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राम्या कृष्णन की अनसुनी कहानी: नीलांबरी से शिवगामी बनने तक का सफर

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 राम्या कृष्णन: जब एक अभिनेत्री ने नायिका से खलनायिका और फिर ‘शिवगामी’ तक का सफर तय किया नीलांबरी से शिवगामी तक! कुछ कलाकार पर्दे पर सिर्फ किरदार नहीं निभाते, वे उस किरदार की पहचान बन जाते हैं। राम्या कृष्णन का नाम ऐसी ही अभिनेत्रियों में लिया जाता है। कभी वह दक्षिण भारतीय फिल्मों की ग्लैमरस लीडिंग लेडी बनीं, कभी राजीव गांधी? Wait. Need no errors. Let's formulate. आज जब हिंदी और दक्षिण भारतीय सिनेमा की सीमाएं तेजी से मिट रही हैं, राम्या कृष्णन का करियर याद दिलाता है कि पैन-इंडिया स्टारडम कोई नया विचार नहीं है। उन्होंने तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में काम किया और कई दशकों तक अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। लेकिन राम्या कृष्णन की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है। इसमें शुरुआती असफलताएं हैं, अपने अभिनय को लेकर खुद की आलोचना है, एक ऐसे दौर की बेचैनी है जब एक अभिनेत्री को अपनी जगह बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरह के किरदार स्वीकार करने पड़ते थे—और फिर एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके पूरे करियर की दिशा बदल दी। वह मोड़ था ‘पड़यप्पा’ की नीलांबरी  और वर्षों बाद वही अभिनेत्...

Last Man In Tower Movie Reviews: एक घर, करोड़ों का लालच और अकेले खड़े एक आदमी की लड़ाई, मनोज बाजपेयी ने फिर जीता दिल

Last Man In Tower Movie Reviews: एक घर, करोड़ों का लालच और अकेले खड़े एक आदमी की लड़ाई, मनोज बाजपेयी ने फिर जीता दिल

Last Man In Tower Movie Reviews में मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी
एक घर... करोड़ों का ऑफर!


Last Man In Tower Movie Reviews: जब पूरा शहर आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन एक आदमी पीछे हटने से इनकार कर दे...

मुंबई में एक पुरानी इमारत है। उसके ज्यादातर निवासी बेहतर जिंदगी का सपना देख रहे हैं। सामने एक ऐसा ऑफर आता है जिसे ठुकराना आसान नहीं। लेकिन उसी इमारत में रहने वाला एक आदमी कहता है—नहीं।

यहीं से शुरू होती है Last Man In Tower की असली कहानी।

मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी जैसे दमदार कलाकारों से सजी यह फिल्म 11 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। फिल्म का निर्देशन बेन रेखी ने किया है और इसकी कहानी अरविंद अडिगा के चर्चित उपन्यास पर आधारित है।

फिल्म का सबसे दिलचस्प सवाल है—घर की कीमत कितनी है? जितने पैसे कोई देने को तैयार हो, या फिर उसमें बीती पूरी जिंदगी की यादें भी जुड़ी होती हैं?

और यही सवाल धीरे-धीरे एक साधारण संपत्ति विवाद को रिश्तों, लालच, अकेलेपन और इंसानी मजबूरियों की कहानी बना देता है।


कहानी कैसी है? — बिना स्पॉइलर के

कहानी का केंद्र है योगेश मिश्रा उर्फ मास्टरजी, जिसका किरदार मनोज बाजपेयी ने निभाया है। वह मुंबई की एक पुरानी सोसायटी में रहने वाला सेवानिवृत्त शिक्षक है।

सोसायटी की इमारत पुरानी हो चुकी है और ज्यादातर लोग चाहते हैं कि इसे तोड़कर एक आधुनिक इमारत बनाई जाए।

तभी बिल्डर धरमेन शाह, यानी बोमन ईरानी, एक ऐसा प्रस्ताव लेकर आता है जो सोसायटी के लोगों की जिंदगी बदल सकता है।

ज्यादातर लोग इसे अपने लिए बेहतर भविष्य का मौका मानते हैं।

लेकिन मास्टरजी तैयार नहीं हैं।

उनके लिए वह घर सिर्फ एक फ्लैट नहीं है। वहां उनकी जिंदगी की यादें हैं, उनकी दिवंगत पत्नी की यादें हैं और उनके बीते हुए वर्षों का भावनात्मक रिश्ता है।

यहीं से कहानी में असली टकराव शुरू होता है।

एक तरफ है पैसा और बेहतर भविष्य, दूसरी तरफ है यादें और सिद्धांत

लेकिन फिल्म की खूबी यह है कि यह किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही और दूसरे को पूरी तरह गलत नहीं बनाती। हर व्यक्ति के पास अपना कारण है।


एक्टिंग और Performances

मनोज बाजपेयी बने फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

अगर Last Man In Tower देखने की एक सबसे बड़ी वजह बतानी हो, तो वह मनोज बाजपेयी हैं।

मास्टरजी के किरदार में वह जरूरत से ज्यादा संवाद या भावुकता का सहारा नहीं लेते। उनका शांत चेहरा, भीतर दबा गुस्सा और अकेले पड़ते जाने का दर्द कहानी को वजन देता है।

कई समीक्षकों ने भी उनकी परफॉर्मेंस को फिल्म की प्रमुख ताकत माना है।

उनका किरदार धीरे-धीरे एक ऐसे आदमी में बदलता दिखाई देता है जिसे कभी लगता था कि वह अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा है, लेकिन अब वही सिद्धांत उसके आसपास के लोगों के लिए परेशानी बन गए हैं।

यही जटिलता मनोज के अभिनय को खास बनाती है।

दिव्या दत्ता ने चौंकाया

दिव्या दत्ता की संगीता पुरी भी फिल्म का बेहद महत्वपूर्ण किरदार है।

वह सिर्फ कहानी में मास्टरजी की विरोधी नहीं हैं। उनके किरदार के पीछे अपनी मजबूरियां, महत्वाकांक्षाएं और परिवार के लिए बेहतर भविष्य की इच्छा है।

दिव्या ने इस किरदार को सिर्फ नकारात्मक बनाने के बजाय उसमें मानवीय कमजोरी और बेचैनी दोनों दिखाई हैं। कई समीक्षाओं में उनकी परफॉर्मेंस को खास तौर पर सराहा गया है।

बोमन ईरानी का अंदाज अलग है

बोमन ईरानी ने बिल्डर धरमेन शाह का किरदार निभाया है।

उनका किरदार कहानी में उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें पुरानी चीजों को हटाकर नई और बड़ी दुनिया बनाने का विश्वास है।

बोमन का अभिनय जरूरत से ज्यादा खलनायकी वाला नहीं है और यही बात उनके किरदार को दिलचस्प बनाती है।

सुकांत गोयल, चंदन रॉय सान्याल और दूसरे सह कलाकार भी कहानी के माहौल को मजबूत करते हैं।


Direction, Music और Technical Side

बेन रेखी का निर्देशन

निर्देशक बेन रेखी ने कहानी को बहुत बड़े पैमाने के नाटक में बदलने के बजाय एक सोसायटी के अंदर सीमित रखा है।

यही वजह है कि फिल्म का संघर्ष व्यक्तिगत महसूस होता है।

पुरानी इमारत, छोटे घर, पड़ोसियों की बातचीत और धीरे-धीरे बदलते रिश्ते मुंबई के उस हिस्से को सामने लाते हैं जो अक्सर चमकदार फिल्मों में दिखाई नहीं देता।

हालांकि कुछ समीक्षकों का मानना है कि फिल्म कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा संयमित रह जाती है और उपन्यास की तीखी व्यंग्यात्मक धार पूरी तरह स्क्रीन पर नहीं आ पाती।

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर

फिल्म का संगीत गोविंद वसंता ने दिया है।

यह कोई गानों से भरी मनोरंजक फिल्म नहीं है। संगीत का इस्तेमाल कहानी के भाव और माहौल को आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सिनेमैटोग्राफी

रंगराजन रामाबद्रन की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के पुराने मुंबई वाले माहौल को पकड़ती है।

यहां मुंबई सिर्फ एक जगह नहीं लगती, बल्कि कहानी का हिस्सा बन जाती है।

पुरानी इमारत और उसके आसपास की दुनिया फिल्म के विषय—पुराने और नए के संघर्ष—को दृश्य रूप देती है।

एडिटिंग और संवाद

करीब 97 मिनट की अवधि फिल्म को अनावश्यक रूप से लंबा नहीं होने देती।

फिर भी कुछ हिस्सों में कहानी की रफ्तार थोड़ी असमान महसूस हो सकती है।

संवादों की बात करें तो Juhi Chaturvedi की लेखन शैली कहानी को सामाजिक स्तर पर भी जोड़ती है।


Audience Reaction / Social Media Buzz

फिल्म अभी नई रिलीज है, इसलिए पूरे बॉक्स ऑफिस और लंबे समय की दर्शक प्रतिक्रिया का आंकलन करना जल्दबाजी होगी।

लेकिन शुरुआती समीक्षाओं में एक बात काफी स्पष्ट दिखाई देती है—मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता के अभिनय को सबसे ज्यादा सराहना मिल रही है।

सोशल मीडिया और फिल्म-प्रेमियों की शुरुआती प्रतिक्रियाओं में भी मनोज बाजपेयी की परफॉर्मेंस को लेकर उत्साह नजर आ रहा है। कुछ शुरुआती दर्शक फिल्म को भावुक और सोचने पर मजबूर करने वाली बता रहे हैं।

हालांकि फिल्म का धीमा और गंभीर अंदाज हर दर्शक को पसंद आए, यह जरूरी नहीं है।

जो दर्शक तेज रफ्तार मसाला मनोरंजन या बड़े एक्शन की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें फिल्म अपेक्षाकृत शांत लग सकती है।


Box Office Prediction: कैसी हो सकती है शुरुआत?

यहां एक बात साफ रखना जरूरी है—अभी फिल्म के अंतिम बॉक्स ऑफिस आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए किसी निश्चित कलेक्शन का दावा करना सही नहीं होगा।

शुरुआती ट्रेड रिपोर्ट्स में ओपनिंग को मजबूत नहीं बताया गया है, जबकि फिल्म की समीक्षात्मक प्रतिक्रिया मिश्रित से सकारात्मक रही है।

किस दर्शक वर्ग को पसंद आ सकती है?

मल्टीप्लेक्स दर्शक: अच्छा रिस्पॉन्स मिलने की संभावना।

परिपक्व दर्शक: कहानी और सामाजिक विषय से जुड़ाव ज्यादा हो सकता है।

फैमिली ऑडियंस: परिवार और रिश्तों की परतें पसंद आ सकती हैं, लेकिन धीमा अंदाज सभी को पसंद आए, यह जरूरी नहीं।

मास ऑडियंस: यहां फिल्म को चुनौती मिल सकती है, क्योंकि यह पारंपरिक मसाला मनोरंजन नहीं है।

इसलिए फिल्म की कमाई मुख्य रूप से मौखिक प्रचार और समीक्षाओं पर निर्भर कर सकती है।


क्या Last Man In Tower देखने लायक है?

हां, अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जो खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में चलती रहें।

यह फिल्म सिर्फ एक बिल्डर और फ्लैट मालिक की कहानी नहीं है।

यह पूछती है—

क्या विकास के नाम पर हम अपनी पुरानी दुनिया को खत्म करने के लिए तैयार हैं?

क्या ज्यादा पैसा हमेशा बेहतर जिंदगी देता है?

क्या अपने सिद्धांतों पर अड़े रहना सही है, भले ही पूरी दुनिया आपके खिलाफ क्यों न हो जाए?

और सबसे बड़ा सवाल—

जब कोई इंसान अकेला रह जाता है, तो क्या वह सच में गलत होता है या बाकी दुनिया बहुत तेजी से बदल चुकी होती है?

फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह इन सवालों के आसान जवाब नहीं देती।

लेकिन अगर आप सिर्फ मनोरंजन, तेज रफ्तार घटनाक्रम और बड़े सिनेमाई तमाशे की तलाश में हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ी धीमी लग सकती है।


Final Verdict

Last Man In Tower एक संवेदनशील और गंभीर फिल्म है, जिसकी असली ताकत इसकी कहानी और कलाकारों के अभिनय में है।

मनोज बाजपेयी फिल्म की रीढ़ हैं, जबकि दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी कहानी के टकराव को मजबूत बनाते हैं।

फिल्म हर जगह परफेक्ट नहीं है। इसकी गति कुछ दर्शकों की परीक्षा ले सकती है और उपन्यास की पूरी व्यंग्यात्मक धार फिल्म में उतनी तीखी महसूस नहीं होती।

लेकिन इसके बावजूद यह ऐसी कहानी है जो आज के शहरों और बदलती जिंदगी से सीधे जुड़ती है।

अगर आप कंटेंट आधारित, सामाजिक मुद्दे वाली और शानदार अभिनय वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो Last Man In Tower को मौका दिया जा सकता है।

⭐ Rating: 3.5/5


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