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| “हृषीदा की अनसुनी कहानी!” |
कुछ फिल्में खत्म हो जाती हैं, लेकिन उनके किरदार हमारे भीतर रह जाते हैं। कुछ निर्देशक फिल्में बनाते हैं, लेकिन कुछ निर्देशक ऐसी दुनिया बनाते हैं जिसमें हमें अपना घर, अपने रिश्ते, अपनी परेशानियां और अपनी खुशियां दिखाई देती हैं।
ऋषिकेश मुखर्जी उन्हीं फिल्मकारों में से एक थे।
उन्होंने भारतीय सिनेमा में न तो हमेशा बड़े सेटों का सहारा लिया और न ही अपनी कहानियों को सिर्फ सितारों की चमक के भरोसे छोड़ा। उन्होंने आम इंसान को अपनी फिल्मों का हीरो बनाया। कभी एक बीमार आदमी के रूप में, कभी नौकरी की तलाश कर रहे युवक के रूप में, कभी घर की सख्त मां के सामने खड़ी आजाद सोच वाली लड़की के रूप में और कभी पति-पत्नी के रिश्ते में पैदा हुए अहंकार के रूप में।
‘आनंद’, ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’, ‘गोल माल’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि सिनेमा को महान बनाने के लिए हमेशा शोर की जरूरत नहीं होती।
ऋषिकेश मुखर्जी को प्यार से ‘हृषीदा’ कहा जाता था। चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने लगभग 42 फिल्मों का निर्देशन किया और भारतीय सिनेमा में उस धारा को मजबूत किया जिसे अक्सर ‘मिडिल सिनेमा’ कहा जाता है—ऐसा सिनेमा जो व्यावसायिक मनोरंजन और गंभीर यथार्थवाद के बीच एक मानवीय रास्ता तलाशता था।
आज उनकी पुण्यतिथि पर जब उनकी फिल्मों को दोबारा देखा जाता है, तो एक बात साफ समझ आती है—हृषीदा ने फिल्मों में सिर्फ कहानियां नहीं सुनाईं, उन्होंने इंसान को समझने की कोशिश की।
ऋषिकेश मुखर्जी का जन्म 30 सितंबर 1922 को कलकत्ता में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और आज कोलकाता, पश्चिम बंगाल है। उनका निधन 27 अगस्त 2006 को मुंबई में हुआ।
फिल्मों की दुनिया में आने से पहले उनका जीवन किसी फिल्मी परिवार की चमक से जुड़ा हुआ नहीं था। भारतीय फिल्म इतिहास पर उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि उन्होंने शुरुआती दौर में शिक्षक के रूप में भी काम किया था। बाद में उनकी रुचि सिनेमा की तरफ बढ़ी और उन्होंने फिल्म निर्माण की तकनीकी दुनिया में प्रवेश किया।
उनके व्यक्तित्व की सबसे खास बात शायद यही थी कि वे सिर्फ निर्देशक नहीं थे। वे संपादन की कला को गहराई से समझते थे और यही अनुभव बाद में उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बना।
ऋषिकेश मुखर्जी के करियर को समझना हो तो बिमल रॉय का नाम लेना जरूरी है।
1950 के आसपास वह बंबई पहुंचे और बिमल रॉय के साथ बतौर एडिटर और असिस्टेंट डायरेक्टर काम करना शुरू किया। इस दौर ने उन्हें सिनेमा की बारीकियों को समझने का मौका दिया।
उन्होंने बिमल रॉय की फिल्मों के संपादन से लेकर फिल्म निर्माण की प्रक्रिया तक बहुत कुछ सीखा। ‘दो बीघा जमीन’, ‘देवदास’ और ‘मधुमती’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों से उनका संपादकीय जुड़ाव रहा। बाद के वर्षों में उन्होंने ‘गंगा जमुना’ और ‘कुली’ सहित कई फिल्मों के संपादन से भी अपना रिश्ता बनाए रखा।
यानी जिस व्यक्ति को बाद में हिंदी सिनेमा का महान निर्देशक कहा गया, उसकी बुनियाद कैमरे के सामने नहीं बल्कि एडिटिंग टेबल के पीछे तैयार हुई थी।
यही वजह थी कि उनके निर्देशन में दृश्यों की गति, कलाकारों की टाइमिंग और कहानी के भावनात्मक असर पर असाधारण पकड़ दिखाई देती थी।
1957 में ऋषिकेश मुखर्जी ने निर्देशक के रूप में अपनी पहली फिल्म ‘मुसाफिर’ बनाई।
यह कोई पारंपरिक एक-नायक वाली कहानी नहीं थी। फिल्म एक पुराने घर और उसमें रहने वाले अलग-अलग परिवारों की कहानियों के माध्यम से जीवन के अलग-अलग पड़ावों को सामने रखती थी। फिल्म में दिलीप कुमार, किशोर कुमार, सुचित्रा सेन, उषा किरण और अन्य कलाकार थे।
‘मुसाफिर’ व्यावसायिक रूप से बड़ी सफलता नहीं बनी, लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में Certificate of Merit मिला।
यह शुरुआत बताती थी कि हृषीदा का रास्ता शायद सामान्य मसाला सिनेमा से अलग होने वाला था।
दो साल बाद 1959 में आया ‘अनाड़ी’।
राज कपूर और नूतन अभिनीत इस फिल्म ने ऋषिकेश मुखर्जी को एक ऐसे निर्देशक के रूप में स्थापित करना शुरू किया जो सामाजिक संवेदना को लोकप्रिय मनोरंजन के साथ जोड़ सकता था। फिल्म को आलोचनात्मक और व्यावसायिक सफलता मिली और राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला।
यहां से हृषीदा की फिल्मी भाषा ज्यादा स्पष्ट होने लगी। उनके नायक अक्सर साधारण होते थे। उनके सामने समस्याएं वास्तविक होती थीं। लेकिन उनकी कहानियों में निराशा के साथ उम्मीद भी रहती थी।
ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की खासियत यह थी कि वे समाज की बड़ी समस्याओं को भी अक्सर छोटी-सी व्यक्तिगत कहानी के जरिए दिखाते थे।
‘अनुपमा’ में पारिवारिक रिश्ते और भावनाएं थीं। ‘सत्यकाम’ में नैतिकता और आदर्शवाद का संघर्ष था। ‘आशीर्वाद’ में परिवार और इंसानी रिश्तों की पीड़ा थी। ‘गुड्डी’ में फिल्मी सितारों के आकर्षण और वास्तविक जिंदगी के बीच का फर्क था।
और फिर 1971 में आया वह दौर जिसने ऋषिकेश मुखर्जी को अमर कर दिया।
अगर ऋषिकेश मुखर्जी की पूरी फिल्मोग्राफी में एक फिल्म को उनकी पहचान के रूप में चुना जाए, तो शायद ‘आनंद’ सबसे आगे होगी।
1971 की इस फिल्म में राजेश खन्ना ने आनंद का किरदार निभाया और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर बनर्जी यानी ‘बाबूमोशाय’ की भूमिका निभाई।
कहानी एक ऐसे व्यक्ति की थी जिसे पता है कि उसकी जिंदगी बहुत लंबी नहीं है। लेकिन वह मौत की खबर को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता।
वह जहां जाता है, वहां जिंदगी बांटता है। वह लोगों को हंसाता है। और सबसे बड़ी बात—वह अपने आसपास के लोगों को जीना सिखाता है। फिल्म की भावनात्मक ताकत सिर्फ उसके अंत में नहीं थी। असली जादू इस बात में था कि दर्शक आनंद की मौत से पहले ही उससे जुड़ चुका था।
‘आनंद’ ने ऋषिकेश मुखर्जी को Filmfare में Best Film और Best Story सहित कई सम्मान दिलाए। ऋषिकेश मुखर्जी को फिल्म के संपादन के लिए भी Filmfare सम्मान मिला।
गुलजार ने बाद में हृषीदा के साथ अपने लंबे सहयोग को याद करते हुए ‘आनंद’, ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘गोल माल’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्मों का जिक्र किया।
1971 ही वह साल था जब ‘गुड्डी’ भी आई।
इस फिल्म से जया भादुड़ी ने हिंदी सिनेमा में अपनी पहली बड़ी पहचान बनाई। वह फिल्म में एक ऐसी किशोरी का किरदार निभाती हैं जो अभिनेता धर्मेंद्र की फिल्मी छवि से बेहद प्रभावित है और धीरे-धीरे समझती है कि पर्दे की दुनिया और वास्तविक जीवन अलग होते हैं।
हृषीदा ने यहां सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं कही थी। उन्होंने स्टार सिस्टम और दर्शकों के आकर्षण को भी हल्के-फुल्के अंदाज में समझाया।
यह उनकी शैली थी—गंभीर बात को भी ऐसी कहानी में कहना जिसे दर्शक सहजता से देख सके।
1972 की ‘बावर्ची’ में हृषीदा ने परिवार की अंदरूनी खींचतान को कहानी का आधार बनाया।
एक घर जहां लोग साथ रहते हैं, लेकिन एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से दूर हो चुके हैं। फिर एक बावर्ची आता है और धीरे-धीरे उस परिवार में बदलाव शुरू होता है।
फिल्म में हास्य था, संगीत था, घरेलू माहौल था और सबसे बढ़कर इंसानियत थी।
यही हृषीदा का सिनेमा था—बिना भाषण दिए जीवन की कोई जरूरी बात कह देना।
1973 में आई ‘अभिमान’ आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली वैवाहिक फिल्मों में गिनी जाती है।
अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की मुख्य भूमिकाओं वाली यह फिल्म एक ऐसे दंपती की कहानी थी जिसमें पत्नी की प्रतिभा और लोकप्रियता पति के अहंकार को चुनौती देने लगती है।
यह सिर्फ पति-पत्नी की कहानी नहीं थी। यह पुरुष अहंकार, प्रतिभा, सफलता और रिश्ते के बीच पैदा होने वाली असुरक्षा की कहानी थी।
हृषीदा ने इस विषय को बिना किसी अतिनाटकीयता के पेश किया।
इसी वजह से ‘अभिमान’ आज भी प्रासंगिक लगती है।
‘नमक हराम’ में हृषीदा ने दोस्ती और सामाजिक वर्ग के अंतर को कहानी के केंद्र में रखा।
राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी ने फिल्म को एक अलग ऊर्जा दी।
यह वह दौर था जब अमिताभ बच्चन धीरे-धीरे उस स्टारडम की ओर बढ़ रहे थे जिसे बाद में ‘एंग्री यंग मैन’ की पहचान मिली।
ऋषिकेश मुखर्जी ने अमिताभ के भीतर सिर्फ एक स्टार नहीं देखा। उन्होंने उनके अभिनेता को पहचाना।
इसीलिए हृषीदा की फिल्मों में अमिताभ का अभिनय अक्सर उनके स्टारडम से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देता है।
1975 की ‘चुपके चुपके’ ऋषिकेश मुखर्जी के हास्य सिनेमा का शानदार उदाहरण है।
फिल्म में धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर, अमिताभ बच्चन और जया बच्चन जैसे कलाकार थे।
धर्मेंद्र ने प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी का किरदार निभाया, जो एक शरारत के कारण कई लोगों को उलझा देता है।
फिल्म का हास्य चीखने-चिल्लाने वाला नहीं था। परिस्थितियां धीरे-धीरे हास्य पैदा करती थीं।
Filmfare के अनुसार, फिल्म बंगाली फिल्म ‘Chhadmabeshi’ पर आधारित थी और इसे आज भी धर्मेंद्र की यादगार कॉमिक प्रस्तुतियों में गिना जाता है।
हृषीदा की यही खासियत थी—वह जानते थे कि कॉमेडी में भी कहानी और किरदार सबसे ऊपर होने चाहिए।
‘मिली’ में भी हृषीदा ने जीवन और मृत्यु के बीच खड़े इंसान की कहानी कही।
फिल्म की संवेदनशीलता ‘आनंद’ से अलग थी, लेकिन भावनात्मक धरातल पर दोनों फिल्मों में एक समान मानवीय धागा दिखाई देता है।
हृषीदा मृत्यु से डराने के बजाय दर्शक को जिंदगी की कीमत समझाते थे।
1979 की ‘गोल माल’ उनके करियर की सबसे लोकप्रिय कॉमेडी फिल्मों में से एक बनी।
अमोल पालेकर, बिंदिया गोस्वामी और उत्पल दत्त जैसे कलाकारों के साथ बनी इस फिल्म ने यह दिखाया कि एक साधारण-सी नौकरी, एक सख्त बॉस और एक झूठ किस तरह हास्य की पूरी दुनिया बना सकते हैं।
‘गोल माल’ की सफलता के पीछे सिर्फ कॉमेडी नहीं थी। फिल्म ने भारतीय मध्यवर्ग की उस दुनिया को पकड़ा था जहां नौकरी, बॉस, परिवार, परंपरा और अपनी पहचान—सब एक साथ मौजूद थे।
1980 में आई ‘खूबसूरत’ में रेखा ने मनजू का किरदार निभाया।
यह एक ऐसे घर की कहानी थी जहां हर चीज नियम और अनुशासन से चलती है। फिर मनजू जैसी चंचल और स्वतंत्र सोच वाली लड़की वहां आती है और पूरे माहौल को बदल देती है।
फिल्म में अशोक कुमार, दीना पाठक, राकेश रोशन और अन्य कलाकार भी थे।
‘खूबसूरत’ की खास बात यह थी कि इसमें आजादी की बात किसी भारी-भरकम भाषण के जरिए नहीं कही गई। एक परिवार के रोजमर्रा के व्यवहार से यह बात सामने आई।
गुलजार ने बाद में एक दिलचस्प किस्सा बताया कि फिल्म के शीर्षक को लेकर भी हृषीदा के साथ उनकी बातचीत हुई थी और अंततः ‘खूबसूरत’ नाम तय हुआ।
ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मोग्राफी अपने आप में हिंदी सिनेमा के कई महान कलाकारों की सूची जैसी है।
उन्होंने राज कपूर और नूतन के साथ ‘अनाड़ी’ बनाई।
दिलीप कुमार, किशोर कुमार और सुचित्रा सेन उनके शुरुआती दौर की ‘मुसाफिर’ में नजर आए।
राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी को ‘आनंद’ और ‘नमक हराम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया।
जया बच्चन के साथ ‘गुड्डी’ और ‘अभिमान’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्में उनके करियर का हिस्सा रहीं।
धर्मेंद्र के साथ ‘सत्यकाम’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों ने अभिनेता के अलग-अलग रंग दिखाए। ‘सत्यकाम’ में धर्मेंद्र के अभिनय को विशेष रूप से सराहा गया और Filmfare ने इसे उनके करियर की बेहतरीन प्रस्तुतियों में माना।
रेखा के साथ ‘खूबसूरत’ ने एक अलग तरह की महिला-केंद्रित पारिवारिक कॉमेडी को लोकप्रिय बनाया।
इसके अलावा अमोल पालेकर, उत्पल दत्त, अशोक कुमार, शशि कपूर, संजीव कुमार, शर्मिला टैगोर, मौशुमी चटर्जी और अनेक कलाकारों ने उनकी फिल्मों में काम किया।
हृषीदा की खासियत यह थी कि वह अभिनेता को उसके स्टारडम से नहीं, बल्कि किरदार के हिसाब से देखते थे।
ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी निजी जिंदगी को फिल्मी ग्लैमर से काफी हद तक अलग रखा।
उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों के अनुसार, उनकी शादी हुई थी और उनके तीन बेटियां और दो बेटे थे। उनकी पत्नी का निधन उनसे कई दशक पहले हो चुका था। परिवार के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है, क्योंकि हृषीदा अपने निजी जीवन को चर्चा का विषय बनाने से बचते थे।
उनके छोटे भाई द्वारकानाथ मुखर्जी ने भी उनकी कुछ फिल्मों की पटकथा लेखन प्रक्रिया में सहयोग किया था।
इसलिए ऋषिकेश मुखर्जी की निजी जिंदगी पर अफवाहों के बजाय उपलब्ध प्रमाणित जानकारी तक सीमित रहना ही उचित है।
हृषीदा का नाम उन फिल्मकारों में नहीं आता जिनका करियर विवादों से घिरा रहा हो।
उनके बारे में सबसे ज्यादा चर्चा उनकी कार्यशैली को लेकर मिलती है।
गुलजार ने उन्हें याद करते हुए बताया था कि हृषीदा कलाकारों के देर से आने को पसंद नहीं करते थे और जरूरत पड़ने पर अपनी संपादन क्षमता से दृश्यों को इस तरह जोड़ देते थे कि कलाकार भी हैरान रह जाते थे। वह स्टार के अहंकार के सामने झुकने वाले निर्देशक नहीं थे।
यह किस्सा उनकी कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण संकेत देता है।
उनके लिए फिल्म का स्टार कोई भी हो, फिल्म और कहानी सबसे ऊपर थी।
ऋषिकेश मुखर्जी को जानवरों से भी खास लगाव था।
गुलजार ने उनके साथ बिताए दिनों को याद करते हुए उनके कुत्तों के प्रति प्यार का एक मजेदार किस्सा साझा किया। उनके अनुसार, हृषीदा के घर आने वाला एक व्यक्ति चाय लेने से मना कर रहा था तो हृषीदा ने मजाक में कहा कि चाय उसके लिए नहीं, उनके कुत्ते के लिए है।
ऐसे छोटे-छोटे किस्से बताते हैं कि पर्दे पर गंभीर और संवेदनशील फिल्में बनाने वाले हृषीदा निजी जिंदगी में हास्यबोध से भरपूर व्यक्ति थे।
ऋषिकेश मुखर्जी को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले।
1999 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मानों में से एक दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया। राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार की आधिकारिक सूची में 1999 के प्राप्तकर्ता के रूप में उनका नाम दर्ज है।
2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भारत सरकार की आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना में उनका नाम कला—सिनेमा श्रेणी में दर्ज है।
उनके खाते में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और Filmfare सम्मानों की लंबी सूची भी रही। ‘आनंद’ के लिए उन्होंने कहानी और संपादन सहित महत्वपूर्ण Filmfare सम्मान हासिल किए। लेकिन हृषीदा की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई ट्रॉफी नहीं थी।
वह यह थी कि उनकी फिल्मों को देखने वाला व्यक्ति खुद को स्क्रीन पर पहचान लेता था।
ऋषिकेश मुखर्जी की मृत्यु 2006 में हुई। उनकी व्यक्तिगत संपत्ति, बैंक बैलेंस, निवेश या उस समय की कुल नेट वर्थ का कोई ऐसा विश्वसनीय सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जिसे प्रमाणित रूप से उनकी संपत्ति का अंतिम मूल्य माना जा सके।
इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाले अनुमानित ‘Hrishikesh Mukherjee Net Worth’ आंकड़ों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
उनकी जीवनशैली भी उनके सिनेमा की तरह अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण बताई जाती है। उपलब्ध स्रोतों में उनके बांद्रा स्थित घर में पालतू जानवरों के साथ रहने और परिवार व मित्रों के मिलने का उल्लेख मिलता है।
ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों को आज भी याद करने की एक बड़ी वजह यह है कि उनके किरदार बहुत दूर के नहीं लगते।
उनका घर हमारे घर जैसा था। उनकी नौकरी हमारी नौकरी जैसी थी। उनके परिवार में वही छोटी-छोटी तकरार थीं जो आम परिवारों में होती हैं। उनके किरदार प्यार करते थे, ईर्ष्या करते थे, गलती करते थे, माफी मांगते थे और फिर आगे बढ़ते थे।
यही वजह है कि उनकी फिल्मों को ‘मिडिल सिनेमा’ की परंपरा से जोड़ा जाता है। उन्होंने मुख्यधारा के मनोरंजन और गंभीर सामाजिक सिनेमा के बीच एक मानवीय पुल बनाया।
अमिताभ बच्चन के करियर में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का खास स्थान है।
‘आनंद’ में उन्होंने एक अपेक्षाकृत शांत और भीतर से टूटे हुए डॉक्टर की भूमिका निभाई। ‘अभिमान’ में रिश्ते और पुरुष अहंकार का जटिल चेहरा दिखाया। ‘नमक हराम’ में दोस्ती और वर्ग संघर्ष को अलग अंदाज दिया। ‘चुपके चुपके’ में वही अभिनेता पूरी तरह हास्य की दुनिया में नजर आया। यानी हृषीदा ने अमिताभ को किसी एक छवि में बंद नहीं किया।
शायद यही एक महान निर्देशक की पहचान होती है—वह अभिनेता के भीतर छिपे उस रंग को देख लेता है जिसे दर्शक ने अभी तक नहीं देखा।
हृषीदा की फिल्मों में एडिटिंग का असर बहुत गहरा था।
उन्होंने शुरुआत ही एडिटर के रूप में की थी। बिमल रॉय के साथ काम करते हुए उन्होंने सीखा कि किसी दृश्य में क्या रखना है और क्या छोड़ देना है।
गुलजार की यादों में भी यह बात सामने आती है कि हृषीदा शूटिंग के दौरान भी अपने एडिटर वाले दिमाग से सोचते थे और अनावश्यक रूप से ज्यादा शूट नहीं करते थे।
यही कारण है कि उनकी फिल्मों में अक्सर कहानी बिना अतिरिक्त बोझ के आगे बढ़ती है। उनके पास स्टार थे, लेकिन स्टार शो नहीं। उनके पास हास्य था, लेकिन फूहड़ता नहीं। उनके पास भावुकता थी, लेकिन भावनात्मक शोषण नहीं। और यही संतुलन उन्हें अलग बनाता है।
अपने करियर के अंतिम दौर में हृषीदा ने पहले जैसी लगातार सफल फिल्में नहीं दीं। Filmfare के हालिया पुनरावलोकन में उनकी बाद की कुछ फिल्मों को उनके शुरुआती दौर की फिल्मों की तुलना में कमजोर माना गया है।
उनकी अंतिम निर्देशित फिल्म ‘झूठ बोले कौवा काटे’ 1998 में रिलीज हुई थी। इसके बाद उनका सार्वजनिक फिल्मी काम धीरे-धीरे कम होता गया। लेकिन किसी महान फिल्मकार की विरासत सिर्फ उसकी आखिरी फिल्म से तय नहीं होती।
हृषीदा की असली विरासत ‘आनंद’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘गुड्डी’, ‘मिली’, ‘गोल माल’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्मों में सुरक्षित थी।
27 अगस्त 2006 को ऋषिकेश मुखर्जी का मुंबई में निधन हो गया।
बाद के वर्षों में उपलब्ध जीवनी-संबंधी स्रोतों में उनके अंतिम समय में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और किडनी फेल्योर के कारण उपचार का उल्लेख मिलता है। उनकी उम्र 83 वर्ष थी।
एक ऐसे निर्देशक की यात्रा समाप्त हुई जिसने चार दशक से अधिक समय तक भारतीय दर्शकों को हंसाया, रुलाया और अपने जीवन को नए नजरिए से देखने का मौका दिया। लेकिन उनकी फिल्में वहीं रुक गईं—ऐसा नहीं हुआ।
हर बार जब ‘आनंद’ दोबारा टीवी या स्ट्रीमिंग पर चलती है, कोई न कोई दर्शक बाबूमोशाय के साथ उस सफर पर निकल पड़ता है। हर बार ‘गोल माल’ देखकर कोई परिवार हंसता है।
‘चुपके चुपके’ देखकर नई पीढ़ी धर्मेंद्र और अमिताभ की कॉमिक टाइमिंग खोजती है। ‘अभिमान’ देखकर रिश्तों में अहंकार की कीमत पर चर्चा होती है। और ‘खूबसूरत’ देखकर लोग समझते हैं कि घर में खुशियां सिर्फ नियमों से नहीं आतीं।
क्योंकि उन्होंने हमें बताया कि साधारण जिंदगी भी असाधारण कहानी हो सकती है। उन्होंने यह साबित किया कि एक डॉक्टर, शिक्षक, बावर्ची, नौकरीपेशा युवक, गृहिणी या पड़ोसी भी सिनेमा का नायक हो सकता है। उनकी फिल्मों में जिंदगी बहुत बड़ी चीज नहीं थी।
जिंदगी ही सबसे बड़ी चीज थी।
हृषीदा की सबसे बड़ी खूबी शायद यही थी कि उन्होंने अपने दर्शकों को कभी छोटा नहीं समझा। उन्होंने उन्हें सोचने की जगह दी। हंसने की वजह दी। रोने की इजाजत दी। और सबसे जरूरी—जीने का हौसला दिया।
ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा किसी एक दौर का सिनेमा नहीं है। वह उस इंसान का सिनेमा है जो आज भी अपने परिवार के लिए चिंतित है। उस दोस्त का सिनेमा है जो मुश्किल समय में साथ खड़ा रहता है। उस पति का सिनेमा है जो अपने अहंकार से लड़ रहा है। उस बेटी का सिनेमा है जो अपने घर में अपनी पहचान तलाश रही है। और उस इंसान का सिनेमा है जो जानता है कि जिंदगी सीमित है, फिर भी मुस्कुराना जरूरी है। शायद इसलिए ‘आनंद’ का असर आज भी वैसा ही है। शायद इसलिए ‘बावर्ची’ का परिवार आज भी अपना लगता है। शायद इसलिए ‘गोल माल’ पर आज भी हंसी आती है। और शायद इसलिए 27 अगस्त को हृषीदा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना सिर्फ एक महान निर्देशक को याद करना नहीं है।
यह उस सिनेमा को याद करना है जिसने हमें बताया था कि अच्छा इंसान होना भी एक बड़ी कहानी है।
ऋषिकेश मुखर्जी पर्दे के पीछे चले गए, लेकिन उनके किरदार आज भी हमारे बीच हैं।
और जब तक भारतीय दर्शक अपनी जिंदगी में प्यार, दोस्ती, परिवार, संघर्ष और उम्मीद खोजता रहेगा—हृषीदा का सिनेमा जिंदा रहेगा।
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