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| 50 की उम्र में बने स्टार! |
कभी-कभी सिनेमा में किसी कलाकार की पहचान उसके चेहरे से नहीं, बल्कि उसकी आवाज, सादगी और कुछ यादगार पलों से बनती है। A. K. Hangal ऐसे ही कलाकार थे।
जब हिंदी फिल्मों के कई अभिनेता अपने करियर की शुरुआत जवानी में कर रहे थे, तब अवतार किशन हंगल ने करीब 50 की उम्र में फिल्मों की दुनिया में कदम रखा। उससे पहले उनकी जिंदगी दर्जी के काम, रंगमंच, सामाजिक सक्रियता और संघर्षों से भरी हुई थी।
लेकिन फिल्मों में आने के बाद उन्होंने साबित कर दिया कि अभिनय की कोई उम्र नहीं होती।
‘शोले’ के रहीम चाचा के रूप में उनका वह चेहरा, वह मासूमियत और वह संवाद—“इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”—हिंदी सिनेमा की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गया।
A. K. Hangal ने पिता, चाचा, बुजुर्ग, पड़ोसी, शिक्षक और आम आदमी जैसे किरदारों को इस तरह निभाया कि वे पर्दे पर अभिनय करते हुए नहीं, बल्कि हमारे आसपास के किसी परिचित इंसान की तरह दिखाई देते थे।
करीब चार दशक लंबे फिल्मी सफर में उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। अलग-अलग स्रोतों में उनकी फिल्मों की संख्या 200 से 225 के आसपास बताई जाती है।
लेकिन A. K. Hangal की कहानी सिर्फ बॉलीवुड की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने विभाजन का दर्द देखा, जेल झेली, थिएटर किया, जिंदगी का बड़ा हिस्सा संघर्ष में बिताया और फिर हिंदी सिनेमा में एक ऐसी जगह बनाई जिसे आज भी कोई भर नहीं पाया।
A. K. Hangal का पूरा नाम अवतार किशन हंगल था। उनका जन्म 1 फरवरी 1914 को सियालकोट में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और अब पाकिस्तान में है। वे कश्मीरी पंडित परिवार से थे और उनका बचपन तथा युवावस्था पेशावर में बीती।
उनके पिता पंडित हरि किशन हंगल सरकारी नौकरी में थे, जबकि उनकी मां का नाम रागिया हुंडू बताया जाता है। बचपन से ही उनके जीवन में कला और सामाजिक चेतना दोनों मौजूद थे।
लेकिन शायद उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह युवक आगे चलकर हिंदी सिनेमा का ऐसा चरित्र अभिनेता बनेगा, जिसकी एक छोटी-सी भूमिका भी दर्शकों को याद रह जाएगी।
A. K. Hangal का अभिनय से रिश्ता फिल्मों से बहुत पहले शुरू हो गया था।
पेशावर में रहते हुए वे थिएटर की ओर आकर्षित हुए। 1936 में उन्होंने श्री संगीत प्रिया मंडल नाम के थिएटर समूह से जुड़कर मंच पर अभिनय करना शुरू किया। 1946 तक उन्होंने अविभाजित भारत में कई नाटकों में काम किया।
उनके लिए थिएटर सिर्फ मनोरंजन नहीं था। यह अभिव्यक्ति का माध्यम था।
उन्होंने रंगमंच पर अभिनय की बारीकियां सीखीं और यही अनुभव आगे चलकर उनके फिल्मी अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना।
उनकी अभिनय शैली में दिखावटीपन कम और वास्तविकता ज्यादा थी। शायद यही वजह थी कि जब वे किसी फिल्म में पिता या बुजुर्ग का किरदार निभाते, तो दर्शकों को उसमें अभिनय कम और जिंदगी ज्यादा दिखाई देती थी।
फिल्मों में आने से पहले A. K. Hangal ने दर्जी के रूप में काम किया।
यह उनकी जिंदगी का एक ऐसा दौर था जिसे समझे बिना उनकी सफलता की कहानी अधूरी रह जाती है।
उनके पास शुरुआत में कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था। न वे किसी बड़े स्टार परिवार से आए थे और न ही फिल्मों में प्रवेश उनके जीवन का पहला लक्ष्य था।
India Today के अनुसार, अपनी आत्मकथा में Hangal ने लिखा था कि उन्हें शुरुआत में फिल्मों में करियर बनाने की खास महत्वाकांक्षा नहीं थी और वे थिएटर से काफी संतुष्ट थे। परिस्थितियां उन्हें फिल्मी दुनिया की ओर ले आईं।
यही बात A. K. Hangal की कहानी को दूसरे कलाकारों से अलग बनाती है।
उन्होंने सफलता को खोजने के लिए जिंदगी नहीं बदली; बल्कि जिंदगी के संघर्षों के बीच सफलता उनके पास आई।
A. K. Hangal का जीवन सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं था।
वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और मजदूर आंदोलनों तथा सामाजिक मुद्दों में भी सक्रिय रहे। भारत सरकार के ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ से संबंधित सामग्री में उन्हें स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े व्यक्ति के रूप में दर्ज किया गया है।
उनकी राजनीतिक विचारधारा वामपंथ से प्रभावित थी। इसी राजनीतिक सक्रियता के कारण उन्हें कराची में जेल भी जाना पड़ा। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार, 1947 के बाद वे लगभग दो वर्षों तक वहां कैद रहे।
यह दौर उनके जीवन का बेहद कठिन अध्याय था।
देश आजादी और विभाजन के दौर से गुजर रहा था। लाखों लोगों की तरह Hangal का जीवन भी उस राजनीतिक उथल-पुथल से बदल गया।
इसके बाद वे मुंबई आ गए।
विभाजन के बाद मुंबई उनके लिए किसी फिल्मी सपने की तरह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की तरह थी।
1949 में वे मुंबई पहुंचे। एक रिपोर्ट में उनकी आत्मकथा के हवाले से बताया गया है कि उस समय उनके पास सिर्फ 20 रुपये थे।
सोचिए—एक ऐसा व्यक्ति जिसने आगे चलकर सैकड़ों फिल्मों में काम किया, उसके मुंबई पहुंचने की कहानी किसी बड़े स्टूडियो या आलीशान कार से शुरू नहीं हुई थी।
वह एक ऐसे इंसान की कहानी थी जिसे फिर से अपनी जिंदगी बनानी थी।
मुंबई में उन्होंने थिएटर को फिर से पकड़ा और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन यानी IPTA से जुड़े। यहां उनकी मुलाकात और कामकाज का संबंध Balraj Sahni और Kaifi Azmi जैसे महत्वपूर्ण कलाकारों से रहा।
थिएटर में उनका यह अनुभव आगे चलकर हिंदी फिल्मों में उनके अभिनय की मजबूत नींव बना।
हिंदी सिनेमा में करियर शुरू करने की सामान्य उम्र उस दौर में काफी कम मानी जाती थी।
लेकिन A. K. Hangal ने इस धारणा को ही बदल दिया।
1966 में Basu Bhattacharya की फिल्म ‘तीसरी कसम’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। फिल्म में उन्हें Raj Kapoor के बड़े भाई की भूमिका के लिए लिया गया था, हालांकि उनके ज्यादातर दृश्य अंतिम फिल्म से हटा दिए गए थे।
यह किसी भी नए अभिनेता के लिए निराशाजनक शुरुआत हो सकती थी।
लेकिन Hangal रुके नहीं।
उन्होंने अगले अवसर का इंतजार किया और जल्द ही फिल्मों में नियमित रूप से दिखाई देने लगे।
उनकी उम्र भले ही नई थी, लेकिन अभिनय का अनुभव कई दशकों का था।
A. K. Hangal ने उस दौर में फिल्मों में कदम रखा जब हिंदी सिनेमा में मुख्य अभिनेता और अभिनेत्री का दबदबा था।
ऐसे समय में उनके लिए नायक बनने का सवाल ही नहीं था।
उन्हें पिता, चाचा, बुजुर्ग, शिक्षक, पड़ोसी या आम आदमी के किरदार मिलने लगे।
लेकिन Hangal ने इन भूमिकाओं को कभी छोटा नहीं माना।
यही उनका सबसे बड़ा गुण था।
वे जानते थे कि फिल्म की कहानी सिर्फ हीरो से नहीं बनती। कभी-कभी वह बूढ़ा आदमी, जो स्क्रीन पर सिर्फ कुछ मिनट दिखाई देता है, पूरी कहानी का भाव बदल सकता है।
उनकी आवाज में एक अलग तरह की सच्चाई थी। उनका चेहरा किसी बनावटी ग्लैमर का हिस्सा नहीं लगता था।
वे बिल्कुल आम इंसान जैसे दिखाई देते थे।
और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी बन गई।
1970 के दशक में A. K. Hangal का करियर तेजी से आगे बढ़ा।
‘बावर्ची’, ‘नमक हराम’, ‘गुड्डी’, ‘अभिमान’, ‘चुपा रुस्तम’, ‘नरम गरम’, ‘चितचोर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों को प्रभावित किया।
इन फिल्मों में उनका काम सिर्फ संवाद बोलने तक सीमित नहीं था।
वे अपनी मौजूदगी से सीन को विश्वसनीय बनाते थे।
उनकी आंखों और चेहरे की भाव-भंगिमा में एक ऐसा अपनापन था जो दर्शकों को तुरंत जोड़ देता था।
यही कारण है कि उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार character actors में गिना जाता है।
अगर A. K. Hangal के पूरे करियर से केवल एक किरदार चुनना हो, तो शायद सबसे पहले नाम आएगा—रहीम चाचा।
फिल्म थी ‘शोले’, और किरदार था गांव के इमाम का।
फिल्म में उनका स्क्रीन टाइम बहुत लंबा नहीं था, लेकिन उनका प्रभाव बेहद बड़ा था।
उनका बेटा इमाम की भूमिका में गांव की हिंसा का शिकार होता है। उस दर्द के बीच A. K. Hangal का किरदार जिस संयम के साथ सामने आता है, वही दृश्य आज भी दर्शकों के दिल में बसा हुआ है।
और फिर आता है वह संवाद—
“इतना सन्नाटा क्यों है भाई?”
यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं रहा।
यह भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन गया।
‘शोले’ में Amitabh Bachchan, Dharmendra, Hema Malini, Jaya Bachchan, Sanjeev Kumar और Amjad Khan जैसे कलाकारों के बीच भी A. K. Hangal अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे।
यह किसी चरित्र अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी।
A. K. Hangal ने Rajesh Khanna के साथ भी बड़ी संख्या में फिल्मों में काम किया।
उपलब्ध फिल्मोग्राफी स्रोतों के अनुसार, दोनों ने 16 फिल्मों में साथ काम किया। इनमें ‘बावर्ची’, ‘अमर दीप’, ‘आप की कसम’, ‘प्रेम बंधन’, ‘नौकरी’, ‘फिर वही रात’, ‘कुदरत’ और ‘सौतेला भाई’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
यह सहयोग हिंदी सिनेमा के उस दौर की एक खास तस्वीर पेश करता है जब Rajesh Khanna सुपरस्टार थे और Hangal पर्दे पर अक्सर परिवार या समाज के किसी महत्वपूर्ण सदस्य की भूमिका निभाते थे।
दोनों की स्क्रीन केमिस्ट्री में एक सहजता दिखाई देती थी।
उनके करियर में फिल्मों की लंबी सूची है। कुछ प्रमुख फिल्में हैं:
इनमें से कई फिल्मों में उनके किरदार कहानी के मुख्य नायक नहीं थे, लेकिन दर्शकों की याद में वे लंबे समय तक बने रहे।
A. K. Hangal को अक्सर गंभीर, परेशान या सिद्धांतवादी बुजुर्ग के किरदारों में देखा गया।
लेकिन ‘शौकीन’ में उन्होंने अपने अभिनय का दूसरा रंग भी दिखाया।
फिल्म में उन्होंने Inder Sen का किरदार निभाया और Ashok Kumar तथा Utpal Dutt जैसे कलाकारों के साथ हास्यपूर्ण परिस्थितियों में नजर आए।
यही उनकी खूबी थी—वे सिर्फ एक ही तरह के character actor नहीं थे।
गंभीर दृश्य हों या कॉमेडी, वे किरदार के स्वभाव के अनुसार खुद को ढाल लेते थे।
अपने लंबे करियर में A. K. Hangal ने हिंदी सिनेमा की कई पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम किया।
उन्होंने Raj Kapoor, Rajesh Khanna, Amitabh Bachchan, Dharmendra, Shashi Kapoor, Sanjeev Kumar, Jaya Bachchan, Hema Malini, Aamir Khan, Salman Khan और Shah Rukh Khan जैसे कलाकारों वाली फिल्मों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
उनका करियर इस मायने में खास था कि वे एक ही पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे।
उन्होंने सिनेमा के बदलते दौर को करीब से देखा।
ब्लैक एंड व्हाइट और शुरुआती रंगीन फिल्मों से लेकर 2000 के दशक के नए दौर तक उनका सफर जारी रहा।
A. K. Hangal की पत्नी का नाम Manorma Dar था। उनके बेटे का नाम Vijay Hangal था, जिन्होंने बॉलीवुड में still photographer के रूप में काम किया।
उनका निजी जीवन फिल्मी ग्लैमर से काफी दूर था।
वास्तविक जिंदगी में भी Hangal सादगी पसंद इंसान के रूप में जाने जाते थे।
उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सामान्य परिस्थितियों में गुजरा। उन्होंने अपने स्टारडम को आलीशान जीवनशैली में बदलने के बजाय अभिनय और थिएटर से जुड़े रहना पसंद किया।
A. K. Hangal के जीवन में एक बड़ा विवाद 1993 में आया।
उन्होंने अपने जन्मस्थान सियालकोट, जो अब पाकिस्तान में है, जाने के लिए वीजा के लिए आवेदन किया था। बाद में वे मुंबई स्थित पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास के Pakistan Day समारोह में शामिल हुए।
इस पर Shiv Sena की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आई और Bal Thackeray ने उन पर निशाना साधा। उनके खिलाफ फिल्मों के बहिष्कार का आह्वान हुआ और उनके पुतले जलाए जाने की खबरें भी सामने आईं।
यह उनके जीवन का बेहद कठिन दौर था।
लेकिन यह विवाद उनकी पूरी पहचान नहीं बना।
उन्होंने बाद में फिल्मों में वापसी की और फिर से अपने अभिनय से जगह बनाई।
A. K. Hangal की कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा उनके जीवन के अंतिम वर्षों से जुड़ा है।
इतनी लंबी फिल्मी यात्रा और 200 से ज्यादा फिल्मों में काम करने के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी।
2011 में उनकी आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की खबरें सामने आईं। उनके बेटे Vijay Hangal ने इलाज के खर्च को लेकर मदद की अपील की थी। इसके बाद फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने उनकी आर्थिक सहायता की।
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार Amitabh Bachchan ने उनके इलाज के लिए 5 लाख रुपये की सहायता भेजी थी। अन्य फिल्मी हस्तियों ने भी मदद की।
यह घटना हिंदी फिल्म उद्योग की एक कड़वी सच्चाई सामने लाती है—फिल्मों में दिखाई देने वाली लोकप्रियता और वास्तविक आर्थिक सुरक्षा हमेशा एक जैसी नहीं होती।
A. K. Hangal की जिंदगी इस अंतर का बेहद भावुक उदाहरण है।
A. K. Hangal की सत्यापित नेट वर्थ का कोई विश्वसनीय आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
इंटरनेट पर कई वेबसाइटें उनकी संपत्ति और नेट वर्थ को लेकर अलग-अलग रकम बताती हैं, लेकिन उनके समर्थन में ठोस प्राथमिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
इसलिए किसी निश्चित करोड़ों की रकम को उनकी नेट वर्थ बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
जो बात विश्वसनीय रूप से सामने आती है, वह यह है कि जीवन के अंतिम वर्षों में वे आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहे थे और उनके इलाज के लिए बाहरी सहायता जुटाई गई थी।
यही जानकारी उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति को समझने के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।
A. K. Hangal की लाइफस्टाइल आज के फिल्मी सितारों जैसी नहीं थी।
भारत सरकार के ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ से संबंधित प्रोफाइल में भी उन्हें सादगी और मितव्ययी जीवन जीने वाला व्यक्ति बताया गया है।
वह व्यक्ति जिसने जिंदगी में संघर्ष देखा था, उसे दिखावे की जरूरत नहीं थी।
कपड़े सिलने से लेकर थिएटर करने तक और फिल्मों में अभिनय करने तक उनका जीवन मेहनत से जुड़ा रहा।
A. K. Hangal ने उम्र को कभी अभिनय से दूर होने का कारण नहीं बनने दिया।
2012 में, जीवन के आखिरी दौर में, उन्होंने टीवी शो ‘मधुबाला – एक इश्क एक जुनून’ में भी काम किया।
India Today के अनुसार, सेट पर वे व्हीलचेयर पर पहुंचे थे और खुद भी आश्वस्त नहीं थे कि उनका शरीर शूटिंग की इजाजत देगा या नहीं। लेकिन कैमरा ऑन होते ही उनका कलाकार फिर जाग उठा।
यह प्रसंग उनके पूरे जीवन का सार लगता है।
शरीर कमजोर हो सकता था, लेकिन कलाकार अभी भी जीवित था।
A. K. Hangal के लिए अभिनय सिर्फ रोजगार नहीं था।
वे थिएटर को बेहद गंभीरता से लेते थे। उनके करीबियों के अनुसार वे उम्र के आखिरी दौर तक युवा कलाकारों और निर्देशकों को प्रोत्साहित करते रहे।
यही वजह है कि उनका प्रभाव सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था।
उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को यह समझाया कि अभिनय का मतलब केवल नायक या नायिका बनना नहीं है।
किसी कहानी में पांच मिनट की भूमिका भी अगर ईमानदारी से निभाई जाए, तो वह पूरी फिल्म की याद बन सकती है।
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को सरकार ने भी सम्मान दिया।
उन्हें 2006 में Padma Bhushan से सम्मानित किया गया। उस वर्ष के Padma Awards में उनका नाम शामिल था।
यह सम्मान उनके दशकों लंबे अभिनय सफर की महत्वपूर्ण पहचान था।
एक ऐसे अभिनेता के लिए, जिसने फिल्मी दुनिया में प्रवेश ही अपेक्षाकृत बहुत देर से किया था, यह उपलब्धि असाधारण थी।
उन्होंने यह साबित किया कि उम्र करियर का अंत नहीं, बल्कि अनुभव की शुरुआत भी हो सकती है।
फिल्मी पर्दे पर उनकी आखिरी प्रमुख उपस्थिति Shah Rukh Khan की ‘पहेली’ (2005) से जुड़ी मानी जाती है। इसके बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली, हालांकि टेलीविजन और आवाज के माध्यम से उनका जुड़ाव जारी रहा।
2012 में उन्होंने एनिमेटेड फिल्म ‘कृष्णा और कंस’ में राजा उग्रसेन के किरदार को आवाज दी थी। उसी साल टीवी पर भी नजर आए।
इस तरह उनके करियर का अंतिम अध्याय भी अभिनय से ही जुड़ा रहा।
26 अगस्त 2012 को मुंबई में A. K. Hangal का निधन हो गया।
उनकी उम्र को लेकर कुछ ऑनलाइन स्रोतों में अंतर मिलता है, लेकिन व्यापक रूप से स्वीकार की गई जन्मतिथि 1 फरवरी 1914 और निधन की तारीख 26 अगस्त 2012 है।
उनके अंतिम दिनों में स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं थीं और सांस से जुड़ी परेशानियां भी सामने आई थीं।
उनके निधन के साथ हिंदी सिनेमा ने सिर्फ एक चरित्र अभिनेता नहीं खोया।
उसने उस पीढ़ी के एक ऐसे कलाकार को खो दिया जिसने अपने अभिनय में आम भारतीय आदमी की सच्चाई को जगह दी थी।
Hangal ने फिल्मों से लगभग तीन दशक पहले ही थिएटर में अभिनय शुरू कर दिया था। 1936 से 1965 तक उनका रंगमंच से मजबूत संबंध रहा।
उन्होंने करीब 50 साल की उम्र में हिंदी फिल्मों में नियमित करियर शुरू किया।
आज के दौर में जहां कलाकार कम उम्र में डेब्यू करने की कोशिश करते हैं, वहां Hangal की कहानी एक अलग संदेश देती है।
रहीम चाचा का किरदार बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसकी भावनात्मक ताकत इतनी थी कि A. K. Hangal का नाम ‘शोले’ के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया।
उनकी Rajesh Khanna के साथ लंबी स्क्रीन साझेदारी रही और दोनों ने लगभग 16 फिल्मों में साथ काम किया।
वे स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे तथा बाद में IPTA से जुड़े। इस वजह से उनकी कला में सामाजिक चेतना का असर भी दिखाई देता था।
जब उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था, तब भी उन्होंने टीवी पर काम किया। सेट पर व्हीलचेयर से पहुंचकर कैमरे के सामने अभिनय करना उनके पेशे के प्रति समर्पण की मिसाल बन गया।
A. K. Hangal आज हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन 26 अगस्त 2012 को हुआ था।
लेकिन कुछ कलाकारों के लिए ‘निधन’ शब्द उनकी विरासत पर लागू नहीं होता।
A. K. Hangal उन कलाकारों में हैं जो अपनी फिल्मों के जरिए लगातार जीवित रहते हैं।
जब ‘शोले’ चलती है और रहीम चाचा दिखाई देते हैं, जब ‘बावर्ची’ या ‘नमक हराम’ का कोई दृश्य सामने आता है, जब कोई पुरानी फिल्म में उनकी आवाज सुनाई देती है—तब लगता है कि वह कलाकार अभी भी हमारे बीच मौजूद है।
उनकी विरासत किसी आलीशान बंगले, महंगी कार या करोड़ों की संपत्ति में नहीं थी।
उनकी विरासत थी अभिनय।
A. K. Hangal की जिंदगी को अगर एक लाइन में समेटना हो, तो शायद यही कहा जा सकता है—
उन्होंने जिंदगी में देर से शुरुआत की, लेकिन अपनी पहचान हमेशा के लिए छोड़ दी।
एक दर्जी से थिएटर कलाकार बनने तक, स्वतंत्रता आंदोलन से जेल तक, विभाजन से मुंबई की नई शुरुआत तक और फिर लगभग 50 की उम्र में फिल्मों में प्रवेश करने तक—उनकी कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं थी।
उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया, लेकिन उन्हें याद रखने के लिए सैकड़ों फिल्मों की जरूरत नहीं।
एक ‘रहीम चाचा’ ही काफी हैं।
A. K. Hangal ने हिंदी सिनेमा को यह सिखाया कि कहानी का नायक हमेशा वही नहीं होता जिसके नाम पर पोस्टर छपता है।
कभी-कभी वह कलाकार भी उतना ही बड़ा होता है, जो कुछ मिनटों के लिए स्क्रीन पर आता है, एक संवाद बोलता है और फिर चला जाता है।
लेकिन दर्शकों के दिल में हमेशा के लिए रह जाता है।
A. K. Hangal ऐसे ही कलाकार थे—सादगी से भरे, संघर्ष से तपे और अभिनय से अमर।
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