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| वंदे मातरम् पर छिड़ा नया विवाद! |
एक तरफ देशभक्ति का सबसे शक्तिशाली गीतों में शुमार ‘वंदे मातरम्’, दूसरी तरफ भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर का एक ऐसा बयान, जिसने पुराने विवाद को फिर से जिंदा कर दिया।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि शर्मिला टैगोर ने क्या कहा?
सवाल यह है कि वंदे मातरम् के बाकी छंदों में ऐसा क्या है, जिसे लेकर धार्मिक आस्था का सवाल उठता रहा है?
और फिर एक और बड़ा सवाल सामने आया—क्या शर्मिला टैगोर ने राष्ट्रगीत का विरोध किया, या वह सिर्फ उसके उस हिस्से की बात कर रही थीं जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी अलग करके देखा गया था?
20 अगस्त 2026 को IANS से बातचीत में शर्मिला टैगोर ने कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं और जो लोग एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए गीत के कुछ बाद के छंदों को कहना मुश्किल हो सकता है। उनके मुताबिक, ऐसे विविध देश में पहले दो छंद सभी को साथ लेकर चलने के लिहाज से बेहतर हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
इस बयान के बाद अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने शर्मिला टैगोर की राय पर तीखी प्रतिक्रिया दी। कंगना ने सवाल उठाया कि कला और कविता को केवल धार्मिक नजरिए से क्यों देखा जाए। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संघर्ष की भावना और शक्ति के प्रतीक के रूप में देखने की बात कही।
तो आखिर शर्मिला टैगोर बनाम वंदे मातरम् की यह कहानी शुरू कहां से हुई?
और क्या यह पहली बार है जब ‘वंदे मातरम्’ के कुछ छंदों को लेकर सवाल उठा है?
असल कहानी आज से नहीं, बल्कि आजादी से पहले के उस दौर से शुरू होती है, जब एक गीत सिर्फ गीत नहीं रहा था—वह आंदोलन की आवाज बन चुका था।
सबसे पहले उस बात को समझना जरूरी है, जिसने पूरा विवाद खड़ा किया।
शर्मिला टैगोर ने वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को खारिज नहीं किया, बल्कि उन्हें अच्छा और साथ लेकर चलने वाला बताया। उनका सवाल गीत की शुरुआती पंक्तियों से ज्यादा उसके बाद आने वाले हिस्सों की धार्मिक imagery को लेकर था।
उन्होंने कहा कि भारत में ऐसे भी लोग हैं जो एक ईश्वर में विश्वास करते हैं। उनके अनुसार, वंदे मातरम् के कुछ बाद के हिस्सों में कई देवी-देवताओं का संदर्भ आता है, इसलिए ऐसे लोगों के लिए उन पंक्तियों का उच्चारण सहज नहीं हो सकता।
यानी उनकी बात का केंद्र था—राष्ट्रीय एकता और धार्मिक विविधता के बीच संतुलन।
लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में यह सवाल तेजी से बदल गया।
क्या इसे राष्ट्रगीत का विरोध माना जाए?
या फिर इसे उस ऐतिहासिक व्यवस्था की याद के रूप में देखा जाए जिसमें राष्ट्रीय समारोहों के लिए पहले दो छंदों को अलग रूप में स्वीकार किया गया था?
यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है।
क्योंकि इतिहास बताता है कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को लेकर बहस आज की नहीं है।
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी लिखते समय ‘वंदे मातरम्’ को नजरअंदाज करना लगभग असंभव है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने धीरे-धीरे ऐसा प्रभाव पैदा किया कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं रहा। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ उठती राष्ट्रीय चेतना की आवाज बन गया।
गीत का शुरुआती हिस्सा मातृभूमि की सुंदरता, प्रकृति और उसके प्रति श्रद्धा की भावना से जुड़ा है।
यही वह हिस्सा था जिसे स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक स्वीकृति मिली और जिसने गीत को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन पूरा मूल गीत पढ़ने पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
बाद के छंदों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ आते हैं। इसी कारण समय के साथ यह सवाल उठा कि क्या पूरा गीत भारत के सभी धार्मिक समुदायों के लिए समान रूप से सहज हो सकता है।
और यहीं से शुरू हुई वह बहस, जो दशकों बाद भी खत्म नहीं हुई।
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद वह है, जिसके बारे में आज की राजनीतिक बहस में कम बात होती है।
1930 के दशक में भी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर चर्चा हुई थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राष्ट्रीय सभाओं में गीत के इस्तेमाल को लेकर धार्मिक संवेदनशीलताओं पर विचार किया गया। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय आयोजनों में पहले दो छंदों तक सीमित रहने का निर्णय लिया था।
इस निर्णय में यह तर्क सामने आया कि शुरुआती दो छंद राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बन चुके थे और उनमें ऐसी बात नहीं थी जिस पर किसी समुदाय को आपत्ति हो। वहीं बाद के छंदों में धार्मिक संदर्भ होने के कारण उन्हें राष्ट्रीय समारोहों के लिए उपयुक्त नहीं माना गया।
यही इतिहास आज के विवाद को एक नया अर्थ देता है।
क्योंकि जब शर्मिला टैगोर आज कहती हैं कि पहले दो छंद बेहतर हैं, तो उनकी बात को केवल आज की राजनीति के संदर्भ में देखना अधूरा होगा।
इसका एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है।
और इस संदर्भ में रवींद्रनाथ टैगोर का नाम बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज यह बात सुनकर कई लोगों को हैरानी हो सकती है कि वंदे मातरम् को लेकर रवींद्रनाथ टैगोर की राय भी इस बहस में महत्वपूर्ण रही थी।
टैगोर ने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् प्रस्तुत किया था। बाद में गीत के व्यापक इस्तेमाल और उसके संदर्भ को लेकर जब चर्चा हुई, तो उन्होंने इसके शुरुआती दो छंदों और बाकी हिस्से के बीच अंतर की बात रखी।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, टैगोर का मानना था कि राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रचलित शुरुआती दो छंदों की अपनी स्वतंत्र पहचान बन चुकी थी और उनमें ऐसी बात नहीं थी जो किसी समुदाय को ठेस पहुंचाए।
यानी जिस विचार को आज 2026 में शर्मिला टैगोर के बयान के कारण फिर से सुर्खियां मिल रही हैं, उसका एक लंबा ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद है।
यही वजह है कि इस मुद्दे को सिर्फ ‘शर्मिला टैगोर ने वंदे मातरम् का विरोध किया’ जैसी एक लाइन में समेटना तथ्यात्मक रूप से सही तस्वीर नहीं देता।
उनकी टिप्पणी मुख्य रूप से पूरे गीत के धार्मिक संदर्भों और पहले दो छंदों की स्वीकार्यता को लेकर थी।
लेकिन फिर सवाल उठता है—अगर यह पुराना इतिहास है, तो अगस्त 2026 में यह मुद्दा अचानक इतना बड़ा कैसे हो गया?
यहीं से कहानी राजनीति के वर्तमान दौर में प्रवेश करती है।
अगस्त 2026 में वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक विवाद फिर तेज हुआ।
कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को फैसला किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वह 1937 के अपने निर्णय के अनुरूप सिर्फ पहले दो छंद गाएगी। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कहा कि पार्टी अपने पुराने ऐतिहासिक निर्णय पर कायम है।
इसके बाद भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू किया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे राष्ट्रविरोधी तक बताया। वहीं भाजपा की ओर से इसे तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़कर भी सवाल उठाए गए।
कांग्रेस की तरफ से तर्क यह रहा कि वह कोई नया फैसला नहीं कर रही, बल्कि 1937 के उस प्रस्ताव को दोहरा रही है जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लिया गया था।
यही राजनीतिक टकराव उस समय और तेज हो गया जब शर्मिला टैगोर ने भी लगभग उसी बिंदु पर अपनी राय रखी।
उन्होंने धार्मिक विविधता का हवाला देते हुए कहा कि पहले दो छंदों को साथ लेकर चलना ज्यादा उचित है।
और फिर सामने आई कंगना रनौत की प्रतिक्रिया।
शर्मिला टैगोर के बयान के सामने आने के बाद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी असहमति जाहिर की।
कंगना ने कहा कि वह शर्मिला टैगोर द्वारा अपनी आपत्ति सामने रखने की बात को समझती हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि कला और कविता को इतना सीमित तरीके से कैसे देखा जा सकता है।
उनका तर्क था कि कविता में शब्द हमेशा शाब्दिक अर्थ में नहीं लिए जाते। कवि रूपकों, कल्पनाओं और प्रतीकों का इस्तेमाल करके बड़े विचार को व्यक्त करता है।
कंगना ने ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संघर्ष की भावना से जोड़ते हुए कहा कि इसे केवल धार्मिक अभ्यास की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
यहीं दोनों अभिनेत्रियों के विचारों में मूल अंतर दिखाई देता है।
शर्मिला टैगोर का फोकस: धार्मिक विविधता और समावेशिता।
कंगना रनौत का फोकस: कविता, रूपक और राष्ट्रवादी भावना।
दोनों की बहस का केंद्र एक ही गीत है, लेकिन उसे देखने का नजरिया बिल्कुल अलग है।
और शायद यही इस पूरे विवाद को इतना संवेदनशील बनाता है।
यहां एक जरूरी तथ्यात्मक अंतर समझना बेहद जरूरी है।
उपलब्ध रिपोर्टों में शर्मिला टैगोर ने वंदे मातरम् को पूरी तरह खारिज करने की बात नहीं कही। उन्होंने खास तौर पर कहा कि पहले दो छंद अच्छे हैं और भारत के विभिन्न धर्मों को साथ लेकर चलने के लिहाज से उन्हें उपयुक्त मानती हैं।
इसलिए शीर्षक में ‘विरोध’ शब्द इस्तेमाल किया जाए तो उसे सावधानी से समझना होगा।
वह गीत के कुछ हिस्सों की धार्मिक स्वीकार्यता पर सवाल उठा रही थीं—पूरे राष्ट्रगीत को अस्वीकार करने की घोषणा नहीं कर रही थीं।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी सार्वजनिक व्यक्ति के बयान को छोटा करके पेश करने से उसका अर्थ बदल सकता है।
और ‘वंदे मातरम्’ जैसा विषय पहले से ही बेहद भावनात्मक है।
ऐसे में फैक्ट और राजनीतिक व्याख्या को अलग रखना जरूरी हो जाता है।
लेकिन क्या केवल दो छंदों की बात करना कोई नई सोच है?
इतिहास का जवाब है—नहीं।
1937 का कांग्रेस कार्यसमिति प्रस्ताव इस पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी है।
ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, कांग्रेस ने माना था कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंद स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके थे। साथ ही बाद के छंदों में धार्मिक विचार और संदर्भ मौजूद थे, जो भारत के अन्य धार्मिक समुदायों के लिए सहज नहीं हो सकते थे।
इसलिए राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो छंदों के इस्तेमाल की सिफारिश की गई।
यह फैसला उस समय की राजनीतिक परिस्थिति में लिया गया था, जब स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक सामाजिक और धार्मिक एकता की जरूरत थी।
इसीलिए आज जब कांग्रेस 1937 के फैसले का हवाला देती है, तो वह इसे अपनी ऐतिहासिक परंपरा बताती है।
दूसरी ओर भाजपा और उसके समर्थक इसे गीत के साथ अधूरा व्यवहार मानते हैं।
यानी एक ही ऐतिहासिक निर्णय को दो अलग राजनीतिक नजरियों से देखा जा रहा है।
और यही इस विवाद का असली केंद्र है।
यहां साहित्यिक पक्ष भी समझना जरूरी है।
वंदे मातरम् के शुरुआती छंदों में मातृभूमि की प्रकृति, हरियाली, जल, हवा, सुंदरता और मां के रूप में देश की कल्पना प्रमुख है।
यही कारण है कि इन पंक्तियों को लंबे समय से राष्ट्रीय भावना और मातृभूमि के प्रति सम्मान से जोड़ा जाता रहा है।
लेकिन गीत के बाद के हिस्सों में देवी-देवताओं से संबंधित धार्मिक imagery अधिक स्पष्ट हो जाती है।
शर्मिला टैगोर ने इसी अंतर को आधार बनाते हुए कहा कि एक ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए ऐसे हिस्सों को बोलना मुश्किल हो सकता है।
कंगना रनौत ने इसके विपरीत इसे काव्यात्मक प्रतीक और शक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में देखने पर जोर दिया।
यानी विवाद सिर्फ गीत की पंक्तियों का नहीं है।
यह सवाल भी है कि किसी राष्ट्रीय प्रतीक की व्याख्या धार्मिक रूप से की जाए या सांस्कृतिक और काव्यात्मक रूप से?
और इस सवाल का आसान जवाब शायद किसी एक पक्ष के पास नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर बहस करते समय एक आम भ्रम राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर भी होता है।
भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है।
गृह मंत्रालय से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों में भी उल्लेख है कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता संघर्ष में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण सम्मान दिए जाने की बात कही थी और इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान देने की इच्छा व्यक्त की गई थी।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि वंदे मातरम् कोई सामान्य फिल्मी या निजी गीत है।
इसका संवैधानिक-ऐतिहासिक महत्व अलग है।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि इसके हर छंद की ऐतिहासिक स्वीकृति का सवाल कभी उठा ही नहीं।
वास्तव में, यही तो इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
शर्मिला टैगोर का बयान ऐसे समय आया है जब वंदे मातरम् पर देश में पहले से राजनीतिक बहस चल रही है।
कांग्रेस का कहना है कि वह अपने 1937 के निर्णय के मुताबिक पार्टी कार्यक्रमों में पहले दो छंदों का इस्तेमाल करेगी। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने इसे राष्ट्रगीत के प्रति अनादर और तुष्टिकरण से जोड़कर आलोचना की है।
इस विवाद की गूंज राज्यों तक भी पहुंची है।
केरल में भी अगस्त 2026 में सरकारी आयोजनों में वंदे मातरम् के पूर्ण या शुरुआती दो छंदों को लेकर अलग-अलग निर्देश और राजनीतिक बयान सामने आए।
यानी अब यह सिर्फ एक अभिनेत्री की राय नहीं रही।
यह सवाल बन चुका है कि राष्ट्रीय गीत को किस रूप में गाया जाए, कौन सा संस्करण इस्तेमाल हो और इतिहास में लिए गए पुराने निर्णयों को आज किस तरह देखा जाए।
और जब राजनीति इसमें शामिल होती है, तो बहस सिर्फ इतिहास की नहीं रहती—वह पहचान की बहस बन जाती है।
शर्मिला टैगोर के बयान पर सोशल मीडिया में भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
कुछ लोगों ने उनके बयान को धार्मिक सह-अस्तित्व और भारत की विविधता के नजरिए से देखा।
वहीं दूसरी तरफ आलोचकों ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय गीत को धार्मिक पहचान के चश्मे से देखना उचित है या नहीं।
कंगना रनौत की प्रतिक्रिया इसी दूसरे नजरिए का प्रमुख उदाहरण बनी।
उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को केवल धार्मिक अभ्यास के रूप में सीमित नहीं किया जाना चाहिए और इसे स्वतंत्रता संघर्ष तथा काव्यात्मक शक्ति के प्रतीक के रूप में समझना चाहिए।
लेकिन यहां भी एक बात ध्यान रखने वाली है।
सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया और ऐतिहासिक तथ्य एक चीज नहीं होते।
किसी बयान पर वायरल प्रतिक्रिया यह साबित नहीं करती कि किसी एक पक्ष का तर्क ऐतिहासिक रूप से सही है।
इस विवाद को समझने के लिए इतिहास, साहित्य और वर्तमान राजनीति—तीनों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
नहीं।
यही शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा खुलासा है।
आज जब लोग शर्मिला टैगोर के बयान को सुनकर पूछ रहे हैं कि “पहले दो छंद ही क्यों?”, तो इसका जवाब स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में पहले से मौजूद है।
1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय आयोजनों के लिए पहले दो छंदों की सिफारिश की थी। उस समय धार्मिक संवेदनशीलताओं और गीत के बाद के हिस्सों में मौजूद धार्मिक imagery को लेकर चर्चा हुई थी।
इसलिए शर्मिला टैगोर की राय को पूरी तरह किसी नए विचार के रूप में देखना ऐतिहासिक संदर्भ को नजरअंदाज करना होगा।
लेकिन कंगना रनौत का तर्क भी अलग आधार पर खड़ा है।
वह कहती हैं कि कविता और कला में प्रतीकों को शाब्दिक धार्मिक आस्था की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
यानी एक पक्ष कह रहा है—सबको साथ लेकर चलने के लिए संवेदनशीलता जरूरी है।
दूसरा पक्ष कह रहा है—कला और राष्ट्रवादी प्रतीकों को संकीर्ण धार्मिक व्याख्या में सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
और शायद यही वह जगह है जहां बहस सबसे ज्यादा गहरी हो जाती है।
फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है।
कांग्रेस अपने 1937 के फैसले पर कायम रहने की बात कह चुकी है, जबकि भाजपा लगातार इसके खिलाफ राजनीतिक अभियान की बात कर रही है।
ऐसे में आने वाले समय में ‘वंदे मातरम्’ का सवाल संसद, राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर फिर उठ सकता है।
शर्मिला टैगोर और कंगना रनौत की बहस ने इस मुद्दे को बॉलीवुड तक भी पहुंचा दिया है।
लेकिन इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि एक ही गीत को लेकर भारत में इतिहास, धर्म, साहित्य, राष्ट्रवाद और राजनीति—सभी एक साथ चर्चा में आ गए हैं।
यह सिर्फ यह तय करने का सवाल नहीं है कि गीत के कितने छंद गाए जाएं।
यह सवाल है कि भारत जैसे विविध देश में राष्ट्रीय प्रतीकों की व्याख्या किस तरह की जाए।
शर्मिला टैगोर का बयान सुनते ही अगर कोई इसे सिर्फ ‘वंदे मातरम् का विरोध’ कह दे, तो कहानी का एक बड़ा हिस्सा छूट जाएगा।
उनकी बात का केंद्र था—भारत की धार्मिक विविधता और उन समुदायों की सहजता, जो एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं।
दूसरी ओर कंगना रनौत ने इसे कला, कविता और स्वतंत्रता संघर्ष की भावना के नजरिए से देखा।
दोनों के तर्क अलग हैं।
लेकिन इतिहास यह जरूर बताता है कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को अलग महत्व देने की चर्चा आज की नहीं है। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने भी राष्ट्रीय आयोजनों के संदर्भ में पहले दो छंदों की सिफारिश की थी।
इसलिए आज का विवाद किसी एक अभिनेत्री के बयान से पैदा हुई पूरी तरह नई कहानी नहीं है।
यह एक पुराने सवाल का नया अध्याय है।
एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद सिर्फ राजनीति से नहीं मिलेगा।
क्योंकि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की याद भी है, साहित्य की रचना भी है, राष्ट्रीय गीत भी है और करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से जुड़ा प्रतीक भी।
शायद इसी वजह से इसकी हर पंक्ति सिर्फ पढ़ी नहीं जाती—महसूस की जाती है।
और जब किसी गीत में इतिहास, आस्था और राष्ट्र की भावना एक साथ मौजूद हों, तो उसकी व्याख्या पर बहस का खत्म होना इतना आसान भी नहीं होता।
शर्मिला टैगोर का बयान इसी लंबे इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है—और कंगना रनौत की प्रतिक्रिया ने इस अध्याय को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में यह बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक रहती है या भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों को देखने के हमारे नजरिए पर एक बड़ी चर्चा शुरू करती है।
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है—क्या ‘वंदे मातरम्’ को एक ही नजरिए से देखा जा सकता है, या उसकी ताकत ही इस बात में है कि अलग-अलग लोग उसमें अलग-अलग भारत देख पाते हैं?
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