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| 50 साल का सफर! पेंटल की अनसुनी कहानी |
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी एक फिल्म के नाम से याद किया जाता है। कुछ को किसी एक किरदार से पहचान मिलती है। लेकिन पेंटल उन कलाकारों में हैं, जिनका चेहरा और अंदाज कई पीढ़ियों की फिल्मों और टीवी की यादों का हिस्सा बन चुका है।
कभी बावर्ची में गुरुजी बनकर, कभी सत्ते पे सत्ता में अपनी खास कॉमिक टाइमिंग से और कभी आहिस्ता-आहिस्ता जैसे दौर के चरित्रों में नजर आने वाले पेंटल ने हिंदी सिनेमा में सिर्फ अभिनय नहीं किया, बल्कि अपने काम के जरिए एक पूरी अभिनय परंपरा को आगे बढ़ाया।
उनका असली नाम कंवरजीत सिंह पेंटल बताया जाता है और उन्हें आमतौर पर पेंटल के नाम से जाना जाता है। उपलब्ध प्रमुख स्रोतों के अनुसार उनका जन्म 22 अगस्त 1948 को पंजाब के तरन तारन में हुआ था। हालांकि कुछ ऑनलाइन डेटाबेस में उनकी जन्मतिथि को अलग तरीके से दर्ज किया गया है, इसलिए इस लेख में व्यापक रूप से उद्धृत 22 अगस्त 1948 वाली जानकारी को आधार बनाया गया है।
आज जब फिल्मों और कलाकारों की लोकप्रियता को सोशल मीडिया फॉलोअर्स से भी मापा जाने लगा है, पेंटल का दशकों पुराना करियर इस बात की याद दिलाता है कि असली अभिनय की पहचान सिर्फ आंकड़ों से नहीं होती।
पेंटल का जन्म पंजाब के तरन तारन क्षेत्र में हुआ और उनका शुरुआती जीवन दिल्ली में बीता। उपलब्ध जीवनी संबंधी जानकारी के अनुसार उन्होंने अभिनय की औपचारिक शिक्षा फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से हासिल की।
उनके परिवार का फिल्म और कैमरे से रिश्ता पहले से था। उनके पिता गुरचरण पेंटल कैमरा और फोटोग्राफी से जुड़े हुए थे। एक स्रोत के अनुसार उनके पिता ने 8mm कैमरा खरीदा था और घर पर फिल्में बनाते थे, जिनमें युवा पेंटल भी मॉडल के रूप में दिखाई देते थे।
यानी कैमरे के सामने आने की कहानी उनके लिए मुंबई पहुंचने के बाद अचानक शुरू नहीं हुई थी। कैमरा उनके बचपन की दुनिया का भी हिस्सा रहा था।
परिवार में उनके बड़े भाई गूफी पेंटल भी अभिनय की दुनिया का जाना-पहचाना नाम बने। गूफी पेंटल को बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में शकुनि के किरदार के लिए खास तौर पर याद किया जाता है। उनका निधन 5 जून 2023 को हुआ था।
इस तरह पेंटल परिवार का हिंदी मनोरंजन जगत से रिश्ता सिर्फ एक कलाकार तक सीमित नहीं रहा।
पेंटल ने अभिनय को केवल शौक के रूप में नहीं लिया। उन्होंने इसे बाकायदा सीखा।
FTII में उनकी ट्रेनिंग ने उनके अभिनय की नींव मजबूत की। बाद में उन्होंने अभिनय की शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी काम किया। उपलब्ध स्रोतों में उन्हें FTII के अभिनय विभाग से जुड़े वरिष्ठ शिक्षक के रूप में भी दर्ज किया गया है।
यह उनके सफर का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
अक्सर दर्शक किसी अभिनेता को सिर्फ उसकी फिल्मों के जरिए जानते हैं, लेकिन पेंटल की यात्रा अभिनेता से शिक्षक तक भी जाती है। यानी उन्होंने कैमरे के सामने अभिनय करने के साथ-साथ अगली पीढ़ी के कलाकारों को अभिनय की समझ देने में भी भूमिका निभाई।
साल 1969 पेंटल के जीवन में खास था। इसी दौर में उन्होंने अभिनय के सपने को आगे बढ़ाने के लिए बॉम्बे यानी आज की मुंबई का रुख किया।
मुंबई उस समय भी हजारों सपनों का शहर थी।
यहां हर दिन नए कलाकार स्टूडियो के बाहर खड़े होते थे। किसी को एक मौका मिल जाता था और किसी को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता था।
पेंटल ने भी इसी दुनिया में अपना रास्ता बनाया।
उनके शुरुआती दौर को समझने के लिए एक दिलचस्प किस्सा सामने आता है। उपलब्ध जीवनी सामग्री के अनुसार FTII में पढ़ाई के दौरान उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई थी कि उनके पिता फीस देने में सक्षम नहीं थे। उसी समय पेंटल को संस्थान की ओर से मासिक स्टाइपेंड मिलने की खबर मिली, क्योंकि वह पहले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ छात्रों में शामिल थे।
यह घटना उनके संघर्ष और प्रतिभा दोनों को समझने में मदद करती है।
पेंटल का फिल्मी करियर 1970 के दशक में तेजी से आगे बढ़ा। उमंग (1970) और लाल पत्थर (1971) जैसी फिल्मों से उनका नाम फिल्म इंडस्ट्री में दिखाई देने लगा। मेरे अपने में भी उन्होंने काम किया, जहां वह मीना कुमारी, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और देवन वर्मा जैसे कलाकारों के साथ नजर आए।
लेकिन असली पहचान बनने का दौर 1972 के आसपास आया।
उस समय पेंटल लगातार फिल्मों में नजर आने लगे। जवानी दीवानी, बावर्ची, पिया का घर, परिचय और जंगल में मंगल जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय सहायक और कॉमिक कलाकारों की कतार में खड़ा कर दिया।
उनकी खासियत यह थी कि वह छोटे से छोटे किरदार को भी अपनी मौजूदगी से यादगार बना देते थे।
अगर पेंटल के करियर की शुरुआती बड़ी उपलब्धियों की बात की जाए तो 1972 की फिल्म बावर्ची का नाम सबसे पहले आता है।
ऋषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में राजेश खन्ना और जया भादुड़ी प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म में पेंटल ने गुरुजी का किरदार निभाया था।
बावर्ची सिर्फ एक पारिवारिक फिल्म नहीं थी। यह रिश्तों, अहंकार, घरेलू तनाव और इंसानी व्यवहार की कहानी थी।
ऐसी फिल्म में जहां हर किरदार कहानी के माहौल को बनाने में योगदान देता है, पेंटल की कॉमिक मौजूदगी भी अलग से महसूस हुई।
उनकी मेहनत का सबसे बड़ा सम्मान उन्हें अगले साल मिला।
1973 में पेंटल ने बावर्ची के लिए Filmfare Best Comic Actor का पुरस्कार जीता।
यह उस दौर में बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, क्योंकि हिंदी फिल्मों में कॉमेडी को अक्सर मुख्य अभिनय के मुकाबले कम गंभीरता से देखा जाता था।
पेंटल ने साबित किया कि कॉमेडी भी अभिनय का उतना ही कठिन और प्रभावशाली रूप है।
पेंटल ने अपने करियर में एक ही तरह के किरदार पर खुद को सीमित नहीं किया।
उन्होंने हीरा पन्ना, रोटी, खोटे सिक्के, रफू चक्कर, सत्ते पे सत्ता और कई अन्य फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।
1982 की सत्ते पे सत्ता में वह अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, अमजद खान, रंजीता, सचिन पिलगांवकर और शक्ति कपूर जैसे कलाकारों के साथ नजर आए। फिल्म में उन्होंने बुध आनंद का किरदार निभाया था।
यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक थे।
लेकिन पेंटल जैसे कलाकारों की खासियत यही थी कि बड़े स्टार के आसपास रहते हुए भी उनका व्यक्तित्व पर्दे पर खोता नहीं था।
पेंटल के करियर में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव चला मुरारी हीरो बनने रहा।
1977 में आई इस फिल्म में उन्होंने पीटर का किरदार निभाया और उनके कॉमिक अभिनय को एक बार फिर बड़ा सम्मान मिला।
1978 में पेंटल ने Filmfare Best Comic Actor का पुरस्कार जीता।
यानी पेंटल उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल रहे जिन्हें इस प्रतिष्ठित श्रेणी में एक से अधिक बार सम्मान मिला।
यह उपलब्धि उनके कॉमिक अभिनय की मजबूती का प्रमाण है।
पेंटल की कॉमेडी केवल मजाक बोलने तक सीमित नहीं थी।
उनके चेहरे के भाव, बोलने का अंदाज, बॉडी लैंग्वेज और टाइमिंग—ये सभी मिलकर उनके किरदार को बनाते थे।
उनका अभिनय अक्सर कहानी के बीच अचानक एक ऐसा हल्का पल पैदा करता था, जो दर्शक को मुस्कुराने पर मजबूर कर देता था।
यही वजह है कि उनकी भूमिका चाहे छोटी हो या बड़ी, वह पर्दे पर अपनी छाप छोड़ जाते थे।
पेंटल ने पांच दशक से अधिक लंबे करियर में हिंदी सिनेमा के कई बड़े कलाकारों के साथ काम किया।
उनकी फिल्मोग्राफी में राजेश खन्ना, जया भादुड़ी, अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, अमजद खान, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, मीना कुमारी, शक्ति कपूर, सचिन पिलगांवकर, रंजीता, देवन वर्मा, अशरानी, कादर खान जैसे कई चर्चित नाम शामिल रहे हैं।
उन्होंने सिर्फ सुपरस्टार्स के साथ स्क्रीन शेयर नहीं की, बल्कि अलग-अलग पीढ़ियों के कलाकारों के साथ काम करके अपने करियर को लंबा बनाया।
यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।
पेंटल ने टेलीविजन को भी अपने अभिनय का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया।
उन्होंने विक्रम और बेताल, जय माता की, सीआईडी, अंबर धारा, प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा, एक श्रृंगार-स्वाभिमान, पिया अलबेला, शक्ति-अस्तित्व के एहसास की और कभी कभी इत्तेफाक से जैसे टीवी प्रोजेक्ट्स में काम किया।
यानी उनका करियर सिर्फ फिल्मों की पुरानी यादों तक सीमित नहीं रहा।
वह बदलते दौर के साथ टेलीविजन पर भी सक्रिय रहे।
पेंटल की निजी जिंदगी के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी अपेक्षाकृत सीमित है और उन्होंने अपने निजी जीवन को फिल्मी चमक-दमक से काफी हद तक अलग रखा।
उपलब्ध जीवनी स्रोतों में उनकी पत्नी का नाम गीता पेंटल बताया गया है। उनके बेटे हितेन पेंटल भी अभिनेता हैं।
हितेन पेंटल ने दिल मांगे मोर और बचना ऐ हसीनों जैसी फिल्मों में काम किया है।
इस तरह अभिनय की विरासत अगली पीढ़ी तक भी पहुंची।
पेंटल के बड़े भाई गूफी पेंटल भी अभिनेता थे। गूफी की सबसे यादगार पहचान महाभारत के शकुनि से बनी।
दो भाइयों का फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में अपनी-अपनी पहचान बनाना हिंदी मनोरंजन इतिहास की दिलचस्प पारिवारिक कहानियों में से एक है।
पेंटल का नाम उन कलाकारों में नहीं रहा जिनकी निजी जिंदगी लगातार विवादों की वजह से सुर्खियों में रही हो।
उनका सार्वजनिक करियर मुख्य रूप से अभिनय, कॉमेडी और अभिनय प्रशिक्षण के लिए जाना जाता है।
इसलिए उनके बारे में अफेयर, निजी विवाद या सनसनीखेज दावों को लेकर बिना विश्वसनीय पुष्टि के कोई कहानी जोड़ना उचित नहीं होगा।
एक प्रोफेशनल बायोग्राफी में यह भी जरूरी है कि कलाकार की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए काल्पनिक विवाद न गढ़े जाएं।
2026 में पेंटल एक बार फिर चर्चा में आए।
अप्रैल 2026 में उनका एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह मजाकिया अंदाज में कहते दिखाई दिए कि उनके Instagram followers नहीं हैं, इसलिए वह खुद को अभिनेता नहीं मानते। इस वीडियो को कई मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट किया।
यह वीडियो उनके 50 साल से अधिक लंबे करियर के बिल्कुल उलट एक दिलचस्प टिप्पणी थी।
रिपोर्टों में उनके करियर को 350 से अधिक फिल्मों और 50 साल से ज्यादा का बताया गया।
बाद में यह भी सामने आया कि वीडियो को सेट पर मजाकिया अंदाज में बनाया गया था और इसे गंभीर आत्म-मूल्यांकन की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
लेकिन इस छोटी-सी बातचीत ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया—क्या आज किसी कलाकार की पहचान उसके अभिनय से ज्यादा उसके सोशल मीडिया फॉलोअर्स से तय होने लगी है?
पेंटल की दशकों लंबी यात्रा इस सवाल का जवाब अपने आप देती है।
पेंटल की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनका अभिनय सिखाने से जुड़ा है।
एक कलाकार जब अपनी तकनीक अगली पीढ़ी को सिखाता है तो उसका प्रभाव उसकी फिल्मों से कहीं आगे तक जाता है।
पेंटल ने अभिनय की शिक्षा के क्षेत्र में काम किया और FTII से भी जुड़े रहे।
यह भूमिका उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को सामने लाती है जो कैमरे की चमक से दूर है।
अभिनय को पेशे के रूप में समझना और फिर दूसरों को उसे समझाना—यह किसी भी कलाकार की विरासत का बड़ा हिस्सा होता है।
पेंटल की कुल संपत्ति या नेट वर्थ को लेकर इंटरनेट पर कई अनुमान मिल सकते हैं, लेकिन इन आंकड़ों की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
इसलिए उनकी संपत्ति को करोड़ों या किसी निश्चित रकम में बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
उनका करियर जरूर लंबा और उल्लेखनीय रहा है, लेकिन किसी कलाकार की कमाई, निवेश, संपत्ति और निजी वित्तीय विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न हों तो अनुमान को तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं है।
पेंटल की सार्वजनिक छवि हमेशा ग्लैमरस लाइफस्टाइल से ज्यादा उनके काम और अभिनय से जुड़ी रही है।
उनकी पीढ़ी के कई कलाकारों की तरह उनका नाम भी उस दौर का प्रतिनिधित्व करता है जब सोशल मीडिया नहीं था और कलाकार की लोकप्रियता थिएटर, फिल्मों, टेलीविजन और दर्शकों की यादों से बनती थी।
आज के दौर में जब कलाकारों के हर दिन की गतिविधियां सोशल मीडिया पर दिखाई देती हैं, पेंटल का करियर उस पुराने दौर की याद दिलाता है जब काम ही सबसे बड़ा परिचय हुआ करता था।
पेंटल ने टीवी पर भी खुद को लगातार प्रासंगिक बनाए रखा।
2025 में वह लोकप्रिय टीवी शो अनुपमा से जुड़े। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने शो में पंडित मनोहर शर्मा का किरदार निभाया।
इस किरदार के जरिए उनकी नई पीढ़ी के दर्शकों तक भी पहुंच बनी।
यह अपने आप में दिलचस्प है कि जिस अभिनेता ने 1970 के दशक में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था, वही दशकों बाद टीवी की नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ स्क्रीन पर दिखाई दे रहा था।
यही लंबे करियर की खूबसूरती है—दर्शक बदलते रहते हैं, माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन अच्छा कलाकार अपनी जगह बना सकता है।
2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर पेंटल जीवित हैं और मनोरंजन जगत से जुड़े हुए हैं।
अप्रैल 2026 की रिपोर्टों में उन्हें 50 साल से अधिक लंबे करियर वाला सक्रिय वरिष्ठ कलाकार बताया गया। उसी दौरान उनके वायरल वीडियो ने एक बार फिर उनके पुराने काम को चर्चा में ला दिया।
उनका नाम आज भी फिल्मों और टेलीविजन की लंबी सूची में मौजूद है।
बावर्ची देखने वाली पुरानी पीढ़ी उन्हें गुरुजी के रूप में याद करती है। सत्ते पे सत्ता के दर्शक उन्हें उस दौर के कॉमिक कलाकार के रूप में पहचानते हैं। वहीं टीवी देखने वाली नई पीढ़ी ने उन्हें अलग-अलग धारावाहिकों में देखा है।
पेंटल की कहानी केवल एक कॉमेडियन की कहानी नहीं है।
यह उस अभिनेता की कहानी है जिसने अपने करियर की शुरुआत में अभिनय सीखा, फिर फिल्मों में जगह बनाई, कॉमेडी में पहचान हासिल की, Filmfare जीता, टेलीविजन में काम किया और अभिनय सिखाने तक का सफर तय किया।
उनकी यात्रा यह भी बताती है कि हर कलाकार को सुपरस्टार बनने की जरूरत नहीं होती।
कुछ कलाकार पर्दे पर मुख्य चेहरा नहीं होते, लेकिन उनके बिना फिल्म अधूरी लगती है।
पेंटल उन्हीं कलाकारों में से एक हैं।
हिंदी सिनेमा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसकी कहानी सिर्फ राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन या दूसरे बड़े सितारों की कहानी नहीं है।
इस कहानी को पूरा करने वाले हजारों कलाकार हैं—वे चेहरे जो कभी नायक नहीं बने, लेकिन हर फिल्म को थोड़ा और जीवंत बना गए।
पेंटल भी ऐसे ही कलाकार हैं।
उन्होंने हंसाया, अलग-अलग किरदार निभाए, बड़े सितारों के साथ काम किया और फिर अपने अनुभव को अभिनय की अगली पीढ़ी तक पहुंचाया।
आज जब लोकप्रियता को लाइक्स और फॉलोअर्स में गिनने का दौर है, पेंटल की पांच दशक से ज्यादा लंबी यात्रा एक शांत लेकिन मजबूत जवाब देती है—अभिनेता की असली पहचान उसके काम में होती है।
सोशल मीडिया की कोई संख्या किसी कलाकार के पूरे सफर को नहीं माप सकती।
क्योंकि कुछ कलाकार ट्रेंड नहीं करते, वे इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।
और पेंटल की कहानी उसी विरासत की कहानी है।
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