह ने भी कई इंटरव्यू में स्वीकार किया कि मुमताज़ बेहद मेहनती, अनुशासित और कैमरे के सामने स्वाभाविक अभिनय करने वाली अभिनेत्री थीं।
स्टंट फिल्मों की लोकप्रियता के बावजूद मुख्यधारा के कई बड़े निर्माता-निर्देशक मुमताज़ को गंभीर अभिनेत्री के रूप में नहीं देखते थे।
उन्हें अक्सर यह सुनना पड़ता था कि वह सिर्फ एक्शन फिल्मों के लिए उपयुक्त हैं। बड़े बैनर की फिल्मों में मुख्य भूमिका पाने का उनका सपना बार-बार अधूरा रह जाता था।
यह उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर था।
लेकिन मुमताज़ ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार काम किया, अपने अभिनय को बेहतर बनाया और हर फिल्म में खुद को साबित करने की कोशिश जारी रखी।
यही धैर्य आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
1960 के दशक के उत्तरार्ध में हिंदी सिनेमा का दौर बदलने लगा। दर्शक नई कहानियों और नए चेहरों को पसंद करने लगे थे।
इसी समय कुछ फिल्मकारों की नजर मुमताज़ की अभिनय क्षमता पर पड़ी। उन्हें ऐसे किरदार मिलने लगे जिनमें सिर्फ ग्लैमर नहीं, बल्कि अभिनय की भी गुंजाइश थी।
यहीं से उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ।
जल्द ही उन्हें हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बनने वाले अभिनेता राजेश खन्ना के साथ काम करने का अवसर मिला। यह जोड़ी आगे चलकर बॉलीवुड के इतिहास की सबसे सफल जोड़ियों में शामिल हुई और मुमताज़ की किस्मत हमेशा के लिए बदल गई।
मुमताज़ के करियर का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्हें मुख्यधारा की फिल्मों में ऐसे किरदार मिलने लगे जिनमें अभिनय के साथ-साथ भावनाओं को भी जगह दी गई। वर्षों तक स्टंट फिल्मों में काम करने के बाद वह यह साबित करना चाहती थीं कि वह सिर्फ एक्शन फिल्मों की नायिका नहीं, बल्कि हर तरह के किरदार निभाने में सक्षम अभिनेत्री हैं।
उनकी यही मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी। फिल्म निर्माता और निर्देशक उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, कैमरे के सामने आत्मविश्वास और सहज अभिनय से प्रभावित होने लगे। दर्शकों ने भी उन्हें खुले दिल से अपनाना शुरू कर दिया।
यहीं से मुमताज़ का सफर एक संघर्षरत अभिनेत्री से हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय स्टार बनने की ओर बढ़ गया।
अगर हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार ऑन-स्क्रीन जोड़ियों की बात हो, तो राजेश खन्ना और मुमताज़ का नाम हमेशा शीर्ष पर लिया जाता है।
1969 में रिलीज़ हुई 'दो रास्ते' ने इस जोड़ी को नई पहचान दी। फिल्म की कहानी, संगीत और दोनों कलाकारों की शानदार केमिस्ट्री दर्शकों को इतनी पसंद आई कि फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल हो गई।
इसके बाद दोनों ने एक के बाद एक कई सफल फिल्मों में साथ काम किया।
इनमें प्रमुख हैं—
इन फिल्मों ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि राजेश खन्ना और मुमताज़ की जोड़ी को दर्शकों का सबसे पसंदीदा जोड़ा बना दिया।
फिल्म इतिहासकारों के अनुसार, दोनों कलाकारों की सहज केमिस्ट्री और भावनात्मक अभिनय उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत थी।
साल 1970 मुमताज़ के करियर का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ।
इसी वर्ष रिलीज़ हुई फिल्म 'खिलौना' में उन्होंने एक ऐसी महिला का चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया, जो परिस्थितियों से जूझते हुए एक मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाने की कोशिश करती है। यह किरदार मुमताज़ का अब तक के सभी रोल्स से बिल्कुल अलग था। मुमताज़ ने इस भूमिका में जिस परिपक्वता और संवेदनशीलता के साथ अभिनय किया, उसकी समीक्षकों ने भी खुलकर सराहना की।
इस फ़िल्म में मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति का किरदार संजीव कुमार ने किया था। साथ ही जितेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा, जगदीप और दुर्गा खोटे जैसे दिग्गज कलाकार भी इस फ़िल्म में थे।
इस फिल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (Best Actress) का पुरस्कार मिला। यह सम्मान उनके करियर का बड़ा मुकाम साबित हुआ और उन्होंने यह साबित कर दिया कि वह सिर्फ लोकप्रिय स्टार ही नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेत्री भी हैं।
'खिलौना' की सफलता के बाद मुमताज़ के पास बड़े बैनरों की फिल्मों की लाइन लग गई।
1970 के दशक की शुरुआत में वह बॉलीवुड की सबसे व्यस्त अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं।
उनकी फिल्मों में रोमांस था, परिवार की भावनाएं थीं, कॉमेडी थी और मजबूत अभिनय भी। यही वजह थी कि हर वर्ग के दर्शक उन्हें पसंद करते थे।
उनकी मुस्कान, संवाद अदायगी और चुलबुला अंदाज उनकी पहचान बन गया।
मुमताज़ ने अपने दौर के लगभग सभी बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया।
इनमें शामिल हैं—
हर अभिनेता के साथ उनकी जोड़ी अलग अंदाज में पसंद की गई।
वह उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में थीं जो रोमांटिक फिल्मों के साथ-साथ पारिवारिक, सामाजिक और हल्की-फुल्की मनोरंजक फिल्मों में भी समान सहजता से अभिनय करती थीं।
1970 के दशक में हिंदी फिल्मों में ग्लैमर का महत्व बढ़ रहा था, लेकिन मुमताज़ ने सिर्फ अपनी खूबसूरती के दम पर सफलता हासिल नहीं की।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—
यही कारण था कि उनकी फिल्में सिर्फ गानों या स्टारकास्ट की वजह से नहीं, बल्कि उनके अभिनय की वजह से भी याद की जाती हैं।
मुमताज़ सिर्फ अभिनय ही नहीं, बल्कि अपने फैशन सेंस के लिए भी जानी गईं।
उनकी पहनी हुई साड़ियों का खास अंदाज बाद में "मुमताज़ स्टाइल साड़ी ड्रेप" के नाम से लोकप्रिय हुआ।
आज भी कई फैशन डिजाइनर और बॉलीवुड कलाकार पुराने दौर की थीम पर इसी स्टाइल को दोहराते नजर आते हैं।
इसके अलावा उनके हेयरस्टाइल, मेकअप और पारंपरिक भारतीय परिधानों ने भी उस दौर की युवा पीढ़ी को काफी प्रभावित किया।
मुमताज़ के शानदार फिल्मी सफर को कई पुरस्कारों और सम्मानों से भी सराहा गया।
सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हैं—
हालांकि उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि हमेशा दर्शकों का प्यार ही माना जाता है।
स्टारडम के चरम पर पहुंचने के बाद भी मुमताज़ अपने व्यवहार के लिए जानी जाती थीं। फिल्म इंडस्ट्री के कई कलाकारों ने वर्षों बाद दिए गए इंटरव्यू में उन्हें मेहनती, समय की पाबंद और सहयोगी अभिनेत्री बताया। उन्होंने अपने करियर में कभी भी सफलता को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। यही सादगी उन्हें अपने समकालीन कलाकारों से अलग बनाती है।
1970 के दशक के मध्य तक मुमताज़ हिंदी सिनेमा की सबसे सफल अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगी थीं। उस समय उनके पास लगातार बड़ी फिल्मों के प्रस्ताव आ रहे थे और उनका करियर अपने शिखर पर था।
इसी दौरान उनकी मुलाकात लंदन स्थित भारतीय मूल के उद्योगपति मयूर माधवानी (Mayur Madhvani) से हुई। दोनों के बीच दोस्ती बढ़ी और बाद में यह रिश्ता शादी तक पहुंचा।
साल 1974 में मुमताज़ और मयूर माधवानी ने विवाह किया।
शादी के बाद उन्होंने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली और अपने परिवार को प्राथमिकता दी। उस दौर में जब कई अभिनेत्रियां शादी के बाद भी लगातार काम कर रही थीं, मुमताज़ ने अपने जीवन का नया अध्याय परिवार के साथ शुरू करने का फैसला किया।
उनकी दो बेटियां हैं, जिनमें नताशा माधवानी की शादी अभिनेता फ़रदीन खान से हुई। इस रिश्ते के बाद मुमताज़ और दिवंगत अभिनेता फ़िरोज़ खान का परिवार भी रिश्तेदारी में जुड़ गया।
शादी के बाद मुमताज़ लंबे समय तक लंदन में रहीं। हालांकि उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली, लेकिन दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई।
1980 और 1990 के दशक में जब भी उनकी पुरानी फिल्में टीवी पर प्रसारित होती थीं, दर्शकों का वही प्यार देखने को मिलता था।
1990 में उन्होंने फिल्म 'आंधियां' के जरिए वापसी की कोशिश की, लेकिन यह फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में सक्रिय रूप से काम न करने का निर्णय लिया।
इसके बावजूद मुमताज़ समय-समय पर फिल्मी कार्यक्रमों, पुरस्कार समारोहों और विशेष आयोजनों में नजर आती रही हैं।
मुमताज़ के जीवन का सबसे कठिन दौर तब आया, जब उन्हें अपेक्षाकृत कम उम्र में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला।
यह खबर उनके परिवार और प्रशंसकों के लिए बेहद चिंताजनक थी।
उन्होंने इलाज कराया और लंबे समय तक इस बीमारी से संघर्ष किया। कठिन उपचार और मानसिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
इलाज के बाद मुमताज़ पूरी तरह स्वस्थ हुईं और उन्होंने कई इंटरव्यू में सकारात्मक सोच, अनुशासन और परिवार के सहयोग को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया।
आज उनकी यह कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है कि गंभीर बीमारी के सामने भी साहस और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
अपने लंबे फिल्मी करियर में मुमताज़ का नाम बड़े विवादों से लगभग हमेशा दूर रहा।
हालांकि समय-समय पर उनकी निजी जिंदगी को लेकर मीडिया में कई तरह की खबरें सामने आईं, लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से हमेशा संयमित और सम्मानजनक रवैया अपनाया।
कभी-कभी उनके स्वास्थ्य, फिल्मों में वापसी या पुराने सह-कलाकारों को लेकर चर्चाएं होती रहीं, लेकिन इनमें से अधिकांश सामान्य मनोरंजन समाचारों का हिस्सा थीं।
मुमताज़ ने हमेशा अपने काम और परिवार को प्राथमिकता दी और यही उनकी सार्वजनिक छवि की सबसे बड़ी पहचान बनी।
मुमताज़ ने अपने सक्रिय फिल्मी करियर के दौरान बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल की थी। शादी के बाद वह लंबे समय तक अपने परिवार के साथ विदेश में रहीं।
हालांकि उनकी कुल संपत्ति (Net Worth) को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में अलग-अलग अनुमान दिए जाते हैं और इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी निश्चित राशि का दावा करना उचित नहीं होगा।
वह आज भी एक आरामदायक और निजी जीवन जीती हैं। समय-समय पर सोशल मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी तस्वीरें सामने आती रहती हैं, जिनमें उनका सादगीपूर्ण और गरिमामय व्यक्तित्व दिखाई देता है।
जब मुख्यधारा के निर्माता उन्हें बड़ी फिल्मों के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे, तब दारा सिंह के साथ की गई फिल्मों ने मुमताज़ को लगातार काम और पहचान दिलाई। यही अनुभव आगे चलकर उनके बड़े करियर की मजबूत नींव बना।
राजेश खन्ना और मुमताज़ की जोड़ी को आज भी बॉलीवुड की सबसे सफल जोड़ियों में गिना जाता है। दोनों की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया और दर्शकों ने उनकी केमिस्ट्री को खूब पसंद किया।
फिल्म ब्रह्मचारी के लोकप्रिय गीत "आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे" में मुमताज़ द्वारा पहनी गई बॉडी-हगिंग ड्रेपिंग स्टाइल वाली नारंगी साड़ी फैशन इतिहास का हिस्सा बन गई। बाद में इसे "मुमताज़ साड़ी स्टाइल" के नाम से जाना जाने लगा और यह दशकों तक लोकप्रिय रही।
मुमताज़ का शीर्ष फिल्मी करियर अपेक्षाकृत कम वर्षों का रहा, लेकिन इसी अवधि में उन्होंने ऐसी लोकप्रियता हासिल की जिसे पाने का सपना कई कलाकार पूरी जिंदगी देखते हैं।
नई पीढ़ी के दर्शक भी ओटीटी, टेलीविजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से उनकी फिल्मों को देख रहे हैं। यही वजह है कि मुमताज़ का नाम आज भी हिंदी सिनेमा की सदाबहार अभिनेत्रियों में लिया जाता है।
फिल्मों से सक्रिय दूरी बनाने के बावजूद मुमताज़ आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे सम्मानित और लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। वह लंबे समय से अपने परिवार के साथ मुख्य रूप से लंदन में रहती हैं और समय-समय पर भारत भी आती रहती हैं।
बीते कुछ वर्षों में मुमताज़ कई फिल्मी कार्यक्रमों, पुरस्कार समारोहों और अपने समकालीन कलाकारों से मुलाकात के दौरान चर्चा में रही हैं। उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होते हैं, जिन्हें देखकर उनके प्रशंसक पुरानी यादों में खो जाते हैं।
मुमताज़ समय-समय पर इंटरव्यू भी देती हैं, जिनमें वह अपने फिल्मी सफर, पुराने दौर की शूटिंग, सह-कलाकारों और हिंदी सिनेमा में आए बदलावों पर खुलकर बात करती हैं।
उनका व्यक्तित्व आज भी उतना ही आत्मविश्वासी और गरिमामय नजर आता है, जैसा उनके सुनहरे दौर में था।
हर दौर में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो सिर्फ सफल नहीं होते बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। मुमताज़ उन्हीं कलाकारों में शामिल हैं।
उन्होंने यह साबित किया कि यदि प्रतिभा, मेहनत और धैर्य हो तो शुरुआती असफलताएं किसी की मंजिल तय नहीं करतीं।
स्टंट फिल्मों से शुरुआत करने वाली अभिनेत्री का हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी स्टार बनना अपने आप में प्रेरणादायक कहानी है।
उनकी फिल्मों के गीत आज भी रेडियो, टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उतने ही पसंद किए जाते हैं। उनकी अदाकारी, मुस्कान और स्वाभाविक अभिनय ने उन्हें सदाबहार अभिनेत्री बना दिया है।
मुमताज़ की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती। एक साधारण पृष्ठभूमि से आई लड़की, जिसने छोटे-छोटे किरदारों से शुरुआत की, स्टंट फिल्मों में अपनी पहचान बनाई और फिर मेहनत के दम पर बॉलीवुड की सबसे सफल अभिनेत्रियों में शामिल हो गई।
उन्होंने अपने करियर में यह साबित किया कि सफलता केवल खूबसूरती से नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन और अभिनय क्षमता से मिलती है।
शादी के बाद उन्होंने परिवार को प्राथमिकता दी, गंभीर बीमारी का साहस के साथ सामना किया और हमेशा गरिमा के साथ अपना जीवन जिया। यही कारण है कि मुमताज़ सिर्फ एक सफल अभिनेत्री नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच की मिसाल भी हैं।
आज भी उनकी फिल्में नई पीढ़ी को आकर्षित करती हैं और पुरानी पीढ़ी के लिए सुनहरे दौर की यादें ताजा कर देती हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास में मुमताज़ का नाम हमेशा उन अभिनेत्रियों में लिया जाएगा जिन्होंने अपने अभिनय, मेहनत और व्यक्तित्व से एक अमिट छाप छोड़ी।
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